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दुनिया में कई राजा-शहंशाह हुए हैं। इनमें से कुछ ऐसे थे जो कब सिंहासन पर बैठे और कब चले गए, किसी को याद ही न रहा। हिंदुस्तान में कई बादशाह ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने सिर्फ धरती पर नहीं, बल्कि दिलों पर राज किया।
अगर जिक्र सबसे अच्छे राजा का किया जाए तो यह बहुत मुश्किल है, क्योंकि ऐसा कोई एक नाम नहीं है। ऐसे नामों की सूची बहुत-बहुत लंबी है। उन्हें लोग आज तक याद करते हैं और आगे भी भूल नहीं पाएंगे। आज मैं ऐसे ही दो नामों की चर्चा करूंगा। इनमें से एक ने हिंदुस्तान में जन्म लिया तो दूसरे ने अरब में। दोनों ही अपने जमाने के बहुत इंसाफ पसंद लोग थे। वे अपने युग में अपने फैसलों से बड़े बने।
इनमें से एक को तो इतिहास बेझिझक महान व्यक्ति की उपाधि देता है लेकिन दूसरे को लेकर कुछ खामोश है। यह कहूं तो ज्यादा सही रहेगा कि दूसरे व्यक्ति का मूल्यांकन ठीक से किया ही नहीं गया। अगर अरब से बाहर लोग उसे ठीक तरह से जानते तो बेहिचक उसका नाम महान लोगों में शामिल किया जाता।
(संदर्भः देखिए फैजान-ए-अशफाक, अंक-जून 2016, पृष्ठ- 42 से 44)
इनमें पहले हैं महाराजा अशोक और दूसरे हैं हजरत उमर बिन खत्ताब (रजि.)। हजरत उमर (रजि.) के साथ नाइन्साफी यह हुई कि उन्हें सिर्फ एक धर्म और विदेशी के नजरिए से ही देखा गया। इससे लोगों ने उनकी खूबियों को जानने की कोशिश ही नहीं की। अगर जानते तो उन्हें कभी भूल नहीं पाते। उनका इन्साफ हमेशा याद रखा जाता।
सबसे पहले महाराजा अशोक के जीवन की एक घटना बताना चाहूंगा। इसे दुनिया के हर राजनेता को जरूर पढ़नी चाहिए, खासतौर से भारत के राजनेताओं को।
महाराजा अशोक के शासन काल की बात है। एक बार किसी गांव में गरीबों को अन्न बांटा जा रहा था। उस पूरे इलाके में अशोक के गुप्तचर घूमा करते थे। वे यह मालूम करते थे कि कोई सरकारी कर्मचारी जनता को परेशान तो नहीं कर रहा, रिश्वत तो नहीं मांग रहा। एक दिन महाराजा अशोक वेश बदलकर आए। उनके अंगरक्षक कुछ दूर खड़े थे। अशोक ने देखा, अन्न वितरण केंद्र पर कर्मचारी गरीबों को अन्न बांट रहा था।
सबसे आखिर में एक वृद्ध महिला आई। कर्मचारी ने उसे देखा और कहा- अब तो सूर्यास्त हो चुका है। मेरा काम खत्म हुआ। अगर अन्न चाहिए तो कल आना।
वृद्धा गिड़गिड़ाने लगी, बोली- मुझसे तेज नहीं चला जाता, इसलिए आने में देर हो गई। अगर मुझे आज अन्न नहीं मिला तो भूखे पेट ही सोना पड़ेगा। मगर कर्मचारी नहीं माना। वह अपनी बात पर अडिग रहा कि सूर्यास्त हो चुका है, उसकी छुट्टी का वक्त हो गया है। राजकीय नियम यही कहता कि अब अन्न बांटने का काम बंद किया जाए, इसलिए नियमानुसार वह अन्न नहीं बांट सकता।
महाराजा अशोक बहुत ध्यान से यह दृश्य देख रहे थे। उन्होंने कड़कती आवाज में कर्मचारी को आदेश दिया कि वह भवन का द्वार खोले और उस वृद्ध महिला को उसके हिस्से का अन्न दे।
