ambedkar

भारतीय संविधान के निर्माता और भारत रत्न से सम्मानित बाबा भीमराव अम्बेडकर जिन्होंने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका और आरक्षण देने की वकालत , दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम किया,छुआछूत के खिलाफ आंदोलन किया,उस समय जब शूद्रों को अछूत समझा जाता था और सार्वजनिक स्थान पर पानी पीने तक की इजाज़त नही थी तब पीने के पानी के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने के साथ ही अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया।और दलितों को एक अलग पहचान दिलाई।भारत के संविधान को इस खूबसूरती से तैयार किया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाया उस संविधान मे हर व्यक्ति को अपने धर्म के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता मिली और धार्मिक एकता राष्ट्र की पहचान बनी।


लेकिन कल जिस व्यवस्था के खिलाफ बाबा साहेब ने संघर्ष किया आज उसी व्यवस्था के समर्थन करने वाली एक पार्टी ये साबित करने पर उतावली है कि बाबा साहेब का उनसे बडा समर्थक कोई नही है लेकिन सच्चाई ये है कि ये ढोंग सिर्फ मंच और मीडिया तक ही सीमित है।


क्योंकि आज भारतीय संविधान के अस्तित्व को उस पार्टी और उसके खास नेताओं द्वारा सबसे ज्यादा चुनौती दी जा रही है।


उस पार्टी के नेताओ द्वारा एक धर्म के लोगो को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए कसूरवार ठहराया जा रहा हो, वही दूसरे धर्म के लोगो को ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह दी जा रही हो,कही धार्मिक स्थल से लाउडस्पीकर उतारने की मांग की जा रही हो, तो कही अब कौन क्या खायेगा और क्या नही खायेगा ये फैसला उस पार्टी की सरकारें कर रही हो ,उसी पार्टी के नेता द्वारा खुलेआम सभा मे मस्जिदों और चर्चों मे मुर्ति रखने का एलान किया जाता हो, तो कही मुसलमानों से मताधिकार छीनने की मांग उठाई जा रही हो,जिन बातो का संविधान मे जिक्र तक नही उन बातो को अपराध बनाने और आम जनता के मस्तिष्क पर थोपने की साजिश की जा रही हो,आर.एस.एस जैसे संगठन जिनका भारत की स्वतंत्रता मे योगदान शून्य है उसके नेता लोगो को देशप्रेम का पाठ राष्ट्रीय ध्वज की जगह भगवा ध्वज और राष्ट्रीय गान की जगह वंदे मातरम कहने की सलाह देकर पढाने की कोशिश कर रहे है।क्या ये सब देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को ध्वस्त करने की कोशिश नही है।


लेकिन इस सबके बावजूद इस लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री (भारत के हर नागरिक की सुरक्षा जिनकी जिम्मदारी है) के कानों तक ये सब नही पहुंच पाता हो,या फिर ये माना जाये की वो सुनना ही नही चाहते।
डर लगता है कि कही देश के ये हालात आने वाले समय मे सुनियोजित तरीके से संविधान मे बदलाव और लोकतंत्र की हत्या की कोशिश तो नही है।


-Asif Rahi ( लेखक मुजफ्फरनगर की पैगाम-ए – इंसानियत संस्था के अध्यक्ष हैं )


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