हज़रत-ए-मूसा अलैहिस्सलाम एक दिन जंगल जा रहे थे कि उन्होंने एक चरवाहे की आवाज़ सुनी, वो ऊँची ऊँची आवाज़ से कह रहा था: “ऐ मेरे जान से प्यारे ख़ुदा! तू कहाँ है? मेरे पास आ, मैं तेरे सर में कंघी करूँ, जुएँ चुनूँ, तेरा लिबास मैला हो गया है तो धोऊँ, तेरे मोज़े फट गए हों तो वो भी सीऊँ, तुझे ताज़ा-ताज़ा दूध पिलाऊँ, तू बीमार हो जाये तो तेरी तीमारदारी करूँ, अगर मुझे मालूम हो कि तेरा घर कहाँ है तो तुम्हारे लिए रोज़ घी और दूध लाया करूँ, मेरी सब बकरियाँ तुम पर क़ुर्बान! अब तो आ जा…” “हज़रत-ए-मूसा अलैहिस्सलाम उसके क़रीब गए, और कहने लगे, “अरे अहमक़! तू ये बातें किस से कर रहा है? “चरवाहे ने जवाब दिया” उससे कर रहा हूँ जिसने तुझे और मुझे पैदा किया और ये ज़मीन आसमान बनाए।”

ये सुन हज़रत-ए-मूसा अलैहिस्सलाम ने ग़ज़बनाक होकर कहा: “अरे बद-बख़्त! तू इस बेहूदा बकवास से कहीं का ना रहा! बजाय मोमिन के तू तो काफ़िर हो गया। ख़बरदार ऐसी बेमानी और फ़ुज़ूल बकवास बंद कर, तेरे इस कुफ़्र की बदबू सारी दुनिया में फैल गई, अरे बेवक़ूफ़! ये दूध लस्सी हम मख़लूक़ के लिए है कपड़ों के मोहताज हम हैं हक़ तआला इन हाजतों से बेनयाज़ है। ना वो बीमार पड़ता है ना उसे तीमारदारी की ज़रूरत है। ना उसका कोई रिश्तेदार है। तौबा कर और उससे डर, ”

हज़रत-ए-मूसा अलैहिस-सलाम के ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब में भरे हुए ये अलफ़ाज़ सुनकर चरवाहे के औसान ख़ता हो गए और वो ख़ौफ़ से थर-थर काँपने लगा, चेहरा ज़र्द पड़ गया और बोला: “ऐ ख़ुदा के जलील-उल-क़द्र नबी! तू ने ऐसी बात कही कि मेरा मुँह हमेशा के लिए बंद हो गया और मारे नेदामत के मेरी जान हलाकत में पड़ गई। “ये कहते ही चरवाहे ने सर्द आह खींची अपना गिरेबान तार-तार किया और दीवानों की तरह अपने सर पर ख़ाक उड़ाता हुआ ग़ायब हो गया।

हज़रत-ए-मूसा अलैहिस-सलाम हक़ तआला से हमकलाम होने के लिए कोह-ए-तूर पर गए तो ख़ुदा ने फ़रमाया: “ऎ मूसा! तू ने हमारे बंदे को हमसे जुदा क्यों किया? तू दुनिया में जुदाई के लिए आया है या मिलाप के लिए? ख़बरदार! इस काम में एहतियात रख हमने अपनी मख़लूक़ में हर शख़्स की फ़ित्रत अलग बनाई है। और हर फ़र्द को दूसरों से जुदा अक़ल बख़शी है। जो बात एक के हक़ में अच्छी है, वो दूसरे के लिए बुरी है, एक के हक़ में तिरयाक़ का असर रखती है, वही दूसरे के लिए ज़हर है। एक के हक़ में नूर और दूसरे के हक़ में नार, हमारी ज़ात पाकी-ओ-नापाकी से मुबर्रा है।

ऎ मूसा! ये मख़लूक़ मैंने इसलिए पैदा नहीं फ़रमाई कि उससे मेरी ज़ात को कोई फ़ायदा पहुंचे, उसे पैदा करने का मक़सद ये है कि उस पर मैं अपने कमालात की बारिश करूँ, जो शख़्स जिस ज़बान में भी मेरी हम्द-ओ-सना करता है उससे मेरी ज़ात में कोई कमी बेशी वाक़्य नहीं होती, मिद्दाह करने वाला ख़ुद ही पाक साफ़ होता है। मैं किसी के क़ौल और ज़ाहिर पर निगाह नहीं रखता, मैं तो बातिन और हाल देखता हूँ।

ऎ मूसा! ख़िर्द-मंदों के आदाब और हैं दिल-जलों और जान हारों के आदाब और “हज़रत-ए-मूसा ने जब ख़ुदा का ये इताब आमेज़ ख़िताब सुना तो सख़्त पशेमान हुए और बारगाह-ए-इलाही में निहायत नेदामत और शर्मसारी से माफ़ी मांगी, फिर उसी इज़तिराब और बेचैनी में उस चरवाहे को ढ़ूढ़ने जंगल में गए। सहरा-ओ-ब्याबान की ख़ाक छान मारी पर चरवाहे का कहीं पता ना चला, इस क़दर चले कि पैरों में छाले पड़ गए, लेकिन तलाश जारी रखी आख़िर आप उसे पा लेने में कामयाब हुए। चरवाहे ने उन्हें देखकर कहा: “ऎ मूसा! अब मुझसे क्या ख़ता हुई है कि यहाँ भी आ पहुंचे?

“हज़रत-ए-मूसा ने जवाब दिया: “ऎ चरवाहे! मैं तुझे मुबारक देने आया हूँ। तुझे हक़ तआला ने अपना बंदा फ़रमाया और इजाज़त अता की कि जो तेरे जी में आए बिला-तकल्लुफ़ कहा कर, तुझे किसी अदब-ओ-आदाब क़ाएदे ज़ाबते की ज़रूरत नहीं, तेरा कुफ़्र असल दीन है, और दीन नूर-ए-जाँ, तुझे सब कुछ माफ़ है, बल्कि तेरे सदक़े में तमाम दुनिया की हिफ़ाज़त होती है, “चरवाहे ने आँखों में आँसू भर कर कहा: “ऐ पैग़ंबर-ए-ख़ुदा! अब मैं इन बातों के काबिल ही कहाँ रहा हूँ कि कुछ कहूँ, मेरे दिल का ख़ून हो चुका है, अब मेरी मंज़िल बहुत आगे है, तू ने ऐसी ज़र्ब लगाई कि हज़ारों लाखों साल की राह तै कर चुका हूँ, मेरा हाल बयान के काबिल नहीं और ये जो कुछ मैं कह रहा हूँ इसे भी मेरा अहवाल मत जान…।

“मौलाना रूमी इस हिकायत से हासिल ये निकालते हैं कि “ऐ शख़्स! जो तू हक़ तआला की हमद-ओ-सना बयान करता है, क्या समझता है? तू तो इब्तिदा से इंतिहा तक नाक़िस और तेरा हाल-ओ-क़ाल भी नाक़िस, ये महज़ उस परवरदिगार रहमान-ओ-करीम का करम है कि वो तेरे नाक़िस और हक़ीर तोहफ़े को क़बूल फ़रमाता है…। – तनवीर त्यागी


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