पाकिस्तान के मुमताज़ कादरी को फांसी दिए जाने के सन्दर्भ में चल रही बहस में किसी भी पत्रकार ने ,यहाँ तक कि फेसबुक के मुस्लिम-बुद्धिजीवियों ने भी इस सच्चाई को लोगों के सामने रखने की कोई इमानदार कोशिश नहीं की है कि यह मुद्दा ” नामूसे-रिसालत ” से सम्बन्ध रखता है जिसकी तौहीन करने और जिसकी तौहीन करने वाली आसिया बीबी की निर्लज्ज हिमायत करने के कारण मुमताज़ कादरी ने सलमान तासीर को मौत के घाट उतारा था . यह मामला अज़मते-रसूल बनाम तौहीने-रसूल का है , जबकि इसे प्रगतिशीलता बनाम कट्टरपंथ का नाम दिया जा रहा है और जबरन यह शोर मचाया जा रहा है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथ अब अपने चरम पर पहुँचने लगा है.

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मैं भारत और पाकिस्तान के तमाम मुस्लिम बुद्धिजीवियों से पूछना चाहता हूँ कि अगर सलमान तासीर की हत्या निंदनीय है तो मुमताज़ कादरी की फांसी निंदनीय क्यों नहीं है ? . बुजुर्गों ने कहा है कि शाब्दिक हिंसा तो हथियारों के द्वारा की गयी हिंसा से भी ज्यादा घातक ,संहारक और मर्म स्थल पर आघात करने वाली होती है यह शाब्दिक हिंसा जिसका दर्द बरसों -बरस बीतने के बाद भी ख़त्म नहीं होता …तो अगर आसिया बीबी को ( और सलमान तासीर को भी ) नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम पर शब्द बाण चलाने का अधिकार है तो मुमताज़ कादरी को सलमान या किसी ऐसे ही ज़ख्म देने वाले पर गोली चलाने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए ? अगर आप आसिया बीबी और सलमान तासीर के अपराध पर दो शब्द भी नहीं बोलते और मुमताज़ कादरी को ” कट्टरपंथी ” का ख़िताब देते हैं , तो यह मान लिया जाये कि आपके दिल में सलमान तासीर की “जान ” की तो बड़ी कीमत है , मगर रसूल ( सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ) की ” इज्ज़त ” की कोई कीमत नहीं है ,जिन पर आसिया बीबी ने कीचड़ उछाला और जिसका सलमान तासीर ने पूर्ण समर्थन किया ???

आइये पहले यह देखें कि सलमान तासीर का अपराध क्या था ? शायद आपने इस बारे में सोचने की ज़हमत ही गवारा नहीं की , सन 2011 में पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने वहां की एक ईसाई नागरिक आसिया बीबी को ” तौहीने-रिसालत ” अर्थात नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के अपमान के ज़ुर्म में 295 c के तहत फांसी की सज़ा सुनाई थी . कायदे से सलमान तासीर को सर्वोच्च अदालत का सम्मान करना चाहिए था और इस निर्णय के खिलाफ कोई कौल या फेअल से बचना था .मगर उन्होंने अदालत के निर्णय से टकराते हुए आसिया बीबी के साथ एक प्रेस कांफ्रेंस की और 295 c की आलोचना तक कर दी थी ., यह सरासर अदालत की अवमानना थी और इसके लिए सलमान तासीर के खिलाफ ” अदालत की अवमानना ” का मुकदमा दर्ज होना चाहिए था , जो पश्चिमी देशों के पिट्ठू पाकिस्तानी शासकों की कमज़र्फी के कारण नहीं किया गया .

“यही नहीं , सलमान तासीर खुद को इतना ज्यादा संविधानेत्तर सत्ता समझ बैठे थे कि उन्होंने ” तहफ्फुज़े-नामुसे रिसालत कानून 295 c ” को काला कानून कह कर मज़ाक उड़ाया ,जो पाकिस्तान के कानून और संविधान का अपमान था जिसके लिए उन पर देशद्रोह और संविधान द्रोह का मामला दर्ज किया जा सकता था , मगर पाकिस्तान की बेगैरत सरकार ने वह भी नहीं किया”

इसके बाद पाकिस्तान के ओलमा ने अपना फ़र्ज़ समझते हुए सलमान तासीर को कहा कि वे गुस्ताखे-रसूल का साथ न दें और इस कानून का एह्तराम करें , उन्होंने सलमान तासीर को रुजू करने को भी कहा , मगर सलमान तासीर ने उनकी बातों और फतवे का मज़ाक उड़ाया और कहा कि ऐसे फतवों को मैं जूते की नोंक पे रखता हूँ .

ज़ाहिर है कि इस घटनाक्रम से पाकिस्तान की अदालत , संविधान और तहफ्फुज़े नामुसे-रिसालत कानून धज्जियाँ उड़ रही थीं और तौहीने रिसालत करने वालों के हौसले बुलंद हो रहे थे . मगर पाकिस्तान की अमेरिका परस्त सरकार ने सलमान तासीर पर कोई कार्रवाई नहीं कि जिसका नतीजा यह निकला कि लोगों का आक्रोश दिन-ब -दिन बढ़ता रहा,. अंततः नतीजा यह निकला कि उसी आक्रोश की अभिव्यक्ति के रूप में मुमताज़ कादरी ने सलमान तासीर पर गोलियों की बारिश कर के उसका काम तमाम कर दिया ///

