वसीम अकरम त्यागी लेखक मुस्लिम टुडे में सह-संपादक है
वसीम अकरम त्यागी
लेखक मुस्लिम टुडे में सह-संपादक है

देश अभी नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री द्वारा दिये गये पचास दिनों का इंतजार कर रहा है जिसमें प्रधानमंत्री ने कहा था कि अगर पचास दिन के बाद नोटबंदी से कोई समस्या आये तो उन्हें किसी चौराहे पर जिंदा जला देना। वह अपने वादे पर काबिज रहेंगे या नहीं यह तो वक्त ही बतायेगा, लेकिन मध्यप्रदेश में एक छात्र को दाढ़ी रखने की कीमत परीक्षा में न बैठकर चुकानी पड़ी है। मध्य प्रदेश में बड़वानी ज़िला के अरिहन्त होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज से दाढ़ी रखने की कारण एक छात्र को कॉलेज से निकाल दिया गया है। छात्र मोहम्मद असद ख़ान का आरोप है कि कॉलेज प्रशासन की ओर से दाढ़ी रखने के ‘जुर्म’ में उन्हें बार-बार परेशान किया जा रहा था। उन्हें इस बात की भी चेतावनी दी गई कि जब तक तुम दाढ़ी कटाकर नहीं आओगे तब तक कैंपस में तुम्हें आने की इजाज़त नहीं दी जाएगी। जब असद ने कॉलेज के इन बातों को नहीं सुना तो उसके बाद कहा गया कि दाढ़ी की वजह से तुम परीक्षा फार्म नहीं भर पाओगे, इसलिए तुम हमारा कॉलेज छोड़ दो। असद का यह भी आरोप है कि वो इस मामले को लेकर वो बड़वानी ज़िला कलेक्टर के पास गए। कलेक्टर ने उन्हें एसडीएम कार्यालय भेज दिया। अब वो लगातार दो महीनो से एसडीएम कार्यालय का चक्कर लगा रहे हैं। कोई कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है। समाधान के नाम पर प्रशासन की तरफ़ से सिर्फ़ टाल-मटोल किया जाता रहा है। फिर उन्होंने तंग आकर बड़वानी कलेक्टर को 4 दिसंबर को एक और आवेदन सौंपा और इंसाफ़ की गुहार लगाई, पर यहां से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। ऐसा पहली बार नही है कि दाढ़ी को लेकर किसी कॉलेज ने आपत्ती जाहिर की हो, इससे पहले इसी साल जुलई में उत्तर प्रदेश के मऊ मे भी मुस्लिम छात्र दाढ़ी रखने के कारण कॉलेज मे दाखिला देने से मना कर दिया गया। इसी साल सितंबर में कालीकट विश्विद्यालय के सेंटर फॉर फिजिकल एजुकेशन के छात्रों ने क्लास का बहिष्कार कर दिया था। छात्रों का कहना था कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने एक मुस्लिम छात्र मोहम्मद हिलाल को दाढ़ी रखने की अनुमति दे दी है जो फिजिकल एजुकेशन के कोड के विरुद्ध है। कालीकट यूनिवर्सिटी में दाढ़ी के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले अधिकतर छात्र मुस्लिम ही थे उनका कहना था कि लगभग सभी फिजिकल इंस्टीट्यूट्स में दाढ़ी शेव करने का प्रचलन है। इसके अलावा बॉक्सिंग, कुश्ती जैसे खेलों में भी दाढ़ी नहीं रखी जा सकती।

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मगर इस सबके बरअक्स मध्यप्रदेश के मोहम्मद असद का मामला बिल्कुल जुदा है वह न तो फिजिकल एजूकेशन का छात्र है और न ही भारतीय वायूसेना का हिस्सा है जिसे दाढ़ी रखने की इजाजत ही न मिल पाये। इसे सिर्फ इत्तेफाक ही माना जायेगा कि असद का मामला ऐसे समय में सुर्खियों में आया है जब भारतीय उच्च न्यायलय ने फैजान अंसारी की उस याचिक को खारिज कर दिया था जिसमें उसने वायू सेना में दाढ़ी रखने को कहा था। दरअस्ल भारतीय वायू सेना की अपनी पालिसी है गैर धार्मिक’ दिखाने के लिए यूनिफॉर्म पहनने के दौरान ना सिर्फ दाढ़ी रखने बल्कि तिलक, विभूति लगाने, हाथ पर किसी तरह का कोई धागा बांधने और कान में किसी तरह का कोई कुंडल पहनने के लिए भी मनाही है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय के दौरान भी इन सब नियमों का हवाला दिया था। ये नियम आर्मी और नेवी दोनों के लिए हैं। IAF के नियमों के हिसाब से यूनिफॉर्म में किसी तरह का धार्मिक पूर्वाग्रह नहीं दिखाई देना चाहिए। इस वजह से दाढ़ी सिर्फ मुस्लिम को ही नहीं बल्कि, हिंदू और सिख को भी नहीं रखने दी जाती।

