धर्म की स्थापना, एक ईश्वर में आस्था रखते हुए समाज मे फैले भ्रष्टाचार व कुरीति को दूर करने, तथा सबको समान अधिकार प्रदान करने,एक दूसरे से भाईचारगी रखने ,जाति,नस्ल,क्षेत्र के आधार पर लोगों को बाँटने का कड़ा विरोध करते हुए सबको एक साथ मिलकर रहने के लिए एक आदर्श समाज के निर्माण हेतु की गयी थी.इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर दुनिया भर मे अनेकों धर्म की स्थापना हुई है.और आज प्रत्येक धर्म के लोग लाखों की तादाद में मौजूद हैं. हर धर्म ने अपना एक संविधान रखा है और उस संविधान के अनुसार जीवन व्यतीत करने वाले ही उस धर्म के सच्चे अनुयायी माने जाते हैं.

उस धर्म के कट्टरता से पालन करने वाले उस धर्म में सम्मानित होते हैं जबकि उसका उल्लंघन करने वालों के लिए उस धर्म के संविधान के आधार पर दंड का भी प्रविधान है. लेकिन इस दंड के भागीदार केवल वो लोग हैं जो उस धर्म से संबद्ध हैं और ये नियम प्रत्येक धर्म में है. गौरतलब है की किसी धर्म का मानने वाला जब अपने धर्म का पूर्णरूपेण पालन करता है,अपने धर्म की बताई गयी बातों पर अमल करता है तो वही समाज उसे सम्मान देता है क्यूंकी ऐसे धार्मिक व्यक्ति से किसी को किसी भी प्रकार की हानि होने की आशंका नही होती, किसी तरह की हिंसा का ख़तरा नहीं होता और वो व्यक्ति धीरे धीरे अपने ही समुदाय मे अनेकों अच्छे नामो से पुकारा जाने लगता है.

changing the definition of religious extremism

लेकिन आज हम जिस समाज में, जिस युग मे रह रहे हैं उसमे धर्म तथा उसके अनुयायी किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं बल्कि हर रंग,नस्ल,जाति व संप्रदाय के लोग अपनी अपनी धार्मिक परिभाषा के साथ पूरे विश्व में एक साथ रह रहे हैं.ऐसे मे कभी कभी तनाव पूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ता है.यही तनाव समाज मे हिंसा का जनक है,यही तनाव ही अमानवीय घटनाओं का स्रोत है, यही तनाव ही कभी कभी मानवता का उपहास उड़ाता प्रतीत होता है. लेकिन सवाल ये है की ऐसे तनाव का वास्तविक कारण क्या है? क्यूँ वो लोग जो एक समाज का हिस्सा होते हैं ,एक साथ रहते हैं लेकिन तथाकथित कट्टरपंथ की भेंट चढ़कर एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं? इसका मूल कारण है लोगों का अपने धर्म के प्रति पूरी आस्था व ज्ञान का ना होना.क्यूंकी कट्टरपंथ के आवेश मे आकर जिस तरह की मानवता को तार तार कर देने वाली घटनायें सामने आती हैं उसका किसी भी धर्म से कोई संबंध नही होता और ना ही उसे किसी धर्म विशेष से जोड़ा जाना चाहिए क्यूंकी इस घृणित कार्य के लिए केवल और केवल उसके अनुयायी ही उत्तरदायी होते हैं ना की धर्म. कोई धर्म अपने अनुयायियों को ये छूट नही देता की दूसरे धर्म के अनुयायियों को अपने से कम आँके या अपने धर्म के आदेशों को दूसरों पे ज़बरदस्ती लागू करें.ऐसे ही कुंठित मानसिकता से ग्रस्त लोगों के बारे मे तो क़ुरान खुद फटकार लगाते हुए कहता है की,” धर्म मे कोई ज़बरदस्ती नही है”,(सुराह अल बक़रह );