कर्मचारी हैरान था। उसे यह अनजान व्यक्ति इतने अधिकार से आदेश कैसे दे सकता है? आवाज सुनकर जब अंगरक्षक आ गए तो उसे मालूम हुआ कि ये सम्राट अशोक हैं। कर्मचारी के होश उड़ गए। उसने तुरंत वृद्धा के हिस्से का अन्न तोलकर दिया।
अशोक ने कर्मचारी को बताया कि कोई भी नियम इसलिए नहीं बनाया जाता कि उससे लोगों का जीवन मुश्किल में पड़ जाए। नियम इसलिए होता है ताकि लोगों को सुविधा हो। मात्र राजा का ही नहीं, कर्मचारियों का भी कर्तव्य है कि वे प्रजा के हितों का ध्यान रखें, उससे अच्छा बर्ताव करें।
यह कहकर उन्होंने अन्न की पोटली उठाई तथा अपने सिर पर रखी। महान विजेता, वीर शिरोमणि महाराजा अशोक एक साधारण वृद्धा के लिए अन्न की पोटली उठाने वाले सेवक बन गए! वे अन्न की पोटली उसके घर तक रखकर आए। वृद्धा ने अशोक को बहुत आशीर्वाद दिया। ऐसे ही अनेक आशीर्वादों के कारण अशोक का यश अमर है।
आज जब राशन की दुकानों पर गरीब के हिस्से का दाना हड़प लिया जाता है तो मैं महाराजा अशोक को याद करता हूं। काश कि हमारे देश में फिर वैसा ही कोई शासक आए जो भ्रष्ट, बेईमान, कामचोर, अभद्र और गरीब का हक मारने वाले लोगों को कठोरतम दंड दे।
जो राजा अपनी प्रजा से प्रेम करता है, वही उसके दिलों पर राज करता है। अशोक पर हिंसा और युद्धों के आरोप लगे हैं। वे सत्य भी हैं, परंतु यह भी सत्य है कि जब उन्होंने कलिंग के युद्ध में बहता लहू देखा, रक्तरंजित धरती देखी, अनगिनत लाशों का ढेर देखा, अनाथ बच्चों की पुकार सुनी और विधवा महिलाओं के आंसू देखे तो उन्हें बहुत ज्यादा पछतावा हुआ।
यह सच्चा पश्चाताप था। उन्होंने उसी समय युद्ध का त्याग कर दिया और बुद्ध का संदेश स्वीकार कर लिया। इसके बाद महाराजा अशोक ने पूरा जीवन लोगों के आंसू पोंछने, उनके कल्याण में लगा दिया। अंत भला तो सब भला। इसीलिए अशोक महान थे।
इतिहास में अपने महान कार्यों की छाप छोड़ने वालों में हजरत उमर (रजि.) का नाम सदैव याद रखा जाएगा। वे इस्लाम धर्म के दूसरे खलीफा थे। उनकी उपाधि फारूक थी, जिसका मतलब होता है सच और झूठ में फर्क समझने वाला। उमर (रजि.) सच में फारूक थे।
वे जितने महान योद्धा थे, उतने ही रहम दिल इन्सान भी थे। उन्होंने ऐसी व्यवस्था कायम की जिसमें किसी अफसर या कर्मचारी  की हिम्मत नहीं होती थी कि वह गरीब जनता का शोषण कर सके। उमर (रजि.) खुद बहुत सादगी से रहते थे। वे नर्म, बारीक, सजावटी कपड़े कभी नहीं पहनते।
शानो-शौकत, दिखावे से दूर रहते। उनके कुर्ते पर 27 पैबंद लगे थे। वे फरमाते थे कि जो शासक इन्साफ करता है, वह रात को बेखौफ सोता है। जब किसी को सरकारी पद पर नियुक्त करते तो सख्त नसीहत देते कि किसी भी फरियादी के लिए दरवाजा बंद मत करना। उमर (रजि.) भ्रष्टाचार को लेकर इतने सख्त थे कि कर्मचारी की नियुक्ति से पहले ही उसकी संपत्ति का पूरा ब्यौरा मांग लेते।
अगर कभी संपत्ति में बेहिसाब इजाफा पाते तो उसका हिसाब पूछते। रात को जब कारोबारी काफिले ऊंटों पर निकलते तो वे उनकी चौकीदारी करने पहुंच जाते। क्या ही नजारा रहा होगा! महान खलीफा हजरत उमर (रजि.) काफिलों की चौकीदारी करते थे! यह सच है।
