owaisi-bhagwat-war

दिक्कत ” भारतमाता की जय ” बोलने से नहीं है . सवाल यह उठता है कि आपको” भारतमाता की जय” बोलने के लिए जो व्यक्ति या संगठन आग्रह कर रहा है , उनका और उनके लोगों का ” भारत माता ” को आजाद कराने में कितना योगदान है ///
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अगर मैं कहूँ कि विगत दिनों असदुद्दीन ओवैसी द्वारा ” भारतमाता की जय ” के नारे के विरोध के लिए मोहन भागवत की कट्टरता ज़िम्मेदार है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी . याद कीजिये मोहन भगवत का वह अपमानजनक स्टेटमेंट , जिसमे उन्होंने खुद को राष्ट्रवाद का ब्रांड एम्बेसडर घोषित करते हुए कहा था कि देश में ऐसे कुछ लोग है जो भारत माता की जय नहीं बोलते , उनको भारतमाता की जय बोलना सिखाना पड़ेगा “///

कहना न होगा कि भागवत जी का ये एक ऐसा अपमानजनक बयान है जिसे कोई भी स्वाभिमानी नागरिक बर्दाश्त नहीं करेगा . ध्यान दीजिये कि भारतमाता के प्रति वफादारी का आग्रह कौन कर रहा है …वह , जिनके संगठन के एक भी वीर-स्वयंसेवक ने भारत माता को आजाद कराने के लिए अपना सिर नहीं कटाया , देश की आज़ादी के आन्दोलन में कोई हिस्सा ही नहीं लिया , बल्कि जिनके संगठन से जुड़े लोगों ने मुखबिरी कर कर के क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कराया और अंग्रेजों से माफ़ी मांग-मांग कर अपनी सज़ाएँ कम करवाई और ज़िन्दगी भर फिर अंग्रेजों के खिलाफ कभी कोई बगावती कारवाई नहीं की ///

.आर एस एस जबरन यह फूहड़ और हास्यास्पद दावा करता है कि वह इस देश का सबसे बड़ा वफादार और राष्ट्रभक्त संगठन है .वह अपने ही मुंह से स्वयं उच्चारित करता रहता है कि संघ और राष्ट्रभक्ति एक दुसरे के पर्याय हैं . जब कि न तो महात्मा गाँधी , न नेहरु , न जयप्रकाश नारायण , न इंदिरा गाँधी और न ही किसी नए-पुराने नेता ने कभी उसे देशभक्ति का कोई प्रमाण पत्र वितरित किया .इसके बाद भी अगर वह कहे कि हम देश के कुछ लोगों को भारत माता की जय बोलना सिखायेंगे , तो सच्चे भारतीय होने के नाते आपका यह फ़र्ज़ हो जाता है कि आप ऐसे संगठन की वास्तविक सच्चाइयों से देशवासियों को अवगत कराएं और उन्हें वास्तविक और छद्म देशभक्तों में अंतर करना सिखाएं //

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किसी भी नागरिक के “राष्ट्रनिष्ठ ” होने के लिए यह आवश्यक है कि वह उस देश के संविधान , राष्ट्रध्वज , राष्ट्रीय-शहीदों और स्वतंत्रता-संग्राम के मूल्यों के प्रति समर्पित रहता हो . आरएसएस एक ऐसा संगठन है जो न स्वतंत्र भारत के संविधान में विश्वास व्यक्त करता है , न उसने राष्ट्रध्वज को ह्रदय से स्वीकार किया था और न ही भारत माता कि आज़ादी की लड़ाई में इसने कोई योगदान दिया था . बल्कि जिस वक़्त देश के सारे हिन्दू और मुसलमान अपने धार्मिक मतभेदों को भुला कर कंधे से कन्धा मिला कर एक हो कर आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे थे , उस वक़्त यही आरएसएस हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिकता का ज़हर भर कर इस एकता को छिन्न भिन्न करने की कोशिशों में लगा था और उनके सर संघ चालक गोलवलकर अपने स्वयं सेवकों को यह फतवा जारी कर रहे थे कि हिन्दुओं को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ कर अपनी शक्ति का अपव्यय करने की बजाय देश के आतंरिक शत्रुओं अर्थात मुसलमानों ,ईसाईयों और कम्युनिष्टों के खिलाफ लड़ने के लिए अपनी शक्ति को संचित कर के रखना चाहिए ///

इस महान सेवा के लिए अंग्रेजों ने संघ को नवाज़ा भी और वह इस तरह कि पूरे अंग्रेजी राज के दौरान आरएसएस पर कभी भी प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया और वह अपनी विघटनकारी नीतियों पर काम करने के लिए हमेशा स्वतंत्र बना रहा ///

