आज के दौर में लोगों पर इस्लाम किस तरह पेश किया जाये ,यह एक गम्भीर प्रश्न भी है और एक चुनौती भी है। क्या इसके लिए क़ुरान के तर्जुमे छाप छाप कर दुनिया भर में बांटना सही तरीक़ा साबित होगा? मैं समझता हूँ कि यह कारगर सिद्ध नही होगा। मेरे इस विचार की बुनियाद यह है कि अल्लाह के रसूल ( सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम )को समझे बिना कोई शख्स इस्लाम को नहीं समझ सकता।

गौरतलब है कि अल्लाह के रसूल हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) ने एकदम से खुद को नबी घोषित नहीं किया , बल्कि उन्होंने 40 साल की उम्र में पहुँचने के बाद लोगों को इस्लाम का सन्देश देना शुरू किया. इस उम्र तक वे अपनी सच्चाई. ईमानदारी, किरदार, अखलाक से लोगों का दिल जीतते रहे. जब लोगों के दिलों में उनकी छवि एक कामिल इन्सान की बन गयी, उसके बाद ही आपने नबुव्वत का “ऐलान” किया.

इसका एकमात्र कारण यह है कि “बात” को मनाने से पहले “ज़ात” को मनाना ज़रूरी होता है, लिहाज़ा हजरत मोहम्मद साहब (सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम) ने एक “पूर्ण मनुष्य” के रूप में पहले अपनी “ज़ात” को मनवाया और उसके बाद ही लोगों के सामने अपनी “बात” रखी कि अल्लाह के सिवा कोई आराध्य नहीं , और मोहम्मद उसके रसूल हैं.

इसलिए मेरा मानना है कि अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति या संगठन लोगों को इस्लाम की शिक्षाएं पहुँचाने की इच्छा रखता है तो उसे चाहिए कि एकदम से वह लोगों को ” कुरान शरीफ ” का अनुवाद पेश न करे. बल्कि उसे चाहिए कि वह पहले “सीरते पाक” पर लोगों को कोई किताब देने का प्रयास करे. इसलिए कि “साहबे कुरान” को समझे बिना अगर कोई शख्स “कुरान” को समझना चाहेगा तो शायद समझ नहीं पायेगा.

कुरान के सिर्फ तर्जुमे के आधार पर कोई शख्स यह सोचे कि वह इस्लाम को समझ लेगा तो यह काम मुश्किल है क्योकि वैसे भी कुरान को समझने के लिए “शाने नुज़ूल” को जानना ज़रूरी है जिसके अभाव में वह कुरान की आयातों का गलत अर्थ निकाल सकता है और इस्लाम के बारे में गलत धारणा बना सकता है. जैसा कि आज कल आम हो गया है.

आश्चर्य की बात यह है कि बालेन्दु महाराज या जॉय कृष्णा दास जैसे पढ़े लिखे बुद्धिजीवी भी कुरान की “संघ प्रिय” 24 आयतों का उदहारण पेश करते हैं और बिना सोचे समझे यह कहते हैं कि देखो, इस्लाम कितना कट्टर मज़हब है जो काफिरों को मारने काटने का हुक्म देता है.

गैर मुस्लिमों की तो छोड़िये: एक खास अक़ीदे को मानने वाली जमातें भी क़ुरान की चन्द आयतों के सिर्फ तर्जुमे पेश कर गुमराही का शिकार है. वो आयतें जो बुतों की निंदा में उतरी हैं, उनको ये मज़ार में आराम कर रहे वलियों से जोड़ देती हैं और कहती हैं कि तुम अल्लाह को छोड़ कर जिनको पुकारते हो वे न तुम्हारी बात सुन सकते हैं, न तुम्हारी मदद कर सकते हैं. जबकि नबियों और वलियों की बादे वफ़ात की ज़िन्दगी और अवाम को उनकी मदद क़ुरान और अहादीस से साबित है.

इसलिए मेरा दृढ़ विश्वास है कि अगर कोई गैर-मुस्लिम हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम) की हयाते तय्यबा (पवित्र जीवन) को पढ़ेगा, उनके चरित्र, सच्चाई, इमानदारी को जानेगा, 13 वर्षों तक मक्का शरीफ में उनको धर्मप्रचार के मार्ग में क्या क्या कठिनाइयाँ आईं, इसको समझेगा और उन्होंने किस तरह अपने दुश्मनों को माफ़ करके उनका दिल जीता. यह सब पढ़ेगा तो निश्चित रूप से उसके दिल में रसूल के माध्यम से इस्लाम की एक ऐसी छवि बनेगी जो विरोधियों के दुष्प्रचार से बिलकुल विपरीत होगी और यह तस्वीर उस तस्वीर से बिलकुल भिन्न होगी जो सिर्फ तर्जुमा पढ़ने वालों के दिलों में गलतफहमी की बुनियाद पे बन जाया करती है.

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने या अल्लाह के वलियों ने कुरान के तर्जुमे बाँट बाँट कर इस्लाम नहीं फैलाया. उन अवलिया ए किराम तो रसूल की सीरत अपने सामने रखी और अपनी ज़िन्दगी रसूल के सांचे में ढाल दी. यही वजह है कि जब उन्होंने इस्लाम का सन्देश लोगों को दिया तो लोग परवानावार उनकी तरफ दौडे चले आये. इसलिए मुसलमानों से मेरी गुजारिश है कि रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम) की सीरते पाक को लोगों तक अधिक से अधिक पहुँचाने की कोशिश करें. कुरान का तर्जुमा वे इसके बाद ही पेश करें तो बेहतर होगा.

वैसे भी हदीसे पाक का मफ़हूम है कि हजरते आयशा सिद्दीका (राज़ी अल्लाहो तआला अन्हा) फरमाती है कि रसूल का अखलाक कुरान था. इसलिए अगर आप रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम) की पाक ज़िन्दगी को लोगों के सामने पेश कर रहे हैं तो समझ लीजिये कि आप कुरान को ही लोगों के सामने पेश कर रहे हैं.

लेखक: मुहम्मद आरिफ दागिया

हमे करनी है सरकारे दो आलम की रज़ा जोई,

वो अपने हो गए तो रहमते परवर दिगार अपनी”


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