बाबरी से लेकर दादरी तक, और दादरी से लेकर मैनपुरी, ऊधम पुर, और वहां से लेकर हिमाचल प्रदेश फिर वहां से मणिपुर तक सबकुछ भीड़ तय कर रही है। बाबरी की भीड़ के बाद यह भीड़ पुणे के मोहसिन शेख हत्याकांड में दिखी थी उसके बाद जो सिलसिला शुरु हुआ वह रुक कहां रहा है ?

भीड़ के इस सिलसिले को अगर रुकना होता तो फिर दादरी के बाद मैनपुरी न होता, मैनपुरी के बाद सहारनपुर का नोमान इस भीड़ का शिकार न होता, उसके बाद कश्मीर का जाहिद इस भीड़ का शिकार न होता, नहीं यह सिलसिला थमने वाला नहीं है, बढ़ते – बढ़ते यह सिलसिला मणिपुर तक पहुंच गया और मदरसा टीचर को सिर्फ इस गुनाह पर इस भीड़ ने मार डाला क्योंकि उस पर गाय को चोरी करने का आरोप था।

एसे अपराधों पर चर्चा – परिचर्चा करने की कोई जरूरत नहीं है, हैरानी भी नहीं होनी चाहिये कि एसी घटनाएं क्यों हो रही हैं ? जब एक इंसान की जान से ज्यादा इस बात की फिक्र होने लगे कि फलां राज्य में गो हत्या कानून अपराध है और फलां राज्य में नहीं है, फिर वहां इंसान की जान की कीमत ही क्या रह जाती है ? अल्पसंख्यकों दलितों की हत्या करने के बहाने तलाशे जाते हैं, अफवाहें तलाशी जाती हैं, फिर उन अफवाहों को भीड़ का रंग दिया जाता है, पहले मंदिर में सुअर का मांस फेंक देना सैंकड़ों लोगों को सजा ए मौत की वजह बनता था, फिर यह सिलसिला लड़की से ‘छेड़ छाड़’ तक आया, और अब गाय के नाम पर खून बह रहा है।

जो इस खून को बहा रहा है वह कोई एक शख्स नहीं हैं, बस भीड़ है, हर जगह इस भीड़ के शक्लें बदलीं हैं, मगर भीड़ वही रही है, मानसिकता वही रही है, जो बाबरी वाली थी, या दादरी वाली थी। यह भीड़ इस देश को मूर्खों, दकियानूसों, कूपंडूकों, सांप्रदायिकों का देश बनाने जा रही है। हालांकि भीड़ दूसरी तरफ भी है, मगर वह भीड़ खामोश लोगों की है।

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वसीम अकरम त्यागी लेखक मुस्लिम टुडे के सह संपादक है

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