• 1984 और 2002 के दंगों में बस समय और जगह का फर्क हैजेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने गुजरात और 1984 में हुए सिक्ख विरोधी दंगों को अलग अलग बता कर एक नई बहस छेड़ दी है. पर क्या यह बात इतनी सीधी है?
  • सिक्ख विरोधी दंगों की जांच कर रहे नानावती आयोग को दिए गए अपने बयान में वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह ने कहा था, ”मैं अपने ही देश में शरणार्थी जैसा महसूस कर रहा था. वास्तव में मुझे लगा कि मैं नाजी जर्मनी में रह रहा हूं.” 
  • ”नाजी जर्मनी” फासीवाद की क्रूरतम और अधिकतम अभिव्यक्ति है. फासीवाद में इसके आगे कुछ नहीं बचता. 1984 में तीन दिनों के लिए दिल्ली नाजियों के जर्मनी की तरह हो गई थी. 2002 के गुजरात की तरह.

सिक्ख विरोधी दंगों की जांच कर रहे नानावती आयोग को दिए गए अपने बयान में वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह ने कहा था, ”मैं अपने ही देश में शरणार्थी जैसा महसूस कर रहा था. वास्तव में मुझे लगा कि मैं नाजी जर्मनी में रह रहा हूं. ”

”नाजी जर्मनी” फासीवाद की क्रूरतम और अधिकतम अभिव्यक्ति है. फासीवाद में इसके आगे कुछ नहीं बचता. 1984 में तीन दिनों के लिए दिल्ली नाजियों के जर्मनी की तरह हो गई थी. जहां सरकारी मशीनरी की मदद से सिक्खों का सुनियोजित नरसंहार किया गया. 2002 के गुजरात की तरह.

आधिकारिक अनुमान के मुताबिक करीब तीन दिनों के भीतर दिल्ली में 2,733 सिक्ख पुरुष, महिलाएं और बच्चों को मार डाला गया. वहीं गुजरात में आधिकारिक अनुमान के मुताबिक करीब 800 मुस्लिम और 254 गैर मुस्लिम मारे गए. दोनों ही मामले में अनाधिकारिक आंकड़ा कहीं अधिक है.

दोनों ही दंगे एक हद तक राज्य प्रायोजित थे. इसलिए मरने वालों की संख्या कम या ज्यादा होने की बहस में पड़ना मुनासिब नहीं है. लेेकिन 84 में मरने वाले सिर्फ एक समुदाय के थेे जबकि गुजरात में दोनों समुदाय के.

कांग्रेस 1984 पर बात करना नहीं चाहती. बीजेपी 2002 पर बात नहीं करती. 1984 के दंगों को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सिक्ख समुदाय से माफी मांगी और 2009 में सिक्ख दंगों के मुख्य आरोपियों जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार की उम्मीदवारी वापस ले ली गई. दंगा पीड़ितों के लिए इस माफी का कोई मतलब नहीं क्योंकि उन्हें यह महज दिखावा लगता है.

वजह: तीन आयोग और सात कमेटियों की जांच रिपोर्ट के बाद भी मुख्य आरोपियों के खिलाफ अभी तक आरोप पत्र दायर नहीं किया जा सका है. सजा दूर की बात है.

सिक्खों को माफी नहीं न्याय की उम्मीद है जो उन्हें अभी तक नहीं मिल पाई है. पी चिदंबरम पर फेंका गया जूता इससे उपजी हताशा और गुस्से का नतीजा था.

सिक्ख विरोधी दंगों पर किताब लिखने वालेे और अब राजौरी गार्डन से आम आदमी पार्टी के विधायक जरनैल सिंह ने अपनी किताब आई एक्यूज में लिखा है, ”सिक्खों के घरों को वोटर्स लिस्ट की मदद से पहचाना गया. पुलिस को चुप रहने के निर्देश दिए गए और फिर हरियाणा से ट्रेन बुक कर भीड़ दिल्ली बुलाई गई. डीटीसी की बसों को हरियाणा से अपराधियों को बुलाने के काम पर लगाया गया.”

कांग्रेस का झूठ

राहुल गांधी का यह दावा झूठा साबित हो चुका है कांग्रेस की सरकार ने सिक्ख विरोधी दंगों को रोकने के लिए सब कुछ किया.