इससे किसी अधिकारी का इतना साहस नहीं होता था कि वह काफिले को परेशान करे, उससे रिश्वत मांगे या उनके माल को हाथ लगाए। आज जब ट्रैफिक पुलिस द्वारा रिश्वतखोरी के समाचार पढ़ता हूं तो मुझे हजरत उमर (रजि.) याद आते हैं।
काश कि कोई तो हमारे मुल्क में हजरत उमर (रजि.) जैसा पैदा होता जो चारों ओर मची इस लूटमार को रोक देता। आज तो हाल ऐसा है कि लोगों को जन्म प्रमाण पत्र बनवाने से लेकर पोस्टमार्टम करवाने तक रिश्वत देनी पड़ती है।
हजरत उमर (रजि.) का इन्साफ बहुत प्रसिद्ध था। वे फरमाते थे कि मेरे दौर में अगर दरिया-ए-फरात के किनारे कोई कुत्ता भी भूख से मर गया तो उसकी सजा उम्रभर भुगतनी होगी।
लोगों को उनके प्रभाव व इन्साफ पर इतना गहरा यकीन था कि आज तक उनकी मिसाल दी जाती है। जब उनका इंतिकाल हुआ तो एक चरवाहा बहुत दूर से भागता हुआ मदीना पहुंचा। वह चिल्लाकर बोला- हजरत उमर (रजि.) का इंतिकाल हो गया।
लोगों को आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा, तुम तो मदीने से हजारों मील दूर जंगल में रहते हो। फिर तुम्हें इस दुर्घटना की जानकारी किसने दी?
चरवाहे ने जवाब दिया, जब तक उमर फारूक-ए-आजम (रजि.) जिंदा थे, मेरी भेड़ें निर्भय होकर जंगल में चरती थीं। कोई उनकी ओर आंख उठाकर देखने का दुस्साहस नहीं कर सकता था। मगर आज पहली बार एक भेड़िया मेरी भेड़ का मेमना उठा ले गया। मैं भेड़िए के दुस्साहस से जान गया कि हजरत उमर (रजि.) अब इस दुनिया में नहीं रहे।
ऐसी ही एक और घटना है। रात का समय था। मदीना में लोग सो चुके थे। हजरत उमर (रजि.) उस समय यह देखने के लिए निकले कि प्रजा को कोई दुख तो नहीं है। कई मील दूर निकल आए कि एक औरत दिखी। उसने चूल्हे पर हांडी चढ़ा रखी थी। पास में बच्चे रो रहे थे।
उमर (रजि.) वहां गए और पूछा, ये बच्चे क्यों रो रहे हैं?
जवाब मिला, भूखे हैं, इसलिए रो रहे हैं। घर में राशन नहीं है, इसलिए खाली हांडी में पानी डालकर पका रही हूं। इससे बच्चों को भोजन की उम्मीद बंधेगी और थोड़ी बाद रोते-रोते सो जाएंगे।
उमर (रजि.) को बहुत दुख हुआ। वे लौट आए तथा आटा, खजूर, घी आदि सामान लिया। जब उनके एक सहायक ने देखा तो बोला, आप यह क्या कर रहे हैं? मुझे दीजिए, मैं ले चलता हूं।
उमर (रजि.) ने कहा, कयामत के दिन मेरा बोझ तुम नहीं उठाओगे।
सब चीजें लेकर वे उस औरत के घर पहुंचे। खाना तैयार हुआ, बच्चों ने भरपेट खाया तथा चैन की नींद सो गए। यह दृश्य देखकर हजरत उमर (रजि.) के दिल को बहुत सुकून मिला। वह औरत बार-बार उन्हें दुआएं दे रही थी। बोली, तुम इतने रहम दिल हो। भले आदमी, खलीफा तो तुम्हें होना चाहिए था!
उस औरत को क्या पता कि जो उसके घर आया वह कोई और नहीं, खुद खलीफा ही था। शासन हो तो हजरत उमर (रजि.) जैसा, जहां सिर्फ नाम से नहीं, इन्साफ से शासन चलता था। ऐसे व्यक्ति को कोई महान कहे या न कहे, उसकी शान में कोई फर्क नहीं पड़ता।

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