भारतीय वायू सेना व कालीकट विश्विद्यालय के फिजिकल एजूकेशन डिपार्टमेंट की अपना नियम है जिसके बारे में पहले ही आगाह कर दिया जाता है। मगर मध्यप्रदेश के बड़वानी ज़िला के अरिहन्त होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज के प्रोसपेक्टस में भी क्या ऐसा कोई उल्लेख है जिसमं दाढ़ी रखने की मनाही हो ? मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र वायू सेना के हिस्सा तो नहीं होते फिर असद को कॉलेज से क्यों निकाल दिया गया ? क्या इसलिये कि छात्र मोहम्मद असद है और दाढ़ी उसकी आस्था से जुड़ी है ? किस छात्र को दाढ़ी रखनी है नहीं रखनी है यह उसका निजी मामला है, और असद का मामला तो उसके धर्म से भी जुड़ा है। फिर कॉलेज प्रशासन अपनी औछी मानसकिता क्यों दिखा रहा है ? जिस छात्र को दाढ़ी रखने की वजह से कॉलेज से निकाल दिया वह डॉक्टर बनना चाहता था मालूम नहीं अब उसका डॉक्टर बनने का सपना पूरा भी होगा अथवा नहीं, मगर कॉलेज प्रशासन की मानसिकता जरूर उजागर हो गई कि वह एक पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। कॉलेज में सरस्वती की मूर्ती होती है, जिसकी पूजा भी होती है, अध्यापक और दूसरे छात्र माथे पर तिलक लगाकर, हाथों में कलावा बांधकर क्लास में आते हैं क्या इस किसी कॉलेज ने आपत्ती जाहिर की है ? फिर असद की दाढ़ी से ही कौनसा बैर था ? क्या दाढ़ी कोई चरित्र प्रमाण पत्र है ? या इस बात का दाढ़ी रखने वाला छात्र आतंकी, कट्टरपंथी होगा ? आखिर कॉलेज के मायने क्या हैं ?

जिस इमारत को शिक्षा का मंदिर कहा जाता हो और वहां से किसी छात्र सिर्फ इसलिये निकाल दिया गया हो क्योंकि वह दाढ़ी रखना चाहता है तो क्या वह संस्थान शिक्षा का मंदिर कहलाने का हक रखता है ? कॉलेज प्रशासन को समस्या दाढ़ी से है या दाढ़ी रखने वाले छात्र से ? अगर समस्या दाढ़ी से ही है तो फिर प्रधानमंत्री से लेकर साधू संतों की लंबी लंबी लटाओं और दाढ़ी से भी समस्या होनी चाहिये। नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, साक्षी महाराज मुसलमान नहीं हैं मगर वे दाढ़ी रखते हैं वहीं सैय्यद शाहनवाज हुसैन एम. जे. अकबर मुसलमान होकर भी दाढ़ी नहीं रखते। राहुल गांधी मुसलान नहीं हैं मगर दाढ़ी रखते हैं जबकि गुलाम नबी आजाद, सलमान खुर्शीद दाढ़ी नहीं रखते। क्या कॉलेज प्रशासन को इन लोगों से भी कोई शिकायत होगी ? कल अगर प्रधानमंत्री अरिहन्त होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज में जाना चाहें तो क्या कॉलेज प्रशासन उन्हें यह कहकर बाहर कर देगा कि दाढ़ी वालों का प्रवेश वजिर्त है। कॉलेज प्रशासन ने असद को बाहर करके औछी मानसिकता का परिचय दिया है। अध्यापक का काम मनुष्य को इंसान बनाना होता है न कि छात्रों के अंदर धार्मिक भेदभाव पैदा करना। क्या कॉलेज प्रशासन को इतना भी इल्म नहीं है ?


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