गांधी के बयान को झूठा करार देते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के प्रेस सचिव तारलोचन सिंह बता चुके हैं, ”राष्ट्रपति प्रधानमंत्री से दिल्ली के दंगों के बारे में बात करना चाहते थे लेकिन प्रधानमंत्री ने उनसे बात नहीं किया. सुबह में उन्होंने गृहमंत्री नरसिम्हा राव से भी बात करने की कोशिश की लेकिन किसी ने उनसे बात नहीं की.”

इतना ही नहीं दिल्ली छावनी में तैनात सेना की टुकड़ी को बुलाने की बजाए मेरठ छावनी से सेना बुलाई गई. वह भी सड़क रास्ते से. मतलब साफ था. दंगाइयों को हत्या करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया. गुजरात में भी सब कुछ ऐसे ही हुआ.

दोनों ही दंगों में राज्य ने एक तरह से काम किया. हत्या का तरीका समान था. 1984 को 2002 के गुजरात में दोहराया गया. इस फर्क को किसी भी दलील या बचाव से नहीं मिटाया जा सकता.

कांग्रेस और बीजेपी का समान बचाव

कांग्रेस ने हमेशा ही सिक्ख दंगों को इंदिरा गांधी की हत्या से दुखी और क्रोधित भीड़ की त्वरित प्रतिक्रिया बताया. राजीव गांधी ने भी इस लाइन का समर्थन किया.

19 नवंबर 1984 को दिल्ली के बोट क्लब पर दिए गए भाषण में राजीव गांधी ने कहा, ”इंदिराजी की हत्या के बाद देश में कुछ दंगे हुए हैं. हम जानते हैं कि लोग गुस्से में थे और कुछ दिनों तक ऐसा लगा कि भारत हिल रहा है. लेकिन जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो स्वाभाविक तौर पर धरती हिलती है.”

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जिस तेजी से दंगों ने पूरी दिल्ली को अपनी चपेट में लिया, उससे यह साफ था कि सिक्खों को सबक सिखाने का इंतजाम सोच समझ कर किया गया था.

रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है. रिपोर्ट दंगों को भीड़ का उन्माद बताए जाने की धारणा को सिरे से खारिज करते हुए इसे सुनियोजित बताती है.

राजीव गांधी बनाम नरेंद्र मोदी

बड़ा पेड़ इंदिरा गांधी की हत्या थी और पास की धरती दिल्ली जहां सरकार की सरपरस्ती में सिक्खों को चुन चुनकर मारा गया. गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के दंगों को क्रिया की प्रतिक्रिया करार दिया तो राजीव गांधी ने इसे बड़े पेड़ के गिरने की प्रतिक्रिया बताई.

राजीव गांधी ने सिक्ख विरोधी दंगों की निंदा करने की बजाए केवल इंदिरा गांधी की हत्या की निंदा की

इतना ही नहीं इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने सिक्ख विरोधी दंगों की निंदा करने की बजाए केवल इंदिरा गांधी की हत्या की निंदा की. वास्तव में उन्होंने दंगा पीड़ितों की पीड़ा को जानबूझकर नजरअंदाज किया. गोधरा दंगों के बाद मोदी ने भी दंगा पीड़ितों से मिलना मुनासिब नहीं समझा.

संसद में इंदिरा गांधी की हत्या और 1984 में भोपाल गैस कांड में मारे गए पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी गई लेकिन दिल्ली में मारे गए सिक्खों के बारे में राजीव गांधी ने एक शब्द भी कहना उचित नहीं समझा. यहां तक कि चुनाव में भी उन्होंने इंदिरा गांधी की हत्या का जिक्र कर सहानुभूति बटोरने की कोशिश की.

इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि राजीव गांधी ने जिंदा रहते हुए सिक्ख विरोधी दंगों के लिए माफी नहीं मांगी. नरेंद्र मोदी ने भी अभी तक 2002 के दंगों के लिए माफी नहीं मांगी है.

