बात गम्भीर है। खुद प्रधानमंत्री ने कही है, तो यकीनन गम्भीर ही होगी! पर इससे भी गम्भीर बात यह है कि प्रधानमंत्री की इस बात पर ज्यादा बात नहीं हुई। क्योंकि देश तब कहीं और व्यस्त था। उस आवेग में उलझा हुआ था, जिसके बारूदी गोले प्रधानमंत्री की अपनी ही पार्टी के युवा संगठन ने दागे थे! भीड़ फैसले कर रही थी। सड़कों पर राष्ट्रवाद की परिभाषाएं तय हो रही थीं। पुलिस टीवी कैमरों के सामने हो कर भी कहीं नहीं थी। टीवी कैमरों को सब दिख रहा था। पुलिस को कुछ भी नहीं दिख रहा था। दुनिया अवाक देख रही थी। लेकिन इसमें हैरानी की क्या बात? क्या ऐसा पहले नहीं हुआ है? याद कीजिए!

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और प्रधानमंत्री उड़ीसा जा कर कह रहे थे कि कुछ एनजीओ वाले और कुछ कालाबाजारिए उनकी सरकार को सफल होते नहीं देखना चाहते! वे उनके खिलाफ लगातार षड्यंत्र रच रहे हैं ताकि उनकी सरकार फेल हो जाए। और दिल्ली की सड़कों पर पसरी उस उन्मत्त भीड़ में हम उन ‘षड्यंत्रकारी’ एनजीओ वालों और कालाबाजारियों को ढूंढ रहे थे, जो बकौल प्रधानमंत्री उनकी छवि खराब करने की साजिशों में लगे हैं। एनजीओ और कालाबाजारियों को तो हम पहचान नहीं पाए, कुछ काले कोट वाले जरूर टीवी कैमरों ने दिखाए। भीड़ में कुछ और लोग भी दिखे, जो प्रधानमंत्री की अपनी ही पार्टी के निकले!

जो दिख कर भी नहीं दिखता है! तो प्रधानमंत्री की छवि को कौन खराब कर रहा है? वे कौन लोग हैं, जो उनकी सरकार पर धब्बे लगा रहे हैं? वे कौन लोग हैं, जो पिछले इक्कीस महीनों में अचानक हर जगह दिखने लगे, और जिनकी कारगुजारियों से अखबारों के पन्ने रंगे जाने लगे। देश के अखबारों पर भरोसा न हो, तो दुनिया भर के अखबारों को उठा कर देख लीजिए। जो बात दुनिया भर के अखबारों को पिछले इक्कीस महीनों में लगातार दिखती रही है, वह प्रधानमंत्री को अब तक नहीं दिखी! हैरत है। और जो बात प्रधानमंत्री को दिख रही है, वह दुनिया भर के अखबारों में से किसी को अब तक नहीं दिखी!

सवालों में उलझा देश प्रधानमंत्री मानते हैं कि कुछ लोग उनकी सरकार को विफल करने में लगे हैं। हम भी मानते हैं कि पिछले इक्कीस महीनों में कुछ लोग प्रधानमंत्री को विफल करने में लगातार लगे हैं। इस मुद्दे पर कोई मतभेद नहीं। मतभेद सिर्फ इस बात पर है कि वे लोग हैं कौन? कुछ एनजीओ वाले और कालाबाजारी या फिर ‘परिवार’ वाले?

पिछले इक्कीस महीनों में देश किन सवालों में उलझा रहा? और ये सवाल इन इक्कीस महीनों में ही क्यों इस तरह बलबला कर उठे? और उठे तो एक दिन अचानक ‘स्विच ऑफ’ क्यों हो गए? यह ‘स्विच’ कहां है? इसे कौन ‘ऑन’ और ‘ऑफ’ करता है? गिरजाघरों पर हमले हो रहे थे। सुना कुछ चोर-उचक्के ऐसा कर रहे थे! दुनिया भर में हल्ला-गुल्ला हुआ। तो एक दिन अचानक हमले बन्द हो गए! हैरत है। वे ‘चोर-उचक्के’ इक्कीस महीने पहले क्यों इन गिरजाघरों में क्यों नहीं घुसते थे और अब करीब साल-सवा साल से क्यों नहीं घुस रहे हैं? किसके कहने पर देश भर के ‘चोर-उचक्कों’ ने गिरजाघरों से अचानक मुंह मोड़ लिया?

