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प्यारे नबी (सल्ल.) ने मदीना में प्रवेश किया। आज घर-घर में खुशियां मनाई जा रही थीं। यह भव्य विजय थी। इसका संदेश सिर्फ मदीना तक सीमित नहीं रहा। अब हर कहीं मुहम्मद (सल्ल.) की चर्चा थी। आपके बहादुर साथियों का जिक्र था। पराक्रम की गाथाएं गाई जा रही थीं। शहीदों के शौर्य का स्मरण किया जा रहा था। दुश्मन के दिलों में धाक जम गई थी।

प्रश्न था, युद्धबंदियों का क्या किया जाए? हजरत उमर (रजि.) ने सुझाव दिया कि बंदियों का वध किया जाए। हजरत अबू-बक्र (रजि.) बोले, अल्लाह के रसूल! ये आपके भाई-बंधु हैं। आज अल्लाह ने इन्हें आपके वश में कर दिया है। मैं समझता हूं कि इनका वध न किया जाए, इनसे प्राणमूल्य ले लिया जाए। इससे भविष्य के लिए कुछ सामग्री का प्रबंध हो जाएगा और संभव है कि अल्लाह इन्हें हिदायत दे। कल ये ही लोग आपके सहयोगी व अनुयायी बन जाएं।

प्यारे नबी (सल्ल.) को यह सुझाव अच्छा लगा। युद्धबंदियों में जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी थी, उनसे प्राणमूल्य लिया गया। जिनकी स्थिति अच्छी नहीं थी, परंतु जो पढ़ना-लिखना जानते थे, उन्हें दायित्व सौंपा गया कि वे मदीना में शिक्षा का प्रसार करें, हर व्यक्ति दस लड़कों को पढ़ाए। यही उनकी ओर से प्राणमूल्य मान लिया जाएगा।

जो लोग अनपढ़-नादान थे, उन पर दया की गई। उन्हें यूं ही छोड़ दिया गया। युद्धबंदियों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया गया। मदीना में खजूर की पैदावार अधिक थी, इसलिए ये सस्ते थे और रोटी महंगी थी। आपके साथी खुद खजूर खाकर पेट भरते तथा बंदियों को अपने हिस्से की रोटियां दे देते।

मानवता का अद्भुत दृश्य था। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने अपने साथियों को निर्देश दिया था कि किसी भी कैदी को सताया न जाए, न उसके जीवन को कोई हानि पहुंचाई जाए।

इन्हीं लोगों में आपके दामाद अबुल आस थे। आपने (सल्ल.) उन्हें बिना प्राणमूल्य लिए छोड़ा, परंतु यह शर्त रखी कि वे हजरत जैनब (रजि.) का मार्ग नहीं रोकें। वास्तव में जैनब (रजि.) ने पति के प्राणमूल्य के लिए धन भेजा था। उसमें एक हार भी था। वह हार हजरत खदीजा (रजि.) का था, जो उन्होंने जैनब (रजि.) को दे दिया था।

जब आपने (सल्ल.) हार देखा तो दिल भर आया। आपने (सल्ल.) साथियों की सहमति से अबुल आस को छोड़ दिया। इसके पश्चात जैनब (रजि.) ने हिजरत की।

युद्धबंदियों में एक नाम सुहैल बिन अम्र का आता है। वह बहुत कुशल वक्ता था। हजरत उमर (रजि.) ने उसके लिए कहा, ऐ अल्लाह के रसूल! सुहैल बिन अम्र के अगले दो दांत तुड़वा दीजिए। इससे उसकी जुबान लिपट जाया करेगी तथा वह किसी स्थान पर वक्ता बनकर आपके विरुद्ध प्रचार करने नहीं खड़ा होगा।

आपने (सल्ल.) यह निवेदन स्वीकार नहीं किया। आपने (सल्ल.) ऐसे कई बंदियों को माफी दी जो आपके नाम से ही नफरत करते थे। युद्धबंदियों के साथ ऐसे अच्छे सलूक की घटनाएं कहां मिलेंगी कि विजेता उन्हें माफी दिए जाए जो उसी का गला काटने आए थे! उन्हें भरपेट खाना खिलाए जिनकी वजह से उसे भूखा रहना पड़ा था! उनके रहने का प्रबंध करे जिन्होंने उसे घर छोड़ने को विवश किया था! इतना बड़ा दिल अल्लाह के रसूल (सल्ल.) का ही था।

कुरआन की एक आयत में कहा गया है –

… इसके पश्चात या हो तो उपकार करके छोड़ो अथवा क्षतिपूर्ति लेकर …। (47 : 4)

