क्या मार्केट में यह बड़ी गिरावट वैश्विक मंदी की शुरुआत है? ऐसा हो भी सकता है। क्या मार्केट में गिरावट अस्थायी झटका है और यह खरीदारी का बड़ा मौका दे रही है, जैसा अगस्त 2013 के दौरान मिला था? ऐसा भी हो सकता है।

निराशावादी और आशावादी अपनी दलीलें दे सकते हैं। मॉर्गन स्टैनली के रुचिर शर्मा ने कर्ज के असाधारण स्तर (टोटल डेट जीडीपी के 240% से ज्यादा) को देखते हुए चाइनीज मार्केट में क्रैश का बहुत पहले अनुमान जता दिया था।

चीन की रेकॉर्ड ग्रोथ ने 2003 के बाद सभी कमोडिटी एक्सपोर्टर्स की पौ बारह कर दी थी और अब चीन की सुस्ती ने इन सबको पस्त भी कर दिया है। यूरोप पहले से सुस्त है। अमेरिका एकमात्र बड़ा देश है, जो दमदार ढंग से ग्रोथ दर्ज कर रहा है। हो सकता है कि अंत में वही ग्लोबल बायर की भूमिका में आए और ग्लोबल रिसेशन की स्थिति को टाल दे। यह भी हो सकता है कि वह ऐसा न कर पाए।

निराशावादी याद दिला सकते हैं कि पिछले सात वर्षों में बड़े देश मंदी से निपटने का गोला-बारूद पहले ही खर्च कर चुके हैं। इकनॉमी को सहारा देने के लिए जो बड़े पैकेज दिए गए, उनके बावजूद चीन में पस्तहाली है। इसी पैकेज के चलते प्रॉपर्टी और स्टॉक्स में जो बुलबुले बने थे, वे अब फट रहे हैं।

OECD देशों में ब्याज दरें पहले से शून्य के करीब हैं, लिहाजा वहां मॉनेटरी पॉलिसी बिना गोलियों वाली बंदूक जैसी हो गई है। कई देशों में फिस्कल डेफिसिट का लेवल ठीकठाक है, लेकिन वहां इकनॉमी को रफ्तार देने की दमदार राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिख रही है। वर्ल्ड एक्सपोर्ट डिमांड तेजी से घट रही है। अगर मॉनेटरी पॉलिसी, फिस्कल पॉलिसी या एक्सपोर्ट्स का उपयोग अर्थव्यवस्थाओं में जान फूंकने में नहीं हो सकता है तो फिर किससे बात बनेगी?

आशावादी जवाब दे सकते हैं कि स्टॉक मार्केट की अफरातफरी असल इकनॉमिक ट्रेंड्स के मुताबिक नहीं है। आईएमएफ ने जुलाई में वर्ल्ड जीडीपी ग्रोथ रेट 3.3% रहने का अनुमान दिया था और अगर वह घटकर 3% हो जाए तो भी मंदी के स्तर (मोटे तौर पर 2-2.5% ग्रोथ) से ज्यादा ही होगी। दुनियाभर में एसेट मार्केट्स नरम मॉनेटरी पॉलिसी के कारण लंबे अरसे से बुलबुले की ओर बढ़ रहे थे। तो गिरावट जायज है, लेकिन यह मंदी का संकेत नहीं है।globle-recessionचाइनीज आंधी के सामने खड़ा रहने और इससे सबसे पहले उबरने के मामले में इंडिया इमर्जिंग मार्केट्स के बीच सबसे अच्छी पोजीशन में है। हालांकि इमर्जिंग मार्केट्स से पैसा निकालने की भगदड़ मच ही जाए तो इंडिया को भी धक्का लगेगा।

तो कुछ वक्त के लिए बुरे दिनों का मामला है। जोखिम लेने वाले इन हालात में इस उम्मीद पर दांव खेल सकते हैं कि हालात बदलने पर बड़ा फायदा होगा। जो रिस्क न लेना चाहें, उन्हें कैश बचाए रखना चाहिए।

स्वामीनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर


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