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कोहराम न्यूज़ के लिए दीप पाठक 

हां हां दलित-मुस्लिम एकता आंदोलन की ही बात कर रहा हूं ये आंदोलन भाजपा के अतिवाद से उपजा है गुजरात में सरवाईव कर रहा है पर दलितों-मुस्लिमों पर ज्यादा हमले नफरतगोई तो राजस्थान, हरियाणा, यूपी,में हैं बिहार ने तो संगठित प्रतिरोध किया तो पूरे देश में भले ये माडल न बना हो पर बिहार में तमाम नरसंहार के बाद बुद्ध नहीं जागे वहां आयरिश तरीका काम आया !

दलितों के पास हिंदी पट्टी में यूपी में मायावती है पर सरकार बनने के बाद बहुजन को सर्वजन बनना पड़ता है मायावती आगे कैसे क्या करेंगी ये तय करने का उनके पास बहुत मौका मिला है सरकार आने के बाद प्रशासन में थोक में उलटफेर होगा थाना चौकी कोतवाली से लेकर डीएम एसडीएम इधर उधर किये जाते हैं और मान लिया जाता है कि बदलाव शुरु हो गया है वही हाकिम-अमला मुलायम के पास भी है उन्होंने अपने हिसाब से सेट किया है अब इस फेरबदल से ऐसा क्या हो जाता है ? सरकार तो पांच साल रहेगी सरकारी नौकर तो चालीस बरस तक नौकरी करता है वो सरकार बदलते ही बस सुर बदलता है ,सार नहीं…

खैर… इस आंदोलन-एकता को राजनैतिक ताकत में कैसे बदला जायेगा ? मुसलमान किसको चुनें ? ओवैसी की पार्टी को ? पर कैसे चुनें वोट तो इलाकावार निर्णायक संख्या में नहीं हैं वे छितरे हुए हैं और यू पी के अलावा पंजाब, हिमांचल, हरियाणा, राजस्थान, जम्मू-कशमीर, उत्तराखंड गो कि इस उत्तरपट्टी में कौन पार्टी है न सही पार्टी कोई नेता भी नहीं कांग्रेस-भाजपा मंजूर नहीं कम्युनिस्ट पर भी भरोषा नहीं….. ऐसी सिटुएशन पर तो हालीवुड मूवी “एयर फोर्स वन” का सीन याद आता है तमाम अमरीकी सुरक्षा के बाद अमरीका का राष्ट्रपति अपहृत हो जाता है तो उप राष्ट्रपति कहती है हम किससे बात करें ? वे (अपहरणकर्ता) किस पे भरोसा करते हैं ? और हम किसपे भरोसा करें ? ( क्योंकि राष्ट्रपति का खास सुरक्षा स्टाफ का बड़ा अफसर अपहरणकर्ताओं से मिला होता है) यही हाल फिलवक्त दलित-मुस्लिम एका मूमेंट का है उनकी जात वाला उनकी पार्टी वाला मंजूर नहीं अपना कोई अगुवा गढ़ा नहीं ! तब ले देकर भाजपा नहीं कांग्रेस ?

ये तो वही मसल हो गयी कि दो आप्शन हैं- या सौ जूते खाओ या सौ प्याज खाओ ! जूते से बेइज्जती होवे प्याज से आंसू आवें दस जूते खाने के बाद कहें नाजी हम प्याज खावेंगे और दस प्याज खाने के बाद कहेंगे नाजी जूते ही खावेंगे !! और इस तरह बारी बारी सौ जूते भी खावें सौ प्याज भी….

बदलाव के लिए प्लैन होता है संगठन होता है मास कम्युनिकेशन होता है ये काम चौबीसों घंटे सातों दिन बारहों मास होता है पर ऐसा सांगठनिक ढांचा तो दिखता नहीं !! एक जमाने में हूणों को मिडिल ईस्ट में काली आंधी कहा जाता था उनके नेता ‘अटीला’ के लिए एक युद्धगीत था–
“पहने हुए इस्पाती जामा
काला और मौत सा गंभीर,
हूणों का सरगना अटीला
रौद रहा रेगिस्तानों को…
और उसके पीछे काली घटाओं की तरह उमड़ते सैनिक पूछते हैं –
“कहां है रोम ?
शक्तिशाली रोम ??

और कालांतर में यह काली आंधी की तरह जैसे उमड़ा था वैसे ही छितर-बिखर गया ! अतीला अपने गद्दार भाई बैडीला को मारकर हूणों का सरदार बना था ! तो दलित-मुस्लिम बदलाव आंदोलन का कौन बैडीला है और कौन अटीला है ? यह तो साफ हो अगर ये तय नहीं होता तो फिर इस आंदोलन का भविष्य क्या है ? वही मसल हुई- “तुम्हारा वाला मानेंगे नहीं ! अपना वाला गढ़ेंगे नहीं !

लेखक जाने माने समाजसेवी है
लेखक जाने माने समाजसेवी है

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