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श्रीराम और श्रीकृष्ण के जीवन की दो घटनाएं ऐसी हैं जिनका जिक्र लोग बहुत कम करते हैं। लोगों की दिलचस्पी रामलीला में तो खूब है। हर साल रावण का पुतला जोर-शोर से जलाते हैं, पर वे राम की बातों से सबक लेना नहीं चाहते। कृष्ण की लीलाओं और बचपन में उनके नटखट स्वभाव को हमने इतना ज्यादा प्रचारित कर दिया कि उनसे आगे बढ़ना ही नहीं चाहते। इसी का नतीजा है कि जिस कर्मयोग का ज्ञान देने कृष्ण यहां आए थे, उनके देश में कामचोरों की भरमार है।

युग बदलने के साथ जिस तरह हिंदुस्तान का पतन हुआ, एक-एक कर हमारी नींव की ईंटें कमजोर हुईं, इससे मौका देखकर मिर्च-मसाला बेचने वाले मामूली सौदागर भी यहां आकर हमारे भाग्यविधाता बन गए … इन सबसे आहत होकर कभी-कभी मैं सोचता हूं कि हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ?

हम राम और कृष्ण के नाम की माला तो खूब जपते हैं, परंतु उनकी असल बातों को समझना ही नहीं चाहते। मैं यहां दो घटनाओं का जिक्र करूंगा। पहली घटना उस दौर की है जब जंग के मैदान में रावण धराशायी पड़ा था। वह रावण, जिसके जोर का डंका त्रिलोक में बजता था। आज अयोध्या के राजकुमार से मात खा गया!

वह राजकुमार साधारण नहीं था। जब श्रीराम हाथ में धनुष थामते तो शत्रु की शिकस्त और सत्य की जय-जयकार होती। उनसे जंग लड़ने वाला रावण मैदान में असहाय पड़ा था तो श्रीराम ने लक्ष्मण को आदेश दिया कि वे उससे शिक्षा ग्रहण कर आएं। उसी रावण से जो कुछ समय पहले तक उनका स्वागत बाणों की बौछार से कर रहा था। अब राम चाहते थे कि लक्ष्मण अपने दुश्मन से सबक सीखें!

लक्ष्मण ने ऐसा ही किया, मगर हिंदुस्तान ने इस घटना से कुछ नहीं सीखा। जब श्रीकृष्ण आए तो उन्होंने कुरुक्षेत्र की रणभूमि में दिव्य ज्ञान दिया। उनकी हर बात में शिक्षा छुपी है, बस देखने-समझने वाला चाहिए। युद्ध खत्म होने के बाद वे युधिष्ठिर को लेकर मरणासन्न पितामह भीष्म के पास गए।

वे पितामह भीष्म जो कौरवों के प्रधान सेनापति थे। उनके बाणों ने पांडवों की विजयश्री का मार्ग रोका था। कृष्ण चाहते थे कि युधिष्ठिर उनसे सबक सीखें। युधिष्ठिर ने सीखा, मगर हिंदुस्तान ने इस घटना से कोई सबक नहीं सीखा।

हम इतिहास से मुंह मोड़ते रहे हैं। यहां तक कि सुनहरे इतिहास में ही खोए रहे। इस दंभ की दुनिया में जीते रहे कि हम तो विश्वगुरु रह चुके हैं! अब हमें सिखाने वाला और कौन है? हम तो दूसरों को सिखाने वाले हैं, हम किसी से क्यों सीखें?

हमारे ऋषियों ने कितने बड़े आविष्कार कर दिए, अब हमें कुछ करने की जरूरत नहीं है। हमने सबकुछ छोड़ दिया। पूरे विश्व को अपना परिवार मानते रहे लेकिन ऐसी परंपराएं बना लीं कि जो समुद्र की यात्रा करेगा, उसे जाति से बाहर निकाल दिया जाएगा। हमने सीखने की इच्छा छोड़ दी, कहीं जाना पसंद नहीं किया। हम खुद कहीं नहीं गए, इसलिए अंग्रेज जहाज में बैठे और यहां राज करने आ गए।

क्या ज्ञान, बुद्धि, विवेक, प्रतिष्ठा व पराक्रम में हम राम और कृष्ण से भी आगे निकल गए कि हमें किसी से कुछ सीखने की जरूरत नहीं है? राम व कृष्ण ने मां से सीखा तो गुरु से भी सीखने में अव्वल रहे। वे अपने विरोधी से सीखना भी शान के खिलाफ नहीं समझते थे।

इन दिनों फिर हिंदुस्तान की हवाओं में यह शोर है कि अकबर महान नहीं था, प्रताप महान थे। इसलिए किताबों से अकबर को निकाल बाहर करो।