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इतिहास के पन्नों पर इनकी तथाकथित देशभक्ति के उदाहरण आपको भरे पड़े मिलेंगे . दिसम्बर 1929 में जब कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का ध्येय घोषित करते हुए लोगों का आह्वान किया कि वे आगामी 26 जनवरी 1930 को तिरंगा झंडा फहराएँ और स्वतंत्रता दिवस मनाएं ,तो इसके जवाब में संघ के ततकालीन संघ चालक हेडगेवार ने इक आदेश पत्र जारी कर के इस दिन तमाम् शाखाओं में भगवा झंडा फहराने का आदेश जारी किया था . ///

हमारे देश के महान और विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान के प्रति आर एस एस कितना व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण रखता है , यह इससे सिद्ध हो जाता है कि एम् एस गोलवलकर ने इस संविधान की खिल्ली उड़ाते हुए कहा था -” हमारा संविधान पश्चिमी देशों के विभिन्न संविधानों से लिए गए विभिन्न अनुच्छेदों का एक बेमेल और भारी-भरकम संग्रह मात्र है उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे हम अपना कह सकें /// “

.तो ऐसे किसी संगठन , जिसका न आज़ादी के आन्दोलन में कोई योगदान हो , जो न तो देश के संविधान के प्रति सम्मान रखता हो , न ही राष्ट्रध्वज को ह्रदय से स्वीकार करता हो ,की तरफ से कोई बयान आये कि वह कुछ लोगों को ” भारत माता की जय ” बोलना सिखाएगा तो सच्चे देशभक्त के ह्रदय में अवश्य ही ज्वाला दग्ध हो उठेगी . सवाल यह है कि मुसलमान अगर देशभक्ति का सर्टिफिकेट दिखाएँ तो किसे दिखाएँ ? उनको—जिन्होंने देश के लिए लड़ते हुए अपने लोगों में से एक का भी सिर भारतमाता के नाम पर नहीं कटाया ? या उनको दिखाएँ —जिन्होंने सुप्रीम court के निर्देशों की अवमानना करते हुए अयोध्या में लाखों लोगों को इकट्ठा किया और धर्मनिरपेक्षता की क़दीम निशानी को ध्वस्त कर दिया ? या उनको दिखाएँ —जिन्होंने चंद आतताइयों के गोधरा में किये कृत्य का बदला पूरी की पूरी कौम से लिया और हजारों लोगों को उसी संगठन के मुख्यमंत्री की आँखों के सामने और नाक के नीचे जिंदा जला दिया ? या उनको दिखाएं –जो मुस्लिम आतंकवादियों के लिए कठोर से कठोर कानूनों की हिमायत करते हैं , मगर जब उन्ही के ” देशभक्त संगठन ” से जुड़े आतंकवादी गिरफ्तार किये जाते हैं तो उनके समर्थन में निर्लज्जता के साथ खड़े हो जाते हैं और कहते हैं कि हिन्दू तो आतंकवादी हो ही नहीं सकता ///

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सच तो यह है कि विराट हिन्दू-समाज का कोई भी व्यक्ति मुसलमानों से या किसी भी जन-समूह से देशभक्ति का कोई सर्टिफिकेट नहीं मांगता . सबको एक दुसरे की राष्ट्रनिष्ठ पर भरोसा है और सब एक दुसरे पर विश्वास करते हुए सह-अस्तित्व की ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं . मुसलमानों से देशभक्ति का सर्टिफिकेट सिर्फ उस कट्टर संगठन के फर्द मांगते फिरते हैं , जिन्होंने देश की आज़ादी में धेले का भी योगदान नहीं दिया है . हाँ , जिनकी खुद की राष्ट्रनिष्ठा इतिहास के आईने में संदिग्ध है , वो ही मुसलमानों से देशभक्ति का सर्टिफिकेट मांग रहे हैं …. और जिनके खुद के घर शीशे के बने हैं , वे ही लोग मुसलमानों पर पत्थर उछल रहे हैं ///

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ऐसे में अगर ओवैसी उनकी किसी ईंट का जवाब पत्थर से देते हैं …तो आप ओवैसी को कट्टरपंथी कैसे कह सकते हैं . ऐसे किसी संगठन के लोग , जिनका देश को आजाद कराने में रत्ती भर का भी योगदान नहीं है , अगर किसी दूसरी कौम के लिए देशभक्ति का कोई ” स्वयं निर्मित ” पैमाना प्रस्तुत करते हैं , तो समझ लीजिये कि देश में राष्ट्रवाद का नहीं , बल्कि ” फ़ासीवाद ” का दौर शुरू होने वाला है . ///

मोहम्मद आरिफ दगिया

आप भी अपने लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवा सकते है ईमेल कीजिये [email protected] पर, ये विचार लेखक के अपने विचार है कोहराम न्यूज़ लेखक की किसी भी बात का ज़िम्मेदारी नही करता है


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