दामिनी, तुम किसी नेता की बेटी नहीं थी, अगर होती तो तुम्हारे गुनहगारों को लेकर बालिग-नाबालिग की बहस नहीं होती। फिर संसद में बैठे हमारे ये हुक्मरान एक हो जाते। तुम एक मामूली परिवार से हो, इसलिए तुम्हारी इज्जत और जान की कोई अहमियत नहीं। हमने मुल्क को एक महाभारत बना दिया लेकिन दुर्योधन और दुशासन के मामले में गुनाह नहीं सिर्फ उम्र देखकर उन्हें माफ कर देते हैं।

आज वे लोग खामोश हैं जो कुछ दिन पहले तक अपने इनाम लौटा रहे थे, आज आम आदमी की परवाह करने वालों को सांप सूंघ गया, आज संस्कृति के रक्षक मुंह पर दुपट्टा बांधकर अंधेरी गली से बाहर का रास्ता ढूंढ रहे हैं। मैं पूछता हूं कि कब तक ऐसे गुनहगारों की उम्र का सर्टिफिकेट देखकर उन्हें माफी देते रहेंगे? अच्छा होता कि दामिनी के सभी गुनहगारों को दिल्ली के बाजार में सरेआम फांसी पर लटका देते। फिर किसी दुशासन की हिम्मत नहीं होती कि वह बलात्कार का साहस दिखाता।

माना कि जज और अदालत तो कानून के सामने मजबूर हैं लेकिन हमारे हुक्मरानों को कानून बनाने से किसने रोका है?

अगर दामिनी नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल, मुलायम सिंह यादव या सोनिया गांधी में से किसी की बेटी होती तो हमारी सरकार अब तक खामोश होती? बिल्कुल नहीं, क्योंकि ये बड़े लोग हैं और इज्जत व जान सिर्फ बड़े लोगों में ही होती है। जिस देश में बलात्कार और हत्या के गुनहगार इतने साल बाद भी जिंदा हैं और बरी कर दिए जाते हैं तो उससे इन्साफ की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। उस व्यवस्था को धिक्कार है।

हम सिर्फ यही दुआ कर सकते हैं कि तुम्हारा यह मुजरिम हिंदू है तो इसे मौत के बाद अग्नि न मिले और मुसलमान है तो मिट्टी भी नसीब न हो। हमें माफ करना, क्योंकि इस देश में तुम्हारे लिए कोई इन्साफ नहीं है। – राजीव शर्मा, कोलसिया –

(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)


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