मैं इस बात का तो स्वागत करूंगा कि महाराणा प्रताप को इतिहास में उचित स्थान दिया जाए। ऐसे शूरवीर, न्यायप्रिय, सत्यवादी, स्वाभिमानी, निष्कलंक जीवन जीने वाले महापुरुष का स्थान पुस्तकों में ही क्यों, हमारे दिलों में होना चाहिए। मगर अकबर को भूलना, उसका नाम मिटा देने की कोशिश करना न तो इतिहास के साथ न्याय है और न इन्सानियत के साथ इन्साफ। यह दिन के उजाले में आंखों पर पट्टी बांध यह कहने जैसा है कि धरती पर कभी सूर्योदय नहीं हुआ।

आप प्रताप के स्वाभिमान, देशप्रेम के बारे में बताइए। साथ ही अकबर की दूरदर्शिता, सभी धर्मों के प्रति सम्मान, प्रशासनिक कुशलता के बारे में भी समझाइए। अगर अकबर को महान कहने से आप आहत होते हैं तो उसे महान मत कहिए, लेकिन आप यह तो नहीं कह सकते कि अकबर नाम का कोई शहंशाह हिंदुस्तान में हुआ ही नहीं!

मैं प्रताप की महानता को नमन करता हूं, परंतु मुझे अकबर को महान कहने में कोई शर्म नहीं है। इतिहास सबक लेने के लिए है। उससे चिपके मत रहिए, उससे शिक्षा लीजिए। अकबर के गीत मत गाइए। उसकी खूबियां देखिए, उससे जो भूल हुईं वे भी दिखाइए।

इतिहास के आईने में देखिए कि ऐसी कौनसी बातें हैं जो हमें अकबर से सीखनी चाहिए, प्रताप से ग्रहण करनी चाहिए। सिर्फ खूबियां बताने में न खो जाएं। यह भी बताइए कि बतौर बादशाह अकबर से ऐसी कौनसी गलतियां हुईं जो नहीं होनी चाहिए थीं। हमें उनसे सबक लेना चाहिए, उन्हें दोहराने से बचना चाहिए।

कुछ इतिहासकारों ने अकबर को ऐसा धर्मांध, कट्टर, रंगीन मिजाज बादशाह बताने की कोशिश की है जो दूसरों को मिटाने में ही जुटा रहा है, राग-रंग में पड़ा रहा। तो सुन लीजिए, अकबर वह बादशाह था जिसने अपनी प्रजा को धर्म के आधार पर पूरी आजादी दी थी। इस मामले में वह अपने समय से बहुत आगे था। उसके दरबार में बड़े व महत्वपूर्ण पदों पर हिंदू अधिकारी तैनात थे।

जब कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने ऐतराज जताया तो उसने साफ कह दिया कि मैं सिर्फ मुसलमानों का शहंशाह नहीं हूं। इस मुल्क में हर दीन-धर्म को मानने की आजादी होगी। इसके लिए मैं किसी मौलाना की इजाजत लेना जरूरी नहीं समझता। मस्जिद जाने वाले मस्जिद जाएं, अगर किसी ने मंदिर को नुकसान पहुंचाया तो उसकी खैर नहीं। उसके महल में श्रीकृष्ण का मंदिर था। उसके दिल में हर धर्म के लिए सम्मान था। वह ईद मनाता तो दीपावली के दीयों से उसे कोई नफरत नहीं थी।

उसने दीने-इलाही धर्म चलाया। उसमें सभी धर्मों की अच्छी बातों को शामिल किया गया। वह चाहता तो सेना के जोर पर सबको यह धर्म स्वीकार करने के लिए बाध्य कर सकता था, लेकिन उसने कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं की। दीने-इलाही को मानने वालों की संख्या उंगलियों पर गिनने जितनी ही रही।

अकबर अपनी प्रजा की बहुत फिक्र करता था। उसने ऐसी कई इमारतें बनवाईं जो आज शान से खड़ी हैं। सर्दी-गर्मी, आंधी-तूफान सबकुछ झेलने के बाद ये दीवारें सीना तानकर खड़ी हैं कि कोई तो दिखा दे कि शहंशाह अकबर ने दीवार बनाने में पैसे खा लिए या घटिया माल लगाया! आज तो सरकारें ऐसे पुल बनाती हैं जो कब गिर जाएं, कहा नहीं जा सकता। ऐसे पुलों पर पांव रखने से पहले बीमा करा लेना फायदे का सौदा है।

सरकारें ऐसी सड़कें बनाती हैं कि सालभर बाद उनका नामोनिशान नहीं रहता। मैं अकबर को इस किस्म के धूर्त व दगाबाज नेताओं से ज्यादा ईमानदार समझता हूं जिनकी देशभक्ति सिर्फ नोट गिनने तक सीमित है।