हैरत की बात यह है कि इस पूरे प्रकरण में पाकिस्तान का ” तहफ्फुज़े-नामूसे रिसालत कानून ” और रसूल ( सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ) की शान में की जाने वाली गुस्ताखियों पर कोई चर्चा ही सिरे से गायब कर दी गयी हैं और सारी बहस और आलोचना सलमान तासीर के हत्यारे मुमताज़ कादरी को ही केंद्र में ले कर की जा रही है .खुद को सेक्युलर कहलवाने को बेताब ऐसे मुसलमान सामने आते जा रहे हैं , जो खुद को तो मुसलमान कहते हैं और रसूल ( सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ) का कलमा पढ़ते हैं , मगर मुमताज़ कादरी के जनाज़े में शामिल मुसलमानों के हुजूम को ” कट्टरपंथ के महिमामंडन ” का नाम देते हैं . इन मुसलमान-लेखकों और भारत के उन दक्षिणपंथियों में क्या अंतर है जिन्होंने याकूब मेमन के जनाज़े में शामिल मुसलमानों को ” भावी आतंकवादी ” के नाम से संबोधित किया था ? इनके लिए मुमताज़ कादरी का महिमामंडन चिंता का विषय है , मगर आसिया बीबी और सलमान तासीर के द्वारा रसूल ( सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ) का अपमान किया जाना चिंता का विषय नहीं है …इनको मुमताज़ कादरी के जनाज़े में लाखों की भीड़ देख कर पाकिस्तान का भविष्य खतरे में नज़र आता है , मगर अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर रसूल ( सल्लल्लाहो अ अलैहे व सल्लम ) की तौहीन और इस्लाम का अपमान देख कर इस्लाम का भविष्य खतरे में नज़र नहीं आता …इनके लिए मुमताज़ कादरी जैसे ” चरमपंथियों ” पर काबू पाना और त्वरित न्याय करते हुए फांसी की सज़ा देना ज़रूरी लगता है , मगर तौहीने-रिसालत करने वाले गुस्ताखों पर काबू पाना और उनको सज़ा दिलाना ज़रूरी नहीं लगता जिसके लिए पाकिस्तान जैसे इस्लामी मुल्क में आज की तारिख में इस अपराध के आरोपियों की संख्या आश्चर्यजनक रूप से बढ़ती जा रही है ///

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भारत जैसे देश में , जहाँ ” तहफ्फुज़े नामूसे रिसालत ” जैसा कोई कठोर कानून नहीं है , फिर भी यहाँ आज़ादी के ६५ सालों में कमलेश तिवारी के अलावा किसी गैर-मुस्लिम ने अल्लाह के रसूल ( सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ) के खिलाफ कभी कोई अपमानजनक बात नहीं कही . मगर क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि पाकिस्तान जैसे कट्टर इस्लामी देश में , जहाँ इसाई अल्पसंख्यक दोयम दर्जे के नगरीक बन चुके हैं , जो अपने लिए रोज़ी-रोटी का जुगाड़ करने में ही मर जाते हैं , उस पाकिस्तान में १९४७ से लेकर 2010 तक ईशनिंदा कानून के तहत 1274 लोगों पर आरोप दर्ज किये जा चुके हैं जिनमे से अधिकतर संख्या गरीब ईसाईयों की है .///
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जिस मुद्दे पर चर्चा सिरे से गायब है ,वह यह है कि पश्चिमी सलीबी जगत इस्लाम द्वारा पेश की गयी सांस्कृतिक चुनौती का सामना कर पाने में अपनी नाकामी से बौखला कर इस्लामी आस्थाओं पर लगातार हमले कर रहा या करवा रहा है .फ़्रांस,हॉलैंड और ब्रिटेन में बुर्के पर प्रतिबन्ध लगाये जा रहे हैं . स्विट्ज़रलैंड में मस्जिद में मीनारें बनाने पर पाबन्दी लगायी जा रही है .कजाकिस्तान में हाल ही में 10000 मुसलमानों की दाढ़ियाँ कटवा दी गयीं. डेनमार्क के अख़बार लगातार इस्लाम-विरोध कार्टूनों का प्रकाशन किये जा रहे हैं. पाकिस्तान में आसिया बीबी द्वारा रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम की शान में गुस्ताखी इन्ही पश्चिमी षड्यंत्रों का एक हिस्सा है जिसकी परिणति सलमान तासीर की हत्या और उसके बाद मुमताज़ कादरी की फांसी के रूप में सामने आई है ///
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वास्तव में आज बहस अभिव्यक्ति की अनियंत्रित आज़ादी पर होनी चाहिए थी , मगर बहस मुमताज़ कादरी के बहाने इस्लामी कट्टरपंथ पर हो रही है . अभिव्यक्ति की आज़ादी को अपनी सीमारेखा खुद तय करनी होगी .उस आज़ादी को मान्यता नहीं दी जा सकती , जो अनियंत्रित हो कर समूची पृथ्वी पर फैली सम्पूर्ण आबादी के 6 वें हिस्से के धार्मिक -विश्वासों को अपमानित करती है . ऐसा करने वाला व्यक्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को ही अपवित्र कर देता है और उसे घृणा फ़ैलाने की आज़ादी में रूपांतरित कर देता है .अगर आप वास्तव में मानवतावादी मूल्यों को मानते हैं और निष्पक्ष दृष्टिकोण रखते हैं तो आपको आसिया बीबी और सलमान तासीर का भी वैसा ही विरोध करना चाहिए ,जैसा आज आप मुमताज़ कादरी और उनके बहाने तथाकथित इस्लामी कट्टरपंथ का विरोध कर रहे हैं ///
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मोहम्मद आरिफ दगिया


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