bakra eid

ध्रुव गुप्त

देश की अस्सी प्रतिशत से ज्यादा बकरे खा जाने वाले हिन्दुओं में से कई लोगों के भीतर ईद-उल-अज़ा यानी बकरीद आते-आते बुद्ध और महावीर जाग जाते हैं।

देश के नब्बे प्रतिशत हिन्दू मांसाहारी हैं। उनसे आपको कोई समस्या नहीं है। कुछ जगहों पर प्रतिबंध के बावज़ूद आपके धर्म में हर साल नवरात्रि की नवमी को भारत और नेपाल के बहुत सारे देवी मंदिरों में धर्म के नाम पर आज भी लाखों निर्दोष पशुओं की बलि ज़ारी है। आपकी तांत्रिक क्रियाएं बिना मांस-मुर्गे और दारू के संपन्न नहीं होती।

सावन के ख़त्म होते ही मांस की दुकानों पर लार टपकाते हिन्दुओं की बेतहाशा भीड़ आपको नज़र नहीं आती ? ख़ुद हमारी हिंदू संस्कृति शिकारियों की गौरव गाथाओं से भरी पड़ी है। हमारे जो तमाम प्राचीन महान राजे-महाराजे और नायक पुरोहितों के मंत्रोच्चार के बीच जानवरों के शिकार के अभियान पर निकलते थे, उनको क्या आपने अपने इतिहास, पुराण और धर्मग्रंथों से बाहर कर दिया है ?

आपकी आवाज़ बकरे तो क्या गाय-भैंस, कीड़े-मकोड़े तक खाने वाले पश्चिमी देशों के ईसाईयों और उत्तर-पूर्वी भारत के अपने ही देशवासियों के खिलाफ क्यों नहीं उठती जो इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर मांसाहार के बगैर जिन्दा भी नहीं रह सकते ?

पशु बलि अगर गलत है तो धर्म के नाम पर भी गलत है और स्वाद के नाम पर भी। इस पर दूसरों को नसीहत देने के पहले आपसे इतनी तो उम्मीद की जाती है कि आप अपना घर तो ठीक कर लो पहले। ज़ाहिर है कि अभी पशुओं के प्रति आपकी करुणा नहीं, मुसलमानों के लिए आपकी नफ़रत बोल रही है।

(लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं)


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