30_SM_MUSLIM_1_1815188f

खुद को ” तौहीद ” का अलमबरदार समझने वाले और बात बात पर सुन्नियों पर ” शिर्क ” का फतवा देने वाले दारुल उलूम देवबंद ने एक बार फिर शिर्क के मामले में अपरिपक्वता का परिचय दिया है . कल जारी एक फतवे में दारूल उलूम के मुफ्तियाने-किराम ने कहा कि ” भारत माता की जय ” का नारा लगाना मुसलमानों के लिए जायज़ नहीं है , चूँकि मुसलमान एक अल्लाह को मानते हैं ,इसलिए यह नारा लगाना ” वंदेमातरम ” के जैसा ही है ,जो शिर्क को प्रतिबिंबित करता है , लिहाज़ा मुसलमानों को ” भारत माता की जय ” के नारे से खुद को दूर रखना चाहिए

देखा जाये तो यह फतवा भी दारुल-उलूम देवबंद के इससे पहले के ” शिर्किया ” फतवों ( जो वे सुन्नियों पर लगाते हैं ) की तरह आधारहीन , तर्कहीन और कुरान-हदीस की गलत व्याख्या पर आधारित है . यह फतवा देवबंदी मसलक के ओलेमाओं की उस विचारधारा का नवीन संस्करण है जिसके अंतर्गत वे अवलिया-अल्लाह के मजारात पर जाने को भी ” शिर्क ” का नाम देते और सुन्नी -मुसलमानों को मुशरिक और कबर-पुजवा जैसे अपमानजनक संबोधनों से नवाज़ा करते हैं . सबसे पहली बात तो यह है कि ” जय ” का अर्थ ” इबादत ” करना नहीं होता , जैसा कि दारुल-उलूम ने नासमझी में समझा है . यह ” वन्दे मातरम ” से बिलकुल अलग है . किसी की ” वन्दना ” करना अलग बात है और किसी की जय ” कहना अलग बात है .इसलिए किसी की ” जय ” कहने का अर्थ उसकी इबादत करना नहीं होता , लिहाज़ा भारत माता की जय का अर्थ भारत नाम की माता की मात्र विजय की कामना करना है , उसकी इबादत करना नहीं है , अतः ऐसा कहने से किसी प्रकार का शिर्क साबित नहीं होता

अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या इस्लाम की दृष्टि में भारत की सरज़मीन को माता कहा जा सकता है ? इसका जवाब मुझे हुज्जतुल इस्लाम हजरत इमाम गजाली रहमतुल्लाह अलैह की मशहूर किताब ” मुकाशफतुल कुलूब ” में मिला ,जिसमे उन्होंने ” तिबरानी ” की यह हदीस बयान की है . अल्लाह के रसूल हुजुर पाक सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम फरमाते हैं —

“ज़मीन पर गुनाह करने से परहेज़ करो , क्योकि यह तुम्हारी ” माँ ” है और जो शख्स भी उस पर कोई अमल ( काम) करता है ,वह उसकी क़यामत के दिन खबर देगी .” (सफा नम्बर 238 )
.
इस हदीस से ज़ाहिर है कि ज़मीन को ” माँ ” कहना इस्लाम के नज़रिए के ऐन-मुताबिक है और इससे कोई भी गुनाह या शिर्क साबित नहीं होता .लिहाज़ा सिद्ध हुआ कि भारत-भूमि को ” भारतमाता ” कहना और भारत माता की जय कहना इस्लाम की दृष्टि से सही है और ऐसा कहने वाले शख्स पर उसकी इबादत करने का या शिर्क का इलज़ाम नहीं लगाया जा सकता ///

