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पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के जीवन की कई घटनाएं ऐसी हैं जो पढ़ने-समझने में साधारण लगती हैं, लेकिन उनमें कई बड़े इशारे छुपे होते हैं। वे साधारण इसलिए लगती हैं ताकि साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी उन्हें समझने की कोशिश कर सके और उनमें बड़े व गहरे संकेत इसलिए होते हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां उनसे सबक लेती रहें। आज मैं ऐसी ही एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा।

यह तब की बात है जब बद्र का युद्ध समाप्त हो चुका था। यह प्यारे नबी (सल्ल.) व उनके साथियों पर थोपा गया युद्ध था। युद्ध में नबी (सल्ल.) ने बहुत कम संसाधनों से दुश्मन का सामना किया एवं विजय प्राप्त की।

युद्ध के पश्चात दुश्मन के कई सैनिक बंदी बना लिए गए। अब यह फैसला करना था कि इन बंदी सैनिकों के साथ क्या किया जाए। ये वे लोग थे जिन्होंने रब के रसूल (सल्ल.) को कष्ट दिए थे। अब मदीना को नुकसान पहुंचाने के इरादे से आए थे।

हजरत उमर (रजि.) ने उनकी हरकतों के लिए मृत्युदंड का सुझाव दिया। वहीं हजरत अबू-बक्र (रजि.) ने नर्मी बरतने का अनुरोध किया। प्यारे नबी (सल्ल.) ने उस समय यह ऐतिहासिक निर्णय लिया जो बहुत ही शिक्षाप्रद है।

– चूंकि दुश्मन ने हमला कर मदीना का नुकसान किया था, कई सैनिक शहीद कर दिए थे, इसलिए नुकसान की भरपाई तथा शहीदों के परिजनों के भरण-पोषण के लिए यह उचित ही था कि जो बंदी बहुत धनवान थे, उनसे क्षतिपूर्ति ली जाए।

– जो बंदी पढ़ना-लिखना जानते थे, लेकिन क्षतिपूर्ति देने में समर्थ नहीं थे, उन्हें यह दायित्व सौंपा गया कि वे मदीना के दस-दस बच्चों को पढ़ाएं।

– जो अनपढ़, नासमझ, गरीब थे, उन्हें यूं ही छोड़ दिया गया।

इस ऐतिहासिक फैसले का दूसरा बिंदु सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसे एक बार फिर पढ़िए। इस नियम के जरिए प्यारे नबी (सल्ल.) हमें यह संदेश देना चाहते थे-

1. ज्ञान (कोई भी विषय) का महत्व हमेशा से है और सदा-सर्वदा रहेगा।

2. ज्ञान प्राप्त करने का अवसर आए तो उसे हासिल करना चाहिए। सीखने में आलस्य नहीं करना चाहिए।

3. जो अवसर तथा सुविधा मिलने के बावजूद पढ़ने-लिखने में दिलचस्पी नही लेते, वे पिछड़ जाते हैं और अपनी दुर्गति के खुद जिम्मेदार होते हैं।

4. बच्चों के भविष्य की फिक्र जरूरी है। उन्हें पढ़ाओ-लिखाओ। घर में अनाज कम है तो कम खाओ, पर बच्चों को पढ़ाओ। नबी (सल्ल.) ने एक नेता व अभिभावक के तौर पर उस जमाने में बच्चों के पढ़ने-लिखने का प्रबंध करवाया जब मदीना की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी।

5. अगर युद्ध के हालात हैं, तो भी सुनहरे भविष्य की उम्मीद न छोड़ो। शांतिकाल में ही नहीं युद्धकाल में भी यथासंभव पढ़ाई-लिखाई होनी चाहिए। इन घटनाओं के समय मदीना पर बार-बार युद्ध के बादल मंडरा रहे थे।

6. तलवार (यानी हथियार) का महत्व है लेकिन बेहतर होगा कि ये देश की रक्षा करने वाले सैनिकों के हाथों में हों। जनता के हाथों में कलम ही अच्छी लगती है।

7. बेशक तलवार में ताकत है, पर यह कलम की बराबरी नहीं कर सकती।

8. जब सीखने की बारी आए तो शिक्षक का नाम, गांव, धर्म-मजहब कोई मायने नहीं रखता। उससे सीखो और उसकी इज्जत करो।

9. नबी (सल्ल.) ने ज्ञान के बदले दुश्मन को भी जीवनदान दे दिया था। ज्ञान की कद्र की, दुश्मन को उसके गुनाह के बावजूद माफी दे दी।