कौन करता है स्विच ऑन, स्विच ऑफ? ‘घर-वापसी’ का स्विच ‘ऑन’ हुआ, फिर ‘ऑफ’ हो गया, ‘लव जिहाद’ का स्विच ‘ऑन’ हुआ, फिलहाल ‘ऑफ’ दिखता है. ‘बीफ’ के मुद्दे पर हाहाकार हुआ, बिहार चुनावों में मुद्दा वैसा कारगर साबित नहीं हुआ, जैसा सोचा गया था। इसलिए अब उतना गरम नहीं, लेकिन फिलहाल अभी ‘स्विच ऑफ’ नहीं हुआ है, क्योंकि ‘जनता की आस्था’ के नाम पर इसे गुड़गुड़ाए रखा जा सकता है! और अब ताजा मुद्दा है राष्ट्रवाद का, देशप्रेम और देशद्रोह का। भावुक सवाल है। देश फिलहाल आवेग में है।

बहस गम्भीर है, गम्भीरता से कीजिए! लेकिन गम्भीर सवालों पर बहस क्या आवेग में होती है? भला हो सकती है क्या? ऐसे फैसले क्या सड़कों पर या टीवी चैनलों के स्टूडियो में होंगे? और ऐसे मुद्दों को परखने के पैमाने क्या होंगे, कोई एक या अपनी सुविधानुसार अलग-अलग?

मुद्दा यह नहीं कि जिन्होंने देश-विरोधी नारे लगाए, उनके खिलाफ कार्रवाई न की जाए। कार्रवाई जरूर की जाए, जो न सिर्फ कानूनन उचित हो बल्कि दिखे भी कि उचित है। लेकिन पुलिस ने क्या कार्रवाई की और क्यों की, यह सबके सामने है। सबको पता है कि देश-विरोधी नारे कुछ कश्मीरी छात्रों ने लगाए। उनको पकड़ने की आज तक कोई कोशिश क्यों नहीं की गई? क्या इसलिए कि पीडीपी के साथ सरकार बनाने का मामला इससे खटाई में पड़ जायेगा? कन्हैया कुमार के मामले में पुलिस का रवैया क्या रहा और ओ.पी. शर्मा और विक्रम चौहान के मामले में क्या रहा, यह सबके सामने है। किसने फर्जी वीडियो बनाए, लोगों के बीच नफरत फैलाने के लिए वह किसने बंटवाए, इस साजिश के पीछे कौन लोग थे और क्यों थे, पुलिस ने जानने की कोई कोशिश नहीं की। समाज में जानबूझकर जहर घोलने की इतनी बड़ी साजिश करना क्या कोई संगीन अपराध नहीं है कि पुलिस उसका पता लगाने की कोई कोशिश न करे?

सीमा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की यह तर्क गलत नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी एक सीमा होती है और इसका मतलब देश-विरोधी नारे लगाना नहीं है। लेकिन यह तर्क भी सही नहीं कि नारे लगा देने भर से ही देशद्रोह का मामला बन जाता है! ऐसे ही पिछले कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले आ चुके हैं। इस मामले को उन फैसलों की रोशनी में क्यों नहीं देखा जाना चाहिए था?