नबी (सल्ल.) के नेतृत्व में बद्र की विजय से मदीना का मान बढ़ा। मुसलमानों ने अपने जीवन में जो प्रथम ईद मनाई, वह शव्वाल सन् 2 हि. की ईद थी। यह बद्र में मिली विजय का उत्सव था।

उधर मक्का में दुश्मन मातम मना रहा था। प्राण गए, प्रतिष्ठा गई। कुरैश ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनका अहंकार इतनी जल्दी धूल में मिल जाएगा। दिल में दर्द था, दर्द के साथ गहरी नफरत। हम यहां मातम में डूबें और मदीना वाले पर्व मनाएं! यह होने नहीं देंगे। सोच रहे थे कि हार नहीं मानेंगे, जीत कर ही दम लेंगे।

अगर धन लगे तो लग जाए, सिर कटे तो कट जाए, प्राण जाएं तो चले जाएं, पर बदला लेकर रहेंगे। एक महीने तक मक्का के घरों से रोने की आवाजें आती रहीं। कितनी ही औरतों ने इस शोक में अपने बाल कटवा लिए।

बद्र के युद्ध में अस्वद बिन अब्दुल-मुत्तलिब के तीन पुत्र मारे गए। उसे आंखों से दिखाई नहीं देता था। वह अपने पुत्रों की मृत्यु पर रोना चाहता था। रात को उसने कहीं से रोने की आवाज सुनी। मालूम हुआ कि एक औरत का ऊंट खो गया। उसी दुख में वह रो रही थी।

अस्वद उसकी बात पर बोला, ऊंट पर न रो, बल्कि बद्र पर रो, जहां भाग्य फूट गए।

उमैर-बिन-वहब भी आपसे (सल्ल.) दुश्मनी रखता था। वह सफ्वान-बिन-उमय्या के साथ मातम मना रहा था। सफ्वान बोला, अब तो जीवन में कोई आनंद नहीं रहा। ऐसे लगता है जैसे जीवन एक त्रासदी है।

उमैर ने भी हां में हां मिलाई। वह ऋण के बोझ से दबा था। उसका पुत्र मदीना में बंदी था। वह अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की हत्या करना चाहता था।

सफ्वान ने उसे दिलासा दी, ऋण की चिंता न करो। बच्चों की ओर से निश्चिंत रहो। मैं उनका दायित्व लेता हूं।

अब उमैर ने मदीना की राह पकड़ी। वह गर्दन में तलवार लटकाए जा रहा था। मदीना पहुंचकर आपको (सल्ल.) ढूंढ़ने लगा। हजरत उमर (रजि.) ने उसे देख लिया। उसकी गतिविधियों पर उन्हें संदेह हुआ। उन्होंने उसकी गर्दन पकड़ी और प्यारे नबी (सल्ल.) के पास लेकर आए।

आपने (सल्ल.) पूछा, उमैर! क्या इरादा है? कहो, कैसे आए?

उमैर ने कहा, पुत्र को छुड़ाना आया हूं। अल्लाह के लिए मुझ पर और मेरे पुत्र पर दया कीजिए।

आपने (सल्ल.) पूछा, तलवार का क्या काम? तलवार क्यों लटक रही है?

उमैर बोला, बुरा हो जाए इन तलवारों का। बद्र में ये किस काम आईं? जब मैं यहां आ रहा था तो इस ओर ध्यान नहीं गया, यह मेरी गर्दन में लटक रही थी।

आपने (सल्ल.) पूछा, उमैर सच-सच बताओ। यहां किस उद्देश्य से आए? झूठ न बोलो। झूठ बोलने से क्या लाभ है?

उमैर सफाई देता रहा, मैं तो पुत्र के लिए ही आया हूं। मेरा विश्वास कीजिए। मैं पुत्र के लिए ही आया हूं।

आपने (सल्ल.) पूछा, सफ्वान से क्या बातचीत हुई थी?

अब तो उमैर घबरा गया। उसने पूछा, क्या बातचीत हुई थी?

