बचपन गुज़र रहा था और समझ पनप रही थी, समाज की पहेलियाँ खुलने लगी थीं, इसमें पैर पसारे उंच नीच धर्म अधर्म के मसले खुली आँख से दिखाई देने लगे थे ,उस वक़्त इसकी जड़ें कहाँ हैं कैसी हैं कुछ नहीं मालूम था लेकिन आपस में नफ़रत घृणा की वजह सोचने पर मुझे एक चीज़ दिखाई दी, वोह थी धार्मिक स्थानों की ऊँचाइयों पर लगे लाउडस्पीकर और धीरे धीरे मुझे हर लाउडस्पीकर समाज का खलनायक लगने लगा ,इस मसले पर लोगों से चर्चा करने लगा लेकिन सब हँस के टाल देते, एक सरकारी सहायता प्राप्त संगठन चलाने वाले एक साहब से चर्चा हुई कि क्यूँ न सब लाउडस्पीकर हटाने का कोई आदेश हो जाये उन्होंने भी इसको असंभव के करीब माना और तब तक मैं भी समाज का हिस्सा होकर इन खलनायकों का आदी हो चुका था लेकिन हमेशा सोचता था और आज भी सोचता हूँ कि जैसे किसी भिश्ती को एक दिन की सल्तनत मिलने पर उसने चमड़े का सिक्का चलवा दिया था मुझे एक दिन का अधिकार मिल जाये तो मैं हर धार्मिक स्थल के ऊपर लगा लाउडस्पीकर उतरवा दूँ …

Farhan

मोबाइल का दौर आ गया था और तरक्क़ी करते करते मोबाइल की अहमियत उसमें लगे कैमरे के मेगापिक्सेल से जांची जाने लगी और फिर हर मोबाइल वाले हाथ में एक बेहतरीन कैमरा आ गया , मुझे तब तक इससे फैलने वाली नफरत का अंदाज़ा नहीं था लेकिन फिर धीरे धीरे उन कैमरों से लिए फोटो सोशल नेटवर्क्स पर फैलने आसान हो गए तो मैं फिर उसी लाउडस्पीकर वाली पोजीशन पर पहुँच गया अब लाउडस्पीकर की खलनायक छवि कमज़ोर पड़ रही थी और उसकी जगह इस फोटो विडियो के इतने आसान फैलाव से होने वाले नुक्सानात की दहशत ले रही थी ,डिजाइनिंग इंजिनियर होने के नाते AutoCAD आदि सॉफ्टवेयर्स के साथ साथ फोटोशोप भी कामभर का सीख चूका था इसलिए भी यह दहशत मज़बूत हो रही थी….

फेसबुक और अपनी बैठकों में कई बार मैं इस फ़िक्र को ज़ाहिर कर चूका हूँ हालात अब बद से बदतर होते जा रहे हैं इसलिए अब यह ज़रूरी है कि हर जागरूक इंसान फोटो वीडियो को मोटा मोटा जांचना सीख ले ,उसका स्रोत मालूम करना सीख ले ,बल्कि मैं अपनी सियासी माशरी सोच किनारे रख कर हर एक सोशल मीडिया के फोटो और वीडियो पर शक करता हूँ फिर मोटा मोटा जांच कर उस पर कोई राय कायम कर पाता हूँ, आप लोग चाहें सब पर शक न करें लेकिन जांचना सीख लें , कितने ही दंगे और वेह्शी काम अब तक यह वीडियो फोटो करवा चुके हैं लेकिन अभी यह आधे नुकसान भी नहीं हैं इसलिए ज़रूरी है कि हम सब में अभी से यह ज़िम्मेदारी आ जाये वरना कितने ही मासूम मारे जा सकते हैं कितने ही मुल्ज़िम करार दिए जा सकते हैं जिनकी जाने अनजाने वजह हम न बन जाएँ…

  • फ़रहान ख़ान ([email protected])

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