दीप पाठक

सबके पास स्कूटी/मोटरसाइकल हो गयी पुराने बजाज चेतक वेस्पा स्कूटर आम मजूरों ने ले लिए वो खून की तरह तेल पीते हैं, साइकल से कोई चलना नहीं चाहता क्योंकि दिन में बस आठ नौ घंटे ही होते हैं उतने टैम में ही दिन के टास्क निपटाने हैं ! इस मुए पेट्रोल ने दिन भर में 100 का एक नोट ले ही मरना है, अगर इसी सौ रुपये का कंट्रोल की दुकान से मिट्टीतेल मिलता तो स्टोव जलता गैस सिलेंडर जरा ज्यादा चलता ! पब्लिक ट्रांसपोर्ट से ज्यादा सब निजी वाहन में ही भागते हैं !

हद तो ये है कि जीडीपी गिर रही है रोजगार तबाह हुए हैं फिर भी रोज के खर्च, पेट का दोज़ख भरना ही है, औद्यौगिक क्षेत्र में वर्कर बाहर किये जा रहे हैं ! दिहाड़ी मिल नी री फिर भी भागदौड़ तो करनी ही है कोई काम कोई खरीद-सौदा हो ! सबको खेंच-ठूंस के जबरिया नये आर्थिक व्यवहार में जोड़ा गया नतीजा बैंक, एटीएम, सब जगह लोगों के लाखों घंटे जाया हो रे ! पल्ले में नकद फूटी कौड़ी नी होगी लेन-देन के रोजमर्रा के व्यवहार में आज-कल की उधारी-कपारी हो जाती है, बैंक टैम पर पैसा नी देता न नकद रहा और जमा का भरोषा नी रहा ! स्मार्ट और तेज लेन देन बदलता आर्थिक व्यवहार स्मार्ट सिटी की जरुरत है और नयी पीढी एटीएम पेटीएम कैशलैश बरत भी रही है पर ये अपनी सामान्य गति से बदलता तो ठीक था सरकार ने हबड़ तबड़ कर इसमें सबको ठूंस दिया ! अब अरबों रुपया बैंक में आ गया जो वक्त जरुरत का नकदी व्वहार हुआ करता था ! ये विशाल राशि गरीब गुरबे की जेब से निकली बैंकिंग और औद्यौगिक पूजीं से मिलकर वित्तपूंजीं का हिस्सा बन गयी !

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लोग धीरे-धीरे आर्थिक अनियमितता में फंसते जा रहे हैं और दिन ब दिन ये हरकतें बढतीं जातीं है ड्यूज गले पड़ते जाते हैं नतीजा लोग बेईमानी-मक्कारी पर उतर आते हैं, शहरों का तो मुझे नी मालूम पर गांव देहात कस्बों में देखते देखते आर्थिक अनियमितता आर्थिक अराजकता की तरफ बढ रही है !

जब मौद्रिक संस्थान को जबरिया उकसाया जाता है और मुद्रा के साथ हद दरजे तक प्रयोग छेड़खानी होती है तो समूचा अर्थ परिचलन अपनी सामान्य गति से बाधित हो जाता है ! दुनियां भर के अर्थ-वित्त जानकार कह रहे हैं अभी भारत की औद्यौगिक विकास दर और नीचे गिरेगी ! तब माल कमोडिटी पण्य उजरत सब जगह इसका असर होना है ! मुद्रा श्रम का मापक भी है जरुरत की बदल भी जिंदगी का व्यवहार भी और अधिक हो जाये तो अनंत लालसाओं को बढाने वाली क्षुधा भी है !

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बड़ी बातें न भी करें सामान्य बात ये है कि महंगाई काबू से बाहर होने वाली है रिजर्व बैंक इसे काबू नहीं कर सकता हमारे देश का निर्यात और विदेशी मुद्रा भंडार रुपये को स्थिर रख सकता है पर जब हम कहीं बाहर देश में निर्यात-निवेश में भौत मजबूत हालत में नहीं हैं उपर से अवरचनागत निर्माण के भारी काम विदेशों से करा रहे हैं कल ये योजनाऐं पूरी हो भी जांय जनता को इसका उपभोग करने के लिए क्रय शक्ति नहीं होगी तो घाटे में जायेंगी और हम पर कर्ज और देनदारी बढेगी !

कृषि प्रधान देश में कृषि के हाल सबको पता है खेतिहर बस किये जा रहा है शहरों में तिलहन खाद्यान्न दूध मांस सब्जियों की बेतहाशा मांग के बाबजूद किसान को उसकी लागत में पड़त नही आ रही !

अब जब आर्थिक अराजकता की तरफ देश बढ चला है तो इंसानी पतन का निकृष्ट रुप भी दिखेगा वीभत्स अपराध/मनोरोगी समाज आप नैतिक उपदेश या छोटे-छोटे प्रतिरोध से नागरिक बोध नहीं पैदा कर सकते आपकी लोअर मिडिल सुरक्षा को स्कूल की फीस बिजली पानी के बिल कबका सेंध मार चुके हैं ! रही तबाहकुन आबादी उसे हर समय चिढ़ और निराशा जीवन की आर्थिक असुरक्षा में घुट-घुट के जीना है वो कुछ भी कर सकता है-
“हम अपने लिए जीते हैं हमको जहां से क्या.
हम खून-ए ज़िगर पीते हैं हमको जहां से क्या ?

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जैसा उग्र अवसादी नायक हो या आर्थिक तबाह सौम्य मिडिल क्लास-

“चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी जेब को अब हाजते रफू क्या है ?
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जो आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है ?”

दोनों गीतों के मूल में आप आर्थिक अराजकता साफ देख सकते हैं , आने वाला समय भयंकर रक्तपात और तबाही लेकर आयेगा ! इसलिए मैनुअल गार्ड लें जरुरत का सामान और नकदी रखें गैरजरुरत सामान न खरीदें !

लेखक परिचय

लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार है तथा घुमक्कड़ी में दिलचस्पी रखते है देश के कोने कोने से परिचित दीप पाठक पहाड़ तथा पहाड़ी लोगो की समस्याएं उठाने में सवैद आगे रहते है


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