10. नबी (सल्ल.) ने दुश्मन के खून का बदला खून से नहीं लिया। आपने (सल्ल.) खून से ज्यादा स्याही को महत्व दिया, इस तरह कलम को तलवार से ऊंचा स्थान दिया।

11. शिक्षा के जरिए नबी (सल्ल.) बच्चों का उज्ज्वल भविष्य चाहते थे। आप (सल्ल.) चाहते थे कि मदीना के वे बच्चे पढ़-लिखकर इस धरती को बेहतर बनाएं। आपने (सल्ल.) युद्धकाल में भी शिक्षा को जरूरी समझा। इस बात पर गौर कीजिए, जिन्होंने युद्धकाल में शिक्षा को जरूरी समझा, उनके फैसले के पीछे निश्चित रूप से सकारात्मक सोच रही होगी।

आप (सल्ल.) नकारात्मकता को पसंद करने वाले नहीं थे। इसलिए आपकी मंशा यही थी कि शिक्षा का उपयोग हमेशा सकारात्मक कार्यों के लिए हो। प्यारे नबी (सल्ल.) यह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि पढ़ाई-लिखाई का उपयोग समाज में उपद्रव फैलाने के लिए किया जाए। जिसे लड़ाई के माहौल में भी बच्चों के भविष्य की फिक्र हो, वह शांति के समय में लड़ाई नहीं चाहेगा।

मैं इस बिंदु पर इसलिए ज्यादा जोर दे रहा हूं क्योंकि अक्सर आतंकवादी गुटों के सरगनाओं के उच्च शिक्षित होने, उनके डाॅक्टर-इंजीनियर होने पर लोगों को विश्लेषण करते सुना है कि ये लोग इस्लाम का हिस्सा हैं। ये इस्लाम का हिस्सा कैसे हो सकते हैं जब नबी (सल्ल.) ने ज्ञान का दुरुपयोग करने की बात कभी नहीं कही? जो ज्ञान का दुरुपयोग करता है, वह उसके लिए खुद जिम्मेदार है।

12. जिनमें काबिलियत है, जिनके पास इल्म की दौलत है, उनकी इज्जत कीजिए। भले ही वे दूसरे धर्म या दूसरे देश से हों। जो देश ज्ञान को महत्व देगा, विज्ञान की अहमियत समझेगा, नैतिकता को नहीं छोड़ेगा, उसका भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल होगा।

13. जिनका धर्म आपके धर्म से अलग है, उनके करीब जाने से न हिचको। मानो अपना ही दीन, पर उनके दीन का मखौल न उड़ाओ, उनकी इज्जत करो। उनसे कुछ अच्छी बात सीखने को मिले तो जरूर सीखो। उनके ज्ञान का सम्मान करना सीखो।

14. अच्छा सलूक करो। उनसे भी जिनका धर्म आपके धर्म से अलग है। आपको कोई अधिकार नहीं कि उन्हें सताएं या मारे-पीटें। लोग जितना अच्छा सलूक अपनी औलाद से नहीं करते होंगे, नबी (सल्ल.) ने उससे अच्छा सलूक दुश्मन से किया था। जब खाने की कमी थी, तब मदीना में दुश्मन पेट भरकर सोए और नबी (सल्ल.) ने थोड़े से खजूर और पानी पर ही गुजारा किया।

15. नबी (सल्ल.) गुणों की परख करना जानते थे। आपने (सल्ल.) दुश्मन के गुण की कद्र की। आपके अच्छे सलूक ने दुश्मनी को दोस्ती में बदला। हम सबक लें कि दुश्मन नहीं दोस्त बनाएं, गुण की कद्र करें।

16. हम जल्दबाजी में और भावुकता से फैसला न लें। नबी (सल्ल.) चाहते तो सभी दुश्मनों की गर्दनें कलम करवा सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया। वह फैसला लिया जिसमें सबकी भलाई थी।

17. दुश्मनी में उठी तलवार सिर्फ गर्दनें काट सकती है। समझदारी से पकड़ी गई कलम खुशहाली की सच्ची कहानी लिख सकती है। अब आप और मैं फैसला कर लें कि तलवार से एक-दूसरे का खून बहाना चाहते हैं या कलम से खुशहाली लाना चाहते हैं।

18. रब ही जानता है कि नबी (सल्ल.) के जीवन से जुड़ी इस घटना में और कितने इशारे छुपे हैं। मेरी साधारण बुद्धि से मैं जितना समझ पाया हूं, वह मैंने यहां बताने की कोशिश की है। सभी को इन्हें समझना चाहिए।

राजीव शर्मा


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