ये लोग देशवासियों को मूर्ख बनाते हैं। इनके घरों की दीवारें मजबूत हो सकती हैं लेकिन देश की नींव तो ये खोखली कर रहे हैं।

अकबर ने देश को मजबूत व खुशहाल बनाया। उसके शासन में भारत का विदेशों से व्यापार परवान पर था। देश की सीमाएं सुरक्षित थीं। सेना मजबूत थी। हमारे हथियारों की धाक थी। शहंशाह के दरबार में पंडितजी आते तो पादरी व मौलवी साहब के लिए भी स्थान था।

हर एक के लिए बादशाह का दरबार खुला था। आज आप अपनी कोई समस्या लेकर सरकारी दफ्तर जाइए या किसी नेता के सामने गिड़गिड़ाइए। उनका दिल पसीज जाए तो बताइए।

अफसरों का अहंकार सातवें आसमान पर है। नेताओं के पास जनता के लिए वक्त नहीं है। मैं ऐसे अधर्मी, कामचोर, बेईमान शासन से अकबर के शासन को बेहतर मानता हूं। यहां सिर्फ और सिर्फ रिश्वत से काम होता है। जब चांदी का जूता चलता है तभी फाइलें आगे बढ़ती हैं।

उस शहंशाह के शासन में अफसरों की इतनी हिम्मत नहीं थी कि घूस मांग लें। अगर अकबर को मालूम हो जाता तो वह सजा-ए-मौत देने से न हिचकता। आज तो चारों ओर लूट मची है। यह मैं किसी एक सरकार के लिए नही कह रहा। हर दल की सरकार में ऐसा ही होता आया है। कोई किसी से कम साबित नहीं हुआ।

अकबर के दरबार में योग्यता की कद्र थी। वह गुणों का पारखी था। फिर चाहे किसी का धर्म कुछ भी हो, बादशाह उसे देश की सेवा में लगाता था। उसके दरबार में भेदभाव नहीं था, आरक्षण का ऐसा अंधकार नहीं था कि 95 फीसदी वाला रोता फिरे और 35 फीसदी वाला डाॅक्टर बनकर आॅपरेशन करे। जिस तरह की व्यवस्था थी, उसमें सबको बराबरी का अधिकार था।

उसने जो हासिल किया, इसी हिंदुस्तान से हासिल किया। उसने जो किया, इसी हिंदुस्तान की मिट्टी के लिए किया। वह यहीं पैदा हुआ, उसने यहीं मरना पसंद किया। उसने एक भी पैसा विदेश नहीं भेजा। आज तो रोज काले चोरों के नामों का खुलासा हो रहा है। नेता-अफसर जमकर माल कूट रहे हैं और स्विस बैंकों में काला धन जमा करा रहे हैं। कोई बता तो दे कि अकबर किस बैंक में रकम जमा कराता था?

यह हिंदुस्तान का दुर्भाग्य है कि अकबर और प्रताप जैसे दो बहुत ही काबिल लोग एक-दूसरे पर वार करते रहे। अगर ये दोनों मिल जाते तो क्या मजाल कि हमारी धरती पर ब्रिटेन का झंडा लहराता। बेहतर होता कि हल्दीघाटी में लहू की नदियां न बहतीं। क्या ही अच्छा होता अगर एक-दूसरे की छाती पर भाला और बाण से प्रहार करने वाले हाथ मिलकर मुल्क की हिफाजत करते। अगर ऐसा होता तो हिंदुस्तान का नजारा ही कुछ और होता।

बाते चाहे अकबर की हो या औरंगजेब की, पृथ्वीराज की हो या प्रताप की, नेहरू की हो या नरेंद्र मोदी की, इतिहास जीने के लिए नहीं होता, सीखने के लिए होता है। अगर इतिहास की गलियों में ही भटकते रहे तो कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे। इससे सबक लीजिए, आगे बढ़िए। राजा-बादशाहों को पसंद करना अलग बात है, उनके अंधभक्त मत बनिए। ये खुदा नहीं, इन्सान हैं। लोगों को इनकी खूबियां बताइए, तो इनकी गलतियां बताने से भी परहेज मत कीजिए।

कमियां अकबर में भी रही होंगी, गलतियां उससे भी हुई होंगी, भूलवश कोई गुनाह उसने भी किया होगा, महफिल में वह हंसा तो अकेले में कभी रोया होगा। मत भूलिए कि वह इन्सान था। इन्सान गलती कर सकता है। अगर आप दुनिया में ऐसा इन्सान ढूंढ़ना चाहते हैं जिसने न कभी गलती की, न वह हंसा, न रोया, न कुछ खाया, न कभी सोया, तो धरती के बजाय किसी दूसरे ग्रह पर ढूंढ़िए, क्योंकि ऐसा कोई इन्सान यहां उपलब्ध नहीं है।

राजीव शर्मा

गांव का गुरुकुल से


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