जब धर्म मे कोई ज़बरदस्ती है ही नहीं तो आप किसी को अपनी बात मनवाने के लिए भला कैसे बाध्य कर सकते हैं! अब रही बात धार्मिक कट्टरता की या उससे व्युतपन्न अराजकता की तो ये केवल लोगों का मानसिक भ्रम है की धार्मिक कट्टरता अराजकता की जाननी है. ये तो तथाकथित धार्मिक नेताओं की अपने वर्चस्व की लड़ाई तथा अपने अस्तित्व का आभास कराने का उद्देश्य मात्र के लिए किया गया कुकर्म है.जिसका राजनीतिक लाभ केवल नेताओं को ध्रुवीकरण के माध्यम से होता है.या यूँ कहा जाय की कभी कभी ये राजनीतिज्ञों के द्वारा हमारी धार्मिक भावनाएँ भड़काकर केवल राजनीतिक लाभ लेने हेतु किया गया घृणित कारनामा है.

वरना धार्मिक कट्टरता तो ये है कि शराब को आप किसी भी कीमत पर हाथ ना लगाएँ, सूदखोरी से अपने को दूर रखें, गर्दन पर तलवार ही क्यूँ ना लटक रही हो किंतु सच बोलने से पीछे ना हटें,कोई प्यासा अगर आए तो बिना पानी पिए ना जाए,कोई भूखा अगर आपके दरवाज़े पर दस्तक दे तो बिना कुछ खाए हुए ना जाए,किसी मजबूर लाचार,बेगुनाह पर ज़ुल्म होता देखें तो खामोश ना बैठें भले ही इसके लिए हमें अपनी जान ही क्यों न गँवानी पड़ जाये. ये वो बातें है जिसकी शिक्षा हर धर्म देता है. कहने का तात्पर्य है की धर्म, कि जिससे हम संबद्ध हैं, उसकी तमाम बातें हम पर लागू होती हैं ना की दूसरों पर, उन आदेशों का पूरी तरह पालन हमें करना है ना की औरों को इसके लिए मजबूर किया जाए.

उदाहरणतः अगर माँस खाना हमारे धर्म मे वर्जित है तो इसका सख्ती से पालन हमे करना है ना की हम दूसरे मज़हब के लोगों को इस नियम के अधीन लाएँ. हर धर्म की व्याख्या भौगोलिक,सामाजिक पर्यावरण के आधार पर भिन्न भिन्न हो सकती हैं किंतु बुनियादी उसूल सबके एक ही हैं.हमे उन्ही बुनियादी उसूल को पहचानना है और अगर उन उसूलों पे हर धर्म के मानने वाले यथार्थता से अनुसरण करें तो अराजकता की स्थिति तो कभी पैदा ही नही होगी.क्यूंकी धार्मिक कट्टरता का अर्थ हिंसा तो बिल्कुल भी नही है. धर्म तो समाज की इन्ही बुराइयों को दूर करने आया था परंतु लोगों ने समाज को हिंसा के इस दलदल मे धकेलने के लिए धर्म का ही इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. वास्तव मे ये बहुत ही दुखद संकेत है.परंतु हमे हार बिल्कुल नही माननी चाहिए क्यूंकी अगर कहीं समस्या है तो समाधान भी उसी मे ही निहित होता है. ऐसे झूठे वा तथाकथित कट्टरपंथ से निपटने के लिए हमे वास्तविक धार्मिक कट्टरता की ही ज़रूरत है अर्थात हमे अपनी धार्मिक शिक्षाओ पे यथार्थता से पालन करना शुरू कर देने की आवश्यकता है.

हमे किसी के भी पीछे आँख मूंद कर चलने और उसके भड़काने मे नहीं आना है. तो आओ हम सब अपने अपने धर्म की ओर लौटें और जिस झूठे धार्मिक कट्टरपंथ के दुर्ग का निर्माण किया जा रहा है उसको हमसब मिलकर हमेशा के लिए धराशायी कर दें.

जय हिंद

–फ़ैज़ान अशरफ़


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