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1857 की लड़ाई हिन्दू और मुसलमान ने मिलकर लड़ी थी, और आज़ादी भी दोनों ने मिलकर ही हासिल की थी। पर बंटवारे का दंश भी झेला, पाकिस्तान अलग हुआ लेकिन भारत का मुसलमान आर्थिक और राजनैतिक रूप से कमज़ोर हो गया… कारण, किसी मुस्लिम राजनैतिक दल का न होना, कांग्रेस पर निर्भरता… और आवश्यकता से अधिक उस पर आश्रित हो जाना… जिस कौम में कोई कायद ही न हो , कोई विज़न न हो, उसके तरक़्क़ी की कल्पना आप कर सकते हैं ?

अंग्रेजो से आज़ादी हमें जिस कारण से चाहिए थी क्या आजादी के बाद, उन कारणों से मुक्ति मिली ? नहीं मिली. क्योंकि सिर्फ चेहरे बदले, सिस्टम में कोई बदलाव नहीं आया। संवैधानिक रूप से भारत अगर धर्मनिरपेक्ष देश है, तो बहुसंख्यक, अल्पसंख्यक लोगों का धर्म के आधार पर बंटवार, क्या है ? दलित वर्ग, और मुसलमानों के साथ, दोएम दर्ज़े का व्यवहार क्यों है ?

भारत विश्व में सबसे बड़ा लोकतंत्र है, देश में बहुदलीय प्रणाली हैं. देश में दो मुख्य दल हैं कांग्रेस और बीजेपी । राज्य स्तरीय क्षेत्रीय पार्टियां भी हैं । पर इन सभी दलों में मुस्लमानो का प्रतिनिधित्व कितना है ? नाम मात्र को। विचार करने की ज़रूरत है इस तथ्य पर कि मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से भी किसी मुस्लिम का प्रतिनिधित्व नहीं होता। ऐसा क्यों ? कारण सिर्फ एक है, इंदिरा गांधी के समय का बना परिसीमन आयोग, जिसने ऐसी व्यवस्था की मुस्लिम संख्या में ज़्यादा होते हुए भी किसी मुस्लिम प्रतिनिधि को न चुन सके। एक और भी कारण है मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों को SC/ST के लिए आरक्षित कर देना। और सबसे बड़ा कारण किसी मुख्य मुस्लिम पार्टी का न होना। क्या इन क्षेत्रों से चुने गए प्रतिनिधियों का चयन न्यायपूर्ण है ? सभी धर्मों के लोग बराबर से चुने जाने चाहिए हैं , ये प्रतिनिधित्व अनुपातिक होना चाहिए चयन में यह गैरबराबरी क्यों ?

आजादी के कई दशकों के बाद भी भारत में दलित वर्ग , अल्पसंख्यक वर्ग, उपेक्षित और पिछड़ा है । कौन जिम्मेदार है ? देश की यह प्रणाली ,राजनीतिक पार्टियां या फिर खुद दलित और अल्पसंख्यक वर्ग ? सबसे बुरी हालत में मुसलमान है। सेयासत में शून्य तो है ही आर्थिक एव शैक्षणिक स्तर पर भी पिछड़ा हुआ है, मुसलमान के पिछड़े होने के लिए एक हद तक खुद मुसलमान भी जिम्मेदार हैं। वो राजनीतिक पार्टियों से तवक्को तो रखता हैं… लेकिन खुद अपने अधिकार उसे याद नही, जब याद ही नहीं तो अधिकार मांगने की बात तो छोड़ ही दीजिये। अधिकारों के लिए आंदोलन की तो कल्पना ही नहीं है। एक सर्वे के अनुसार देश में सिक्खों का प्रतिदिन प्रति व्यक्ति व्यय सार्वाधिक है वही मुस्लिमों में ये व्यय निमनतम स्तर पर है। याद रहे दोनो ही अल्पसंख्यक हैं मगर इस अंतर का कारण क्या है ? मंथन की ज़रुरत है। वही हाल शिक्षा के स्तर का है। क्यों भारत के मुसलमानों में साक्षरता दर भी सबसे न्यूनतम है ?