kohram news hindi
मुझे आश्चर्य होता है कि दारुल-उलूम देवबंद के मुफ्तियाने-किराम की नज़र इस हदीसे-पाक पर क्यों नहीं गयी जिसे पढ़ने के बाद किसी तरह के शको-शुबहात की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती .यह सही है कि आरएसएस भारत को एक ” माता ” के रूप में मानता है और उसकी तस्वीर अपने कार्यक्रमों और आयोजनों में लगाता है , मगर मुसलमान भारत को उसी अर्थ में “माँ ” मानते हैं ,जिस अर्थ में अल्लाह के रसूल ( सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ) ने उसे ” माँ ” का दर्ज़ा दिया है .एक मुसलमान जब भारत को ” माँ ” कहता है तो उसकी कल्पना में कोई मूर्ति या तस्वीर नहीं होती और उसकी ” जय ” बोलने में भी किसी तरह की ” इबादत ” की नीयत नहीं होती , लिहाज़ा ” भारत माता की जय ” बोलने से किसी तरह का शिर्क साबित नहीं होता और ऐसा कहना इस्लाम के खिलाफ नहीं है और इस्लाम ऐसा कहने से कभी रोकता नहीं है.

लेकिन इसके साथ ही उन तथाकथित ” राष्ट्रभक्त ” पार्टियों के ठेकेदारों से भी यह कहना चाहूँगा कि वे यह सर्टिफिकेट देना बंद कर दें कि भारतमाता की जय न बोलने वाले लोग देशद्रोही हैं , जैसा की भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव सरोज पाण्डेय ने कहा है ,जो कि मेरे ही प्रदेश छत्तीसगढ़ की रहने वाली हैं . ये उस पार्टी और विचारधारा से सम्बन्ध रखती हैं जिन्होंने देश की आज़ादी के आन्दोलन में ज़र्रा बराबर भी हिस्सा नहीं लिया ,इसलिए इन्हें देशभक्ति के मानदंड तय करने का कोई अधिकार नहीं है . बल्कि सच तो यह है कि जब सारा देश , देश के सारे हिन्दू और मुसलमान अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट हो कर अपनी जान की बाज़ी लगाकर देश को आजाद कराने ले लिए लड़ रहे थे , उस वक़्त ये संगठन हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता का ज़हर फैलाने में व्यस्त थे और देश की आज़ादी के आन्दोलन को कमज़ोर कर रहे थे .इसलिए दारुल-उलूम देवबंद का फतवा गलत ज़रूर है , मगर उसको ले कर कोई भी यह नहीं कह सकता कि भारतमाता की जय न बोलने वाले देशद्रोही हैं , क्योकि दारुल-उलूम देवबंद ने भी देश की आज़ादी के संग्राम में हिस्सा लिया था , यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है और इस सच्चाई से आरएसएस भी इनकार नहीं कर सकता ,जिससे जुड़े लोगों ने अंग्रेजों की मुखबिरी की और अंग्रेजों से माफियाँ मांग कर अपनी रिहाई भी सुनिश्चित करवा ली थी

आपको याद होगा , असदुद्दीन ओवैसी द्वारा भारतमाता की जय नहीं बोलने वाले बयान की फेसबुक के कई मुस्लिम-बुद्धिजीवियों ने कड़ी आलोचना की थी .इनमे से अधिकतर वे हजरात थे जो वैचारिक रूप से दारूल-उलूम देवबंद के अकीदे को फॉलो करते हैं . आज जबकि दारुल उलूम का फतवा सामने आ चूका है , तो वे अहले-इल्म हजरात , जो हमेशा ओवैसी -बंधुओं पर बीजेपी को फायदा पहुंचाने और मुसलमानों की धार्मिक भावनाएं भड़काने का आरोप लगाते हैं , उन्ही दानिश्वरों से मेरा मोअद्दबाना सवाल है कि अगर ओवैसी के पूर्व के बयान से देश में धार्मिक कट्टरता फैली थी तो दारुल उलूम देवबंद के इस फतवे से देश में धार्मिक कट्टरता फैलेगी या नहीं ?और अगर हाँ , तो क्या ये मुस्लिम दानिश्वर उसी तरह दारुल-उलूम देवबंद की आलोचना करेंगे , जिस तरह इन्होने मुखर हो कर असदुद्दीन ओवैसी की आलोचना की थी ?

मोहम्मद आरिफ दगिया

आप भी अपने लेख [email protected] इस ईमेल आईडी पर भेज सकते है

नोट  – इस कॉलम में प्रकाशित कंटेंट लेखको के निजी विचार है , कोहराम की सहमती अनिवार्य नही है


लाइक करें :-


Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें

कमेंट ज़रूर करें