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शम्स तबरीज़ कासम

आज का दिन इतिहास में विशेषता के साथ लिखा जाएगा क्योंकि एक तरफ कुछ मुसलमानों को आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार किया गया है तो वहीं दूसरी ओर लंबे समय से जेल में बंद कुछ मुसलमानों को आतंकवाद के आरोप से सम्मानजनक रहा हुई मिली है, आइए पहले हम दोनों खबर आपको बताते हैं।

पहली खबर: पिछले देर रात दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आतंकवाद के खिलाफ कारवाई करते हुए दिल्ली, एनसीआर और देोबंद से कुल 13 मुस्लिम युवकों को प्रतिबंधित संगठन जैश मुहम्मद लिए काम करने, और अपरमह साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया है, तेरह में से 9 की गिरफ्तारी दिल्ली एनसीआर की गई जबकि चार की गिरफ्तारी देवबंद से दिखलाई गई है, तीन को आज अदालत में पेश किया गया बकया नौ की हिरासत में जांच जारी है।

दूसरी खबर: सुप्रीम कोर्ट ने आज एक महत्वपूर्ण फैसले में जयपुर की विशेष टाडा अदालत के फैसले को कैंसिल करते हुए आरोपियों अब्रे रहमत और डॉक्टर जलीस अंसारी को निर्दोष करार देते हुए रिहा करने का आदेश जारी कर दिया है, जयपुर की विशेष टाडा अदालत के न्यायाधीश वी के माथुर 28 फरवरी 2004 को अपने फैसले में अब्रे रहमत को 20 और डॉ जसलररस अंसारी को 15 साल कैद बामशकत की सजा सुनाई थी.दसम्बर 1993 में पांच ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोट मामले में सीबीआई ने 15 उच्च शिक्षित मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार करके उनके खिलाफ मुकदमा कायम किया था। इस मामले का फैसला 2004 में जारी किया गया जिसमें डॉ। जलीस अंसारी और अब्रे रहमत को 15 और 20 साल की सजा प्रस्ताव किया गया था।

यह दोनों खबर महत्वपूर्ण और मीडिया के लिए गुड न्यूज है लेकिन राष्ट्रीय मीडिया में केवल गिरफ्तारी की खबर को Good News का स्थान मिला, लगभग सुबह दस बजे के बाद सभी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज बन कर यह खबर चलने लगी, टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे अखबारों ने तुरंत उसे अपडेट किया, खुद मुझे व्हाट्सप्प पर एक साहब के बताने के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया की वेबसाइट से पूरी जानकारी मिली लेकिन वहाँ केवल 12 मुसलमानों का जिक्र था जमीअत उलेमा हिंद की प्रेस रिलीज़ से मालूम हो कि कल तेरह युवाओं को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने गिरफ्तार किया है।

दूसरी खबर आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार किए गए मुसलमानों की रिहाई से संबंधित है, पत्रकारिता का एक कम से छात्र होने के नाते यह दूसरी खबर अधिक महत्वपूर्ण है, मीडिया में इसे गुड न्यूज का दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि जिन लोगों को पुलिस और एजेंसियों ने आतंकवादी ठहराया, जिन्हें अपने शोध में दोषी साबित किया गया था आज सुप्रीम कोर्ट से उन्हें बाइज़्ज़त रिहा मिली है और जांच एजेंसियों के प्रदर्शन पर सवालिया निशान स्थापित हो गया है, सीबीआई जैसी जाँच एजेंसी की भूमिका मशकूक हो गया है, समस्या स़िर्फ नामित अपराधियों की रिहाई का नहीं बल्कि वास्तविक समस्या जांच एजेंसियों की अक्षमता का है , मुसलसल पेश आने वाली घटनाओं से यह साबित हो रहा है कि देश की जांच एजेंसियां मूल अपराधियों तक पहुँचने में असफल हैं, जाँच के मामले में भारत बहुत पीछे है बल्कि इस अध्याय में यहां अभी भी जंगल राज का दौर चल रहा है, और अपनी विफलता का मुंह छिपाने के लिए यह बेकसूरों पर आरोप लगाकर अपनी सफलता का डंका बजाते हैं।

ये कारण हैं जिनकी बिना पर इस खबर को अहमियत मिलना चाहिए था लेकिन अफसोस कि इस खबर का कहीं नामोनिशान नहीं है, आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार मुस्लिम युवाओं का मुकदमा लड़ने वाले संगठन जमीअत उलेमा हिंद अगर प्रेस रिलीज़ जारी करके यह खबर मेल नहीं करती तो शायद मुझे भी इस बारे में कुछ पता नहीं हो पाता, नमनिहद राष्ट्रीय मीडिया की ये जनिबदरी क़बीले अफसोस और देश के सेक्युलर ताने-बाने को बिखेरने के बराबर है, दिल्ली में आतंकवाद के आरोपों में गिरफ्तार किए गए मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी को अहमियत देना और बड़ी खबर बनाकर सुबह से ही इसका ढिंढोरा पेटनाा उनको खतरनाक आतंकवादी बनाकर पेश करना और सुप्रीम कोर्ट द्वारा आज ही निर्दोष करार देकर 23 साल बाद रिहा किए गए मुस्लिम युवकों के मामले को मुकम्मल नजरन्दाज़करना और उसे मामूली कवरेज न देना इस बात का सुबूत है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा फासीवादी ताकतों की सोच और विचारधारा के प्रभाव काम कर रहा और इसका उद्देश्य केवल मुसलमानों की छवि खराब करना है।

साभार : मिल्लत टाइम्स


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