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मोहम्मद अनस

पूरा देश जानना चाहता है कि गुजरात डेवलपमेंट मॉडल आखिर है क्या जिस पर पिछले एक दशक से चर्चा हो रही है. आखिर ऐसी कौन सी वजह है जिनके आधार पर देश ने ‘गुजरात डेवलपमेंट मॉडल’ की शुरुआत करने वाले गुजराती मुख्यमंत्री को देश का प्रधानमंत्री बना दिया. इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करिश्माई व्यक्तित्व और दृढ़ इच्छाशक्ति के धनी हैं. गुजरात में उनके द्वारा किया गया विकास एनडीए और भाजपा द्वारा पूरे देश का विकास मॉडल बना कर पेश किया गया. देश का आम नागरिक जो अपने दुःख, दर्द और बेरोजगारी से परेशान था, जिसे करप्शन और महंगाई खाए जा रही थी उसने सोचा की क्यों न गुजरात मॉडल वाले नेतृत्व के हाथ में देश की सत्ता सौंप दी जाए और फिर हुआ बिलकुल ऐसा ही. दो साल से नरेंद्र मोदी देश की सत्ता पर काबिज हैं और देश कितना बदला यह तो आप सभी जानते ही हैं.

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श्वेत क्रान्ति का जनक

आखिर ऐसी कौन सी वजह हैं कि गुजरात में जो जादू चला वह पूरे देश में नहीं चल पा रहा है. विपक्ष और सरकारी आंकड़े लगातार यह बता रहे हैं कि पिछला दो साल बेरोजगारी, महंगाई के भेंट चढ़ गया लेकिन सरकार है की विज्ञापनों के बल पर इसे झुठलाना चाहती है. देश के बाकी हिस्सों में मोदी का जादू फेल क्यों हो गया, यदि गुजरात में विकास की गंगा बहाई गई तो उसका दस प्रतिशत बाकी देश में दो सालों के भीतर क्यों नहीं बह सकी. क्या वजह हो सकती है.

गुजरात विकास के पीछे किसी राजनीतिक हस्ती से ज्यादा जिनका योगदान रहा है वह कोई और नहीं बल्कि गुजरात के आम लोग हैं. गुजरात के किसानों ने दिन रात मेहनत करके उसे एक समृद्ध राज्य की श्रेणी में ला खड़ा किया. आज विकास के जिस शिखर पर गुजरात खड़ा है वह दशकों की लंबी मेहनत का नतीजा है जिसकी शुरुआत देश की आज़ादी के वक्त से शुरू हो गयी थी.

क्यों उगलती है सोना गुजरात की माटी-

को-ऑपरेटिव सोसायटी
को-ऑपरेटिव सोसायटी

को-ऑपरेटिव सोसायटी (सहकारी समिति) सिद्धांत की नीव गुजरात में बहुत पहले से पड़ चुकी थी. दुग्ध संघ बना कर किसान दूध का व्यापार करने लगे थे, और यह दशकों पहले शुरू हुआ. देश में जब सामूहिक तौर पर कुछ करने से लोग कतराते थे तब गुजरातियों ने दूध जैसे उत्पाद को अपने व्यापार का हिस्सा बनाया. सिस्टेमेटिक तरीके से दूध खरीदने-बेचने का यह एक सफल प्रयोग था जिसमें गुजरात का बहुत बड़ा वर्ग शामिल हुआ. 1946 में स्थानीय नेता त्रिभुवन दास पटेल ने खेढ़ा जिले के कुछ किसानों का एक संगठन बनाया जिसके तहत दूध इकठ्ठा करके मुंबई के बाज़ार में बेचा जाने लगा. यह शुरुआत बहुत छोटी थी जो आगे चल कर आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड (अमूल) के नाम से पहचानी गयी. त्रिभुवन दास पटेल की वजह से आनंद में वर्गीज कुरियन ने अपना ठिकाना बनाया और वहीँ से श्वेत क्रान्ति की शुरुआत हुई.

आखिर अमूल में ऐसा क्या है जिसने इतिहास रच दिया-

हाल ही के दिनों में किसानों की ख़ुदकुशी का मामला बहुत ज्यादा प्रकाश में आने लगा. बैंक क़र्ज़, सूखा और दूसरी वजहों से किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या करने को मजबूर हो गए. लेकिन गुजरात के किसानों पर इसका ज़रा भी असर नहीं हुआ. गुजराती किसानों की समृद्धि का राज छिपा है. को-ऑपरेटिव सोसायटी के अन्दर और उसका सबसे बेस्ट मॉडल है अमूल डेरी. क्या आपको पता है कि अमूल डेरी किसानों से जो दूध लेती है उसका भुगतान तुरंत कर देती है. इसके आलावा जो आश्चर्यजनक बात है वह यह है कि बाजार के निर्धारित मूल्यों पर भुगतान के बाद अमूल डेरी अपने किसानों को छमाही और वार्षिक बोनस भी देती है. यह बोनस उस लाभ में से दिया जाता है जो अमूल डेरी अर्जित करती है.

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इसे इस तरह से समझें- यदि एक किसान पच्चीस रुपये प्रति लीटर के हिसाब से अमूल को दूध बेचता है तो उसके बाद अमूल उस एक लीटर दूध  को मार्केट में तीस रुपये का बेचती है तो वह तीस रुपये का लगभग पचासी फीसदी मूल्य किसानों को वापस कर देती है. मतलब कच्चा दूध किसान से खरीद कर ट्रांसपोर्ट से लेकर प्रोसेसिंग एवं पैकेजिंग तक का सारा काम अमूल करती है लेकिन लाभ अकेले नहीं बल्कि उस किसान से भी साझा करती है जिससे उसने दूध लिया. जी हाँ ,यही है अमूल को-ऑपरेटिव मॉडल. जिसके कारण गुजरात के किसान, मध्य आय वर्गीय परिवार, निम्न आय वर्गीय परिवार न तो भूख से मरता है न तो आत्महत्या करता है. गुजरात में इस सिस्टम से फायदा उठा रहे ऐसे बहुत से किसानों के बच्चे विदेश में अच्छी शिक्षा हासिल कर रहे हैं. किसान अपने बच्चे को न सिर्फ पढ़ा रहा है बल्कि वह उसके बेहतर भविष्य का निर्माण भी कर रहा है.

यदि देश में ऐसा बेहतरीन सिस्टम पहले से है तो क्यों नहीं उसे अन्य राज्यों में लागू किया जाए, यह ज़िम्मेदारी केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारों की भी है. किसान और गरीब के लिए अमूल का बिजनेस मॉडल डूबते को तिनके का सहारा जैसा ही है. को-ऑपरेटिव पद्धति में किसान ही मालिक होता है. निजी कंपनियों के खेल में फंसने से ज्यादा अच्छा है कि इस सिस्टम के प्रति सरकार ईमानदार बने. को- ऑपरेटिव पद्धति से हो रहा व्यापार ही असल तरक्की का माडल है. सेवा- समर्पण-साझेदारी और पारदर्शिता के साथ गुजरात की अमूल डेरी न सिर्फ राज्य का विकास कर रही है बल्कि किसान और आम जनता भी इसकी वजह से खुशहाल जीवन जी रही है.

स्वतंत्र पत्रकार, ज़ी मीडिया में एक्जयूकिटिव एवं राजीव गांधी फाउडेशन में रिसर्च असोसिएट रह चुके हैं। सोशल मीडिया का जाना पहचाना चेहरा।


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