नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) ने औरंगज़ेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया है।

केजरीवाल ने ट्वीट किया, “मुबारक हो, एनडीएमसी ने औरंगज़ेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड करने का फ़ैसला किया है।”

हिंदूवादी संगठनों के लोग बरसों से औरंगजेब रोड का नाम बदलने की मांग करते आये हैं। यह उन्हीं फासीवादी ताकतों की जीत है, जिसकी बधाई केजरीवाल दे रहे हैं ?सवाल है कि कलाम साहब से अगर इतनी ही मौहब्बत थी तो उनके नाम का रोड बनाने के लिये औरंगजेब रोड को ही क्यों चुना गया ? नया रोड क्यों नहीं इजाद किया गया ? सावरकर जैसे अंग्रेजों के एंजेंटों के नाम से इस देश में द्वार हैं, सड़कें हैं, शिक्षण संस्थान हैं क्या उनके नाम भी बदलकर कलाम साहब के नाम से रखे जायेंगे ?

दरअसल औरंगजेब को हिंदूवादी संगठन कट्टरपंथी और हिंदू विरोधी होने के नाम से प्रचारित करते आये हैं। संघी भट्ठी में पैदा हुए पीएन ओक, हर एक मुस्लिम धार्मिक स्थल के नीचे शिव मंदिर, हनुमान मंदिर होने का दावा करते आये हैं और हिदुवादी संगठन उस झूठ को ‘सच’ साबित करने के लिये बराबर प्रचारित करते आये हैं। जबकि उड़ीसा के राज्यपाल रहे बीएन पांडे औरंगजेब का दूसरा चेहरा सामने रखते हैं, उन्होंने एक किताब लिखी ‘भारतीय संस्कृति और मुगल सम्राज्य’, जिसे दिल्ली हिंदी अकादमी ने 1991 में प्रकाशित किया था। वह हिंदुत्ववादी संगठनों के दावे के बिल्कुल बरअक्स है।

चूंकि अब दिल्ली हिंदुत्ववादी संगठनों की बपौती है, इसलिये हर औरंगजेब तो क्या हर वह इमारत ‘गुलामी’ का प्रतीक है जिसे मुसलमान शासकों ने बनवाया था।delhis-aurangzeb-road-renamed-after-abdul-kalamऔरंगजेब रोड का नाम कलाम साहब के नाम पर रखकर एक तीर से दो शिकार किये गये हैं एक तो यह कि हिंदू वादियों की नजर में खलनायक औरंगजेब के प्रतीक खत्म कर दिया गया, दूसरा हिंदूवादियों की नजर में गीता, और कृष्ण भक्त कलाम साहब के नाम से भी सड़क का नाम रख दिया गया।

मगर सवाल है कि क्या बांदा के चित्रकूट में बने उस मंदिर को तोड़ा जायेगा जिसके लिये जमीन देने वाला औरंगजेब था ?

एनडीएमसी के फैसले को मुबारकबाद देने वाले केजरीवाल क्या दिल्ली में कलाम साहब के नाम से सिर्फ हार्डिंग और पोस्टर ही लगवायेंगे या फिर कोई कॉलेज, यूनिवर्सिटी, या कलाम भवन का निर्माण भी करायेंगेdelhis-aurangzeb-road-renamed-after-abdul-kalam

बनी बनाई चीजों का नाम बदलकर उन्हें कलाम साहब के नाम की मुहर लगाना ठीक नहीं है। इससे सरकार की मंशा साफ जाहिर होती है कि उसे मुसलमान सिर्फ तभी पसंद हैं जब वह कलाम बनें।

वसीम अकरम त्यागी


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