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गुजरात दंगों के के कुछ सवाल कानून के नजर में आज भी अनसुलझे है पर आम जनता के पास उन सवालों के जवाब बखूबी मौजूद है। फिर भी आज हम उन सवालों पर एक बार फिर से नजर करते हैं।

1-27 फरवरी 2002 को गोधरा में जो हादसा हुआ उस के बाद नरेंद्र मोदी की मुख्यमंत्री की जो जवाब देही बनती थी उससे उलट उन्होंने बिना किसी जांच के इस घटना को आतंकवादी घटना कह डाला और राज्य की जनता को उकसाने के लिए यह भी कहा कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है यह कहने के पीछे उनका मकसद गुजरात में दंगो को भडकाना था यह हम सब जानते हैं लेकिन आज तक किसी जांच एजेंसी ने इसकी जांच नहीं की है लेकिन एस आइ टी के चेयरमैन राघवन ने इसमें लीपा-पोती करने का काम जरूर किया।

2-जब कोई हादसा होता है तो उसमें मारे गए व्यक्तियों की लाशों का पोस्टमार्टम ना किया जाए तब तक वह लाशें उनके परिवारजनों को भी नहीं दी जाती है क्योंकि इससे सबूतों के नष्ट होने की संभावना रहती है लेकिन गोधरा में 54 लाशें बिना पोस्टमार्टम के विश्व हिन्दू परिसद के ठेकेदारों को दे दी जाती है वह लाशों को लेकर पूरे शहर में घुमते है हम सब जानते हैं कि वह लाशें किसके इशारे पर बिना किसी कानूनी कार्रवाई के विश्व हिन्दू परिषद् को दी गई और उसका मकसद सिर्फ यही था कि शहर में दंगो को भड़काया जा सके लेकिन राघवनजी को यह तो दिखाई ही नहीं दिया कि इस पहलू की भी जांच करा ले नहीं नहीं उन्हें तो सिर्फ दंगा पीड़ितों को जिम्मेदार ठहरवाना था तो फिर वह इसकी जांच कैसे करवाते?

3-जब नरेंद्र मोदी को यह आभास हो गया था कि क्रिया की प्रतिक्रिया होगी तो उन्होंने तत्काल अपने ही पक्ष की केन्द्र सरकार से सेना भेजने के लिए क्यों नहीं कहा क्योंकि हमें तो पता था कि उनका एक मात्र मकसद दंगों को भडकाना था लेकिन राघवनजी ने इस की भी जांच नहीं करवाई शायद दंगों के लिए पीड़ितों को ही जिम्मेदार ठहराना था। और भी ऐसे कई बिन्दु है जिन पर जांच नहीं हुई।

अन्त में न्याय पालिका के लिए : जिस न्यायपालिका के पास जिस व्यक्ति के खिलाफ केस दर्ज कर न्याय के लिए आया ही नहीं ऐसे व्यक्ति को गुनाहगार करार कर दिया गया और इस तरह भारत की न्यायपालिका ने एक नया इतिहास रच डाला।

– एडवोकेट शमशाद पठान जन संघर्ष मंच

 (यह लेख सोशल मीडिया से लिया गया हैं, कोहराम न्यूज़ का लेख से कोई सरोकार नहीं हैं)


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