तो यह क्यों देशद्रोह नहीं हुआ? वैसे वेंकैया नायडू ने जेएनयू के नारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में देखे जाने की अमेरिकी राजदूत रिचर्ड वर्मा की सलाह की आलोचना की है और पूछा है कि क्या अमेरिका के किसी विश्विद्यालय में कोई उसामा बिन लादेन की ‘शहादत’ की बरसी मनाने की इजाजत दे सकता है? वेंकैया जी का सवाल बिलकुल जायज है। सवाल ही नहीं उठता कि अमेरिका ऐसी इजाजत दे दे! और अमेरिका क्यों, भारत में भी कोई ऐसी इजाजत दिए जाने की न मांग कर सकता है और न ही समर्थन। लेकिन इसी तर्क पर भिंडरावाले की ‘शहादत’ की बरसी मनाने की इजाजत भी नहीं दी सकती, जो अभी कुछ ही महीने पहले जम्मू में मनाई गई, जहां बीजेपी तब सत्ता में साझेदार थी। और जब दिल्ली में जेएनयू का मामला गरमा रहा था, तभी पंजाब में भिंडरांवाले का जन्मदिन धूमधड़ाके से मनाया जा रहा था। वहां भी बीजेपी सत्ता में साझीदार है। लेकिन किसी के खिलाफ देशद्रोह तो दूर, कैसा भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ!

और यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि जेएनयू के नारों पर जैसी प्रतिक्रिया हुई, जादवपुर विश्विद्यालय में ठीक वैसे ही नारों पर लगभग उदासीन प्रतिक्रिया क्यों रही? ममता बनर्जी सरकार अगर अपने राजनीतिक हितों के लिए ‘देशद्रोहियों’ पर नरम है, तो देश के बाकी हिस्सों में ममता बनर्जी के खिलाफ गुस्सा क्यों नहीं फूटा, वैसे फर्जी वीडियो क्यों नहीं बने, टीवी चैनलों पर वैसी गरमी क्यों नहीं दिखी?

सरकार की मर्जी तो देशद्रोह, नहीं तो नहीं! और देशद्रोह के आरोप का क्या? जब मर्जी हो सरकार लगा दे, जब मर्जी हो वापस ले ले! सुना है कि पटेलों को मनाने के लिए गुजरात सरकार हार्दिक पटेल के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा वापस लेने की तैयारी कर रही है। इस पर भी कहीं कोई हंगामा नहीं हुआ कि एक ‘देशद्रोही’ के खिलाफ कार्रवाई ऐसे कैसे छोड़ी जा सकती है? उसने तो पुलिसवालों की हत्या के लिए भीड़ को बाकायदा उकसाया था! हालांकि जब उस पर देशद्रोह का मामला लगाया गया था, तब भी मैंने उसे आनन्दीबेन सरकार का मूर्खतापूर्ण कदम कहा था और आज भी मेरी राय वही है।

हम कैसा देश बनाना चाहते हैं? हम कैसा देश बनाना चाहते हैं? हमें कैसा राष्ट्रवाद चाहिए? देशद्रोह की परिभाषा क्या हो? हमें कैसा संविधान चाहिए? हमें कैसा सेकुलरिज्म चाहिए? चाहिए या नहीं चाहिए? हिन्दू राष्ट्र चाहिए? अन्तर्धार्मिक शादियां हों या नहीं हों? फासीवाद चाहिए? आरक्षण का क्या हो? यह सवाल अगर अब भी बाकी हैं या अब भी उठ रहे हैं तो दंगाई भीड़ बनने के बजाय इन पर खुल कर बहस कर लीजिए और एक अन्तिम बार तय कर लीजिए कि आपको कैसा देश चाहिए? एनजीओ वालों को कोसने के बजाय प्रधानमंत्री इन सवालों पर देश भर में साल-दो साल बहस चला लें, जनमत संग्रह करा लें और फिर फैसला हो जाए कि देश किस रास्ते पर चलना चाहता है। ताकि रोज-रोज का यह टंटा खत्म हो!

दिल्ली में जेएनयू के मामले पर और हरियाणा में आरक्षण के मुद्दे पर जो कुछ हुआ, उसके संकेत एक बड़ी चेतावनी हैं। हरियाणा में चुन-चुन कर जैसे गैर-जाटों को निशाना बनाया गया, वह भयानक था। देश भीतर-भीतर कितना बंट चुका है, कैसी नफरतें पसर चुकी हैं? देश को इस भीड़तंत्र में बदल देने का जुआ बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। यह मानने का दिल नहीं करता कि प्रधानमंत्री इसके निहितार्थ नहीं समझते होंगे।

(वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी के ब्लॉग raagdesh.com से साभार)


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