वसीम अकरम त्यागी
लेखक मुस्लिम टुडे में सह-संपादक है

चैंपियन ट्राफी के फाईनल में भारत ने पाकिस्तान को 180 रन हराकर करारी शिक्सत दी है। पाकिस्तान के युवा खिलाड़ी टीम इंडिया पर हर तरह से बीस साबित हुऐ, देखने से कहीं नहीं लग रहा था कि यह वही पाकिस्तानी क्रिकेट टीम है जो दो सप्ताह पहले भारत से बुरी तरह हार गई थी। बहरहाल यह तो रही खेल की बात, अब बात करते हैं उन बातों की जो खेल के अलाव की जा रही थीं। इस मैच को लेकर क्रिकेट प्रेमियों में उत्साह था लेकिन मीडिया में नफरत के अलावा और कुछ नहीं था। एबीपी न्यूज वाले वाघा बॉर्डर से कॉमेडियन राजू श्री वास्तव के साथ सीध प्रसारण कर रहे थे तब तक मैच भी शुरु भी नहीं हुआ था। जब मैच में भारत हार गया तो वही राजू श्रीवास्तव जो एबीपी न्यूज पर पाकिस्तानी क्रिकेट टीम पर चुटके बनाकर सुनाकर दर्शकों को मनोरंजन कर रहे थे, वही कॉमेडियन भारत के हार जाने के बाद किसी दूसरे चैनल पर भारतीय क्रिकेट टीम पर चुटकलेबाजी करते हुऐ लोगों के दिलों से हार का ‘बोझ’ कम करने की कोशिश कर रहे थे।

मैच के खत्म होने के बाद इसी चैनल ने भारतीय पेस बेट्री और सस्ते में विकेट गंवाने वाले बल्लेबाजों की फोटो टीवी स्क्रीन पर लगाई और लिखा कि ये हैं ‘भारत की हार के मुजरिम’ समझ नहीं आता कि यह खेल किसके साथ हो रहा था ? पाकिस्तान के साथ या टीवी के सामने बैठे दर्शक के साथ ? हार और जीत खेल का हिस्सा होती हैं अगर एक मैच हार जायें तो उसमें कमियां तलाशनी चाहियें मुजरिम नहीं, खिलाड़ियों को ‘मुजरिम’ नाम देकर मीडिया उनके प्रति नफरत को बढ़ा रही है। मुझे तो डर है कि जो आतंकी भीड़ इन दिनों किसी को भी राष्ट्रवाद, गौरक्षा, स्वच्छ भारत के नाम पर मार डालती है कहीं इन खिलाड़ियों के घरों तक न जा पहुंचे।

दरअस्ल पाकिस्तान से खेला जाने वाले मैच को मीडिया ने राष्ट्रवाद की चाशनी में डुबोकर उसे भारत और पाकिस्तान की जंग बना दिया। अमर उजाला ने तो हद ही कर दी उसने अपनी वेबसाईट पर पोस्टर लगाया कि ‘पाकिस्तान से जंग’ फिर लिखा कि ‘मैच तो बहाना पाकिस्तान को समझाना है’ दोनों देशों के हजारों दर्शक एक ही स्टेडियम में बराबर में बैठकर क्रिकेट मैच देखते हैं कभी क्या उनकी देशभक्ती पर शक किया जाये कि वे अपने दुश्मन देश के नागरिकों के साथ बैठकर मैच क्यों देख रहे हैं ? उन्हें मारते क्यों नहीं ? दरअस्ल वे असल में खेल प्रेमी हैं उन्हें मालूम है कि खेल और जंग में फर्क होता है ? लेकिन टीवी पर चिल्लाने वाले एंकरों और सोशल मीडिया को पौत डालने वाले खेल प्रेमियों को इतनी सी बात समझ में नहीं आती। टाईम्स ऑफ इंडिया अखबार का सर्कुलेशन विभाग देखने वाले पंकज राज ने फेसबुक पर मैच को नमाज़ और बजरंग बली में मुक़ाबला बना दिया था। बताइए कि इन्होंने दरअसल किसका अपमान किया है ? क्या बजरंगबली की पूजा पाकिस्तान के हिन्दू नहीं करते होंगे ? क्या ईद की नमाज सिर्फ पाकिस्तानी मुसलमानों के लिये ही है ? खेल को जंग बनाने में पूर्व क्रिकटर वीरेन्द्र सहवाग और अभिनेता ऋषी कपूर ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। वीरेन्द्र सहवाग ने पहले पाकिस्तानियों का मजाक उड़ाया कि भारत से हारने पर वे टीवी न फोड़ें रेडियों फोड़ें, फिर कहा कि ‘बाप बाप होता’ है। अब वही सहवाग हैं पाकिस्तान के जीतने पर उसे न सिर्फ बधाई दे रहे हैं बल्कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों की जमकर तारीफें कर रहे हैं, उन्होंने पाकिस्तान की जीत पर  लिखा कि ‘आज की बड़ी जीत पर पाकिस्तान टीम को बधाई। आपने अच्छा खेला और जीत के हकदार हैं। पाकिस्तान क्रिकेट के लिए बढ़िया परिणाम।’ इससे पहले यही सहवाग, बंग्लादेश को पौता, पाकिस्तान को बेटा और भारत को बाप बताते हुऐ कह रहे थे कि “अच्छी कोशिश की पोते। सेमीफाइनल तक पहुंचने में काफी मेहनत की। घर की ही बात है। फादर्स डे पर बेटे के साथ फाइनल है। मजाक को सीरियस मत लियो बेटे” उस दिन के सहवाग में और आज के सहवाग में जमीन आसमान का फर्क है, उस दिन वाला सहवाग एक मैच को जंग समझ रहा था लेकिन हार जाने के बाद उसे याद आया कि वह खिलाड़ी भी है इसलिये उसे खेल भावना का परिचय देना चाहिये।

ऐसा ही यू टर्न अभिनेता ऋषी कपूर ने लिया जिन्होंने मैच से पहले कहा था कि पाकिस्तान इस बार क्रिकेट टीम भेजे क्योंकि पिछली वाली टीम हॉकी या खो खो की टीम लग रही थी। अब वही ऋषी कपूर हैं जो पाकिस्तान की टीम की तारीफों के पुल बांधते हुऐ उसके खिलाड़ियों को जीत की मुबारकबाद दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर बाप, बेटा, शेर, कुत्ता खूब चला है जिन लोगों ने यह सब किया है उन्हें न तो देश से हमदर्दी है और खेल भावना से तो उनका सरोकार ही नहीं है। मैच से एक दिन पूर्व भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी पाकिस्तानी कैप्टन सरफराज अहमद के नन्हे बच्चे को गोदी खिलाते हुऐ नजर आये थे। सोशल मीडिया और उसके बाहर समाज में उल्टी सीधी टिप्पणियां करने वालों को धोनी से सबक लेना चाहिये था कि खेल सिर्फ खेल होता है उसका जंग से कोई वास्ता नहीं होता। जंग में दुश्मन की जान लेना बहादुरी माना जाता है और खेल में प्रतिद्वंदी टीम के खिलाड़ी के जूते का फीता बांधना, चोट लगी है तो मालिश कर देना, प्यास लगी है पानी देना बहादुरी माना जाता है। यही खेल भावना है। लेकिन मीडिया इस सबको कूड़े के ढ़ेर में फेंक कर सिर्फ ‘जंग’ दिखाता है। मीडिया ने अवाम के हलक में अपनी जबान डाल दी है जो मीडिया चाहता है वही अवाम बोल पाती है। काश की खेल भावना को समझा जाता।


(लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं)


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