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मदरसाई शिक्षा अपने आप में अपूर्ण तो है ही व्यवसायिक शिक्षा की ओर भी रुझान नकारात्मक ही है। स्कूलों से उन्हें क्यों गुरेज़ है ? लड़कियों के साथ तो बहुत बड़े पैमाने पर, उन्होंने घर में ही गैरबराबरी कर रखी है। न तो उन्हें स्कूल ही भेजते हैं और न ही मदरसे में। कितने मदरसें हैं जो, सिर्फ लड़कियों के लिए हो। देश के सिस्टम ने उन्हें हाशिये पर तो धकेल ही दिया है। लेकिन मुसलमान खुद भी अपनी बर्बादी के जिम्मेदार है। सियासी पार्टियों ने तो हमेशा वोट बैंक की तरह ही इस्तेमाल किया है। कुछ बिंदु ऐसे हैं जहाँ मुसलमानो ने अपने अधिकारों को कभी माँगा ही नहीं.. कांग्रेस के साथ रहकर वो हमेशा भ्रमित ही रहे।

● 550 सीटों की संसद में आबादी के अनुपात में 100 सीटें मुस्लिमों के लिए आरक्षित होनी चाहिये..मगर मुस्लिमों ने इसका कभी दावा नहीं किया।
● राज्यसभा में ये अनुपात 50 सीटों का होना चाहिए। देश के प्रत्येक राज्य में आबादी के अनुपात में विधानसभा/विधानपरिषद की सीटें मुसलमानो के लिए तय होनी चाहिए।
● देश की फ़ौज़/राज्य पुलिस में भी ये अनुपात आबादी के हिसाब से होना चाहिए।
● सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट्स में भी जजों का ऐसा ही अनुपात होना चाहिए और ठीक इसी तरह उच्च शैक्षणिक संस्थानो में भी।

ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ये हुकूमत का ढांचा होना चाहिए था आज़ादी के बाद जब संविधान का निर्माण हुआ तो देश के सिस्टम को लोकतांत्रिक रूप देने के लिए ये बिंदु क्यों नहीं रखे गए ? आपके साथ कांग्रेस ने छल किया पर आप आँख मूंदे रहे ? अगर ऐसा ही करना था तो किस अन्याय से आज़ादी चाहिए थी आपको अंग्रेजी सत्ता से ? ये तो सिस्टम की बात हुई, देश के प्रशासनिक ढाँचे में आपका प्रतिनिधित्व कितना है ? मेरे ख्याल से 3 या 4 % ? क्योंकि सरकारी नौकरियों और आयोग की परीक्षाओं में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व 3-4 % से ऊपर कभी बढ़ा ही नहीं। पर आपने कभी गौर नहीं किया।

उदाहरण आपके सामने है UPSC के कुल 1000 से अधिक सफल अभयर्थियों में मात्र 39 मुस्लिम और उत्तर प्रदेश PCS की परीक्षा में कुल 1100 से अधिक अभ्यर्थियों में मात्र 21 मुस्लिम। हर वर्ष यही कहानी दोहराई जाती है। पर आप आँखे मूंदे रहते हैं। आरोप लगते हैं कि मुस्लिमों में इन परीक्षाओं के प्रति कोई रुझान नहीं है, पर वास्तविकता ये नहीं है। जिन जिन बिंदुओं को मैंने इस छोटे से लेख में समेटने की कोशिश की है इन सबका कोई तो हल होगा, इस पर भी मंथन कीजिये।

मगर इससे पहले ज़रूरी है कि आप सब एक हों, सियासी तौर पर भी मुत्तहिद हो जाएं। आपको याद होगा अंग्रेज़ों से आज़ादी भी आपको तभी मिली थी जब हिन्दू मुस्लिम एक हुए थे। आज, कम से कम आप सब मुस्लिम तो एक हो जाओ। पता तो होगा ही गठ्ठर की खुली लकड़ियों को कोई भी तोड़ सकता है.. पर गठ्ठर को तोड़ पाना ना-मुमकिन है। देश में मुस्लिमों के अधिकार के लिए एक व्यापक और विस्तृत सुधार की आवश्यकता है, और वो तभी संभव है जब आप में एकता हो।


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