फरमाया, तुमने उससे मेरी हत्या का वायदा किया है। इस शर्त पर कि वह तुम्हारा ऋण चुका देगा, तुम्हारे बच्चों के पालन-पोषण का दायित्व लेगा। सुन लो, अल्लाह यह कदापि नहीं होने देगा।

उमैर को आपकी (सल्ल.) सत्यता पर विश्वास हो गया। अब संदेह की कोई आशंका नहीं रही। उसने कहा, मैं गवाही देता हूं कि आप अल्लाह के रसूल हैं। आपके सच्चा होने में अब मुझे कोई संदेह नहीं है।

आपने (सल्ल.) साथियों से फरमाया, अपने भाई को कुरआन पढ़ाओ तथा उसके बंदी को आजाद करो।

मेरी नजर से पढ़िए
बद्र का युद्ध इन्सान के अहंकार पर अल्लाह की विजय का नाम है। कुरैश ने इससे पहले कितने ही लोगों को सताया, मारा-पीटा, यातनाएं दीं। उन्होंने हर मर्यादा का उल्लंघन किया। जब दुश्मन मदीना को उजाड़ने चला आया तो अल्लाह ने उसके अहंकार पर चोटी की।

इस घटना से हमें सीखना चाहिए कि जीवन में कभी किसी को न सताएं। जो किसी को सताता है, अल्लाह एक दिन उसे धूल में मिला देता है। यह बात मक्का के उन लोगों पर ही लागू नहीं होती जिन्होंने प्यारे नबी (सल्ल.) को सताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह मुझ पर लागू होती है, आप पर लागू होती है, सब पर लागू होती है।

कोई मुस्लिम हो या गैर-मुस्लिम, अरबी हो या अमरीकी, सब पर अल्लाह की पकड़ है। अगर कोई ऐसी हरकत करे कि उसकी दुष्टता की वजह से लोगों को दुखी होकर अपना घर छोड़ना पड़े तो अल्लाह उस पापी को बख्शेगा नहीं।

किसी का घर छीनना, सामान पर कब्जा कर लेना, औरतों के साथ बदसलूकी करना, बसा-बसाया संसार उजाड़ देना, ये ऐसे काम हैं जिन्हें अल्लाह कभी पसंद नहीं करता। वह ऐसे लोगों को सजा देने से पहले यह नहीं देखेगा कि उसके जन्म प्रमाणपत्र में कौनसा धर्म लिखा है। हिंदू हो या मुसलमान या कोई और, ऐसा व्यक्ति सिर्फ एक गुनहगार है।

जिन हाथों से कुरैश ने किसी का घर उजाड़ा था, वे बद्र में कटे पड़े थे। जो बदमाशी के षड्यंत्र रचा करते, उनके सिर धड़ से जुदा हो गए थे। जिन्हें अपनी ताकत का बड़ा नशा था, वे इस काबिल न रहे कि उठकर दो कदम चल सकें। वे आज बेजान पड़े थे। अल्लाह सबको सद्बुद्धि दे कि किसी से ऐसा गुनाह न हो, सब शांति से रहें।

आपने (सल्ल.) युद्धबंदियों को माफी दी, उनकी जरूरतों का खयाल रखा, जो हत्या के इरादे से आया, उसे भी जीवनदान दिया। इन सबके साथ ही आपने (सल्ल.) शिक्षा को बहुत महत्व दिया। जब युद्ध के नगाड़े बज रहे थे, स्थिति बहुत संवेदनशील थी, उस समय भी आपने (सल्ल.) शिक्षा के महत्व को कम नहीं आंका।

तीर-कमान और तलवारों के बीच कागज-कलम की बात कौन करता है? प्यारे नबी (सल्ल.) बहुत दूरदर्शी थे। शिक्षा का महत्व जानते थे, इसलिए युद्धबंदियों को दायित्व सौंपा कि वे मदीना में शिक्षा का उजाला फैलाएं।

उस युग की तुलना में आज सुविधाएं बहुत हैं, संभावनाएं काफी ज्यादा हैं, पर लोगों में वैसी लगन नहीं दिखती। शिक्षा के लिए समर्पित वैसा वातावरण नहीं मिलता जिसकी एक झलक हमें मदीना में दिखती है।

कुछ सेवाभावी शिक्षक कोशिश करते भी हैं तो उनका सहयोग करने वाले नहीं मिलते। हमारे देश में ऐसे काॅलेज और विश्वविद्यालय बहुत कम हैं जहां ज्ञान के लिए गंभीरता दिखती है। ज्यादातर तो राजनीति के अखाड़े बन गए हैं।

जिस देश के नागरिक व्यर्थ के कामों में समय न गंवाकर शिक्षा का महत्व समझने लगते हैं, वे ज्ञान, विज्ञान, शक्ति और आविष्कारों में कामयाबी का परचम लहराते हैं। जो अज्ञान के अंधकार में मौज की नींद सोते हैं, वे सोते ही रह जाते हैं।

ज्ञान की ताकत दुनिया को नई राह दिखाती है, बेहतर बनाती है। जिनके हाथों में कागज-कलम थामने का हुनर होता है, वे राख के ढेर से भी उजाला पैदा कर देते हैं।

शेष बातें अगली किस्त में

– राजीव शर्मा –


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