एक काश्मीरी मुसलमान था नईम भट. हिन्दुस्तानी क्रिकेट टीम का हिस्सा बनना उसका सपना था. अंडर 19 का था भी. कमरे में सचिन की, द्रविड़ के पोस्टर लगाता था. अपने एक परिचित से पूछा भी था उसने- काश्मीरी मुसलमान हूँ- टीम में आ पाऊँगा क्या? जिससे पूछा वो भी मुसलमान था. जवाब जानते हैं क्या था? हिन्दुस्तानी टीम में बहुत मुसलमान हैं नईम, तुम भी आओगे एक दिन. इंशाअल्लाह। (ये इंशाल्लाह और भारत माता की जय दोनों को राजनीति का हथियार बना देने के पहले की बात थी.)

फिर एक दिन हिन्दुस्तानी फौज ने नईम को मार गिराया। न, उसके पास बन्दूक नहीं बस एक बैट था. पत्थर नहीं, गेंद थी. वो किसी भीड़ का हिस्सा भी नहीं था.. भीड़ तो बाहर थी- एक लड़की के साथ बदसलूकी के खिलाफ, जिसका आरोप सेना पर है. पर वो काश्मीरी था.

भक्तों के लिए भारत के अभिन्न अंग का हिस्सा, और इतना उस पर गोली चला देने के लिए काफी था. उस फौज के लिए जो बगल के जम्मू में अमरनाथ यात्रा के लिए प्रदर्शन के उग्र हो जाने पर, दो सिपाहियों की हत्या कर देने पर भी एहतियात बरतती है, संयम रखती है, गोली नहीं चलाती। भक्त जम्मू को अभिन्न अंग नहीं कहते वैसे, जरूरत नहीं होगी शायद।


परसों से सोच रहा था कि लिखूँ। जो भी लिखता याद आता कि पुराने लेखों में लिखा हुआ है. वैसे भी क्या नया लिख सकते हैं आप- रोज यकसां हमलों पर. फिर Syed Faizan Zaidi के लिखे में अपना जिक्र देखा, तो नहीं रहा गया. 

खैर, जानना यह चाहता हूँ कि प्रदर्शन देश भर में होते हैं, जाटों ने अभी हरियाणा जला दिया था, पटेलों ने गुजरात। गोलियाँ नहीं चलतीं वहाँ भले प्रदर्शनकारी लोगों को मार गिराएं। फिर काश्मीर में ऐसा क्या फर्क है? (यह भी पहले लिख चुका हूँ!)


इतना जरूर पूछना चाहता हूँ कि ऐसी हर गोली काश्मीरी पंडितों का लौटना आसान कर देती होगी न?

  • ये लेख समर अनार्या की फेसबुक वाल से लिया गया है
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अविनाश कुमार पाण्डेय (समर अनार्या )

लेखक -एशिया ह्यूमन राईट कमीशन से जुड़ें है


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