वसीम अकरम त्यागी
वसीम अकरम त्यागी

प्रिय पाठकों

दो खबरें आपके सामने आईं एक थी टाईम्स नाऊ के एंकर अर्नब गोस्वामी की जिसमें वे टाईम्स नाऊ को बाय बाय कह रहे थे। दूसरी खबर थी एनडीटीवी के 9 नवंबर को होने वाले प्रसारण पर प्रतिबंध की, जिसमें एनडीटीवी को पठानकोट हमले के दौरान लापरवाही से सुसज्जित रिपोर्टिंग करने के लिये चैनल पर एक दिन का प्रतिबंध लगाया गया है। एक तरह से सरकार ने चैनल को सजा दी है। यह पहली बार नहीं हुआ है इससे पहले भी अलजजीरा समेत कई चैनलों पर एक दिन से लेकर तीस दिन तक का प्रतिबंध लगाया जा चुका है। हालांकि उस दौर के ‘1200 साल की गुलामी’ वाले दौर में गिना जायेगा।

आपको याद होगा कि 26/11 हमले का लाईव प्रसारण लगभग तमाम चैनलों ने किया था। रक्षा विशेषज्ञों का मानना था कि लाईव प्रसारण की वजह से ही ऑपरेशन इतना लंबा यानी 72 घंटा तक चल पाया था। लेकिन उस वक्त की यूपीए सरकार ने किसी भी चैनल का प्रसारण बंद नहीं किया था। हेलीकॉप्टर से उतरते हुऐ कमांडों को आप अपने बैडरूम में देख रहे थे, ताज में छिपे हुआ हमलावरों को आप अपनी आँखों से देख रहे थे। बहरहाल इन दिनों ‘बागों में बहार’ सोशल मीडिया पर सुपर डूपर हिट है। चैनल का प्रसारण बंद होने से नुकसान या फायदा कंपनी को होगा न कि बागों में बहार गा कर सोशल मीडिया को पौत डालने वाले पाठकों को। एनडीटीवी ने अपने लिये आवाज उठाई, उठानी भी चाहिये, मगर इस बागों की बहार के बीच एक खबर की लगभग मौत ही हो गई जिसमें सुदर्शन चैनल के सुरेश चव्हाणके पर उनके चैनल की पत्रकार ने बलात्कार जैसे गंभीर आरोप लगाते हुऐ एफआईआर दर्ज कराई। मगर बागों में इतनी तेज बहार आई कि यह खबर दबकर रहकर गई। खैर अगर बहार आई भी नहीं होती तब भी किसी मीडिया चैनल की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह सुरेश चव्हाणके की खबर को चलाये, क्योंकि अबसे पहले इंडिया टीवी के रजत शर्मा पर भी ऐसे ही आरोप लगे थे वह तो ‘पतझड़’ था मगर तब भी किसी चैनल ने उस खबर को नही चलाया था। हालांकि यही टीवी चैनल होते हैं जब किसी मुस्लिम बस्ती में स्पेशल सेल घुसती है और वहां से लोगों को दबोच कर इनके सामने लाती है ये उस वक्त सवाल नहीं करते बल्कि सीधा सीधा पुलिसिया कहानी को ही सच बताकर उन लोगों को आतंकी घोषित करते रहते हैं।

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जाकिर नाईक को किस तरह इन टीवी चैनलों ने आतंक का गुरु बनाया था यह सारे देश ने देखा है, शहाबुद्दीन का किस तरह मीडिया ट्रायल किया गया यह भी पूरा देश जानता है। मगर जैसा शौर शहाबुद्दीन की जमानत पर मचा था वैसा माया कोडनानी, बाबू बजरंगी, डीजी वंजारा की जमानत पर नहीं मचा पाये। यहां शहाबुद्दीन की वकालत बिल्कुल नहीं की जा रही है बल्कि सवाल यह है जब मीडिया ट्रायल शहाबुद्दीन का हो सकता है तो फिर दूसरे अपराधियों को इससे दूर क्यों रखा जाता है ? यही मीडिया मेरे जैसे नाम वाले किसी भी आरोपी को सीधा आतंकवादी/मास्टरमाईंड लिखता है, मगर साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित, असीमानंद जैसे विचाराधीन कैदियों को अपनी ही परंपरा तोड़ते हुऐ आतंकवादी नहीं लिखता बल्कि उनके नाम से पुकारता है। रवीश कुमार एक अपवाद है उनके अलावा किसी ने भी इस दौगली नीति पर प्रहार करने की जरूरत महसूस नहीं की। भोपाल में सिमी के आठ कार्यकर्ता एक कथित मुठभेड़ में मार दिये गये प्रिंट मीडिया से लेकर टीबी वाले पत्रकारों ने बजाय उन्हें विचाराधीन कैदी लिखने के उन्हें सीधा आतंकवादी लिखा। क्या किसी ने संज्ञान लेना जरूरी समझा कि न्यायपालिका से पहले जज बनने वाले ये पत्रकार आखिर कौन होते हैं ? आगे भी ऐसा ही होता रहेगा शायद ही कोई सरकार इस पर संज्ञान लेकर किसी चैनल के प्रसारण पर महज घंटे भर का ही प्रतबिंध लगाये ? सुदर्शन न्यूज वाला सुरेश चव्हाणके मुसलमानों को गालियां देता है, अजान को ध्वनी प्रदूषण बताता है, औवेसी को नमकहराम बताता है, सैक्यूलरिज्म को गालियां देता है क्या किसी टीवी वाले की हिम्मत हुई कि वह उसे मुंह तोड़ जवाब दे सके ? क्या भारत सरकार की हिम्मत हुई कि उस चैनल का प्रसारण बंद कर सके।

मेरे साथी पत्रकार Aasmohammad Kaif ने लिखा है एक दिन टीवी नही देखोगे तो क्या फ़र्क़ पड जायगा ।मुझ जैसे बहुतेरे नही देखते। मै NDTV भी नही देखता। जिस कट्टरपंथ ने पाकिस्तान को तबाह किया है अब वही कट्टरपंथ भारत को बर्बादी की और ले जा रहा है …एक दिन के बैन पर सब चिल्ला पड़े क्योंकि तुमको लगता है सिर्फ तुम सही हो! कभी भी कहीं भी। इस देश को खतरा एक दिन के बैन से बहुत बड़ा है ,काल्पिनक कहानियो से सीख लेकर इंसानो के सर मे सीधे गोली दागी जा रही है। सब कुछ बस कुचल देना चाहते है। बदला की भावना बस तबाह कर देना चाहती है मानसिक पागलपन से बचे। देश देश का अल्पसंख्यक दहशत मे है और आप तब बोलते है जब एक दिन का टीवी बंद होता है ….आपको पता है आटा पर 30 % पैसा ज्यादा हो गया है 185 का दस किलो आटा अब 220 का है सिर्फ 7 दिनों मे ….और आप तब खड़े होते है जब आप चाहते है ……

और अंत में एनडीटीवी या यूं कहें कि सिर्फ टीवी से रवीश कुमार को निकाल दिया जाये तो टीवी के पास बचता ही क्या है ?

 लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।

(नोट – उपरोक्त लेखक के निजी विचार है )


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