गोधरा बनाम दिल्ली

  1. गोधरा के दंगे नहीं होते तो शायद नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री नहीं होते.
  2. सिक्ख दंगों के कर्ता-धर्ता को हिंदू समुदाय में वह जगह नहीं मिली जो गोधरा दंगों के बाद नरेंद्र मोदी को मिली.

इन दोनों तर्कों की मदद से 1984 के दंगों को 2002 के दंगों से अलग करना न केवल तथ्यों बल्कि समझ के आधार पर भी गलत है.

दिल्ली में हुआ सिक्ख दंगा आपातकाल के बाद कांग्रेस की तरफ से की गई बहुसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति का नतीजा था. आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को जनता पार्टी ने बुरी तरह से हराया. कांग्रेस की हार की बड़ी वजह उसके वोट बैंक में बिखराव की स्थिति थी जिसे इंदिरा गांधी दूसरे कार्यकाल में एकजुट नहीं कर पाईं.

गोधरा दंगों के बाद मोदी हिंदुओं के हीरो बने क्योंकि उन्होंने मुस्लिम को सबक सिखाया तो सिक्ख दंगों के बाद राजीव गांधी हिंदुओं के हीरो बने क्योंकि उन्होंने सिक्खों को सबक सिखाने का मौका दिया.

(सिक्ख दंगों के पहले पंजाब में खालिस्तान समर्थकों ने हिंदुओं की हत्या की थी जिसके बाद उनके खिलाफ पहले से ही गुस्सा था. कांग्रेस ने इस गुस्से को निकालने का मौका दिया)

आपातकाल के बाद कांग्रेस वोटों के एकीकरण में जुटी थी और 1984 के चुनावी नतीजे कांग्रेेस की बहुसंख्यक राजनीति की तस्वीर साफ कर देते हैं.

1984 में उत्तर भारत में कांग्रेस की जीत में हिंदुत्व की बड़ी भूमिका रही. इसका सबसेे बड़ा सबूत यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने खुलकर कांग्रेस को समर्थन दिया. यह हर तरह से सिक्ख विरोधी दंगों में कांग्रेस की तरफ से की गई हिंदुत्व की राजनीति पर संघ की मुहर थी.

1984 में उत्तर भारत में कांग्रेस की जीत में हिंदुत्व की बड़ी भूमिका रही. आरएसएस ने खुलकर कांग्रेस को समर्थन दिया

सिटीजंस फॉर डेमोक्रेसी के मुताबिक सिक्ख विरोधी दंगा बहुसंख्यकों को खुश करने के लिए कराया गया. इससे हिंदुओं का जबरदस्त एकीकरण हुआ. इस चुनाव में कांग्रेस को ऐतिहासिक जीत मिली (404 सीटें).

सरकारी मशीनरी का सांप्रदायिकीकरण

सिक्ख दंगों के वक्त देश में मीडिया की कमान सरकारी हाथों में थी. ऑल इंडिया रेडिया और दूरदर्शन समाचार के मुख्य स्रोत थे. इन माध्यमों पर कांग्रेस के नियंत्रण का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो को सरकारी नियंत्रण से अलग करते हुए स्वायत्ता देने का वादा किया था.

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद ऑल इंडियाा रेडिया ने अपने लगभग सभी बुलेटिन में हत्यारों की धार्मिक पहचान बताई. समाचार में बार-बार कहा गया कि प्रधानमंत्री की हत्या उनके ”सिक्ख” अंगरक्षकों ने की.

जबकि दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो के दिशानिर्देशों साफ तौर पर किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान के बारे में जानकारी देने पर मनाही है.

माफी नहीं न्याय

कांग्रेस ने सिक्ख दंगों के लिए माफी मांगी. अभी तक इस मामले में महज 13 लोगों को दोषी करार दिया गया है. बीजेपी ने गोधरा दंगों के लिए माफी नहीं मांगी लेकिन गोधरा दंगों में करीब दो दर्जन से अधिक लोगों को दोषी करार दिया जा चुका है. दोनों ही मामलों में अभी तक मुख्य आरोपी कानून की पहुंच से बाहर हैं.

यह सही है कि कांग्रेस ने सिक्ख दंगों के मुख्य आरोपियों को आगे नहीं बढ़ाया लेेकिन उन्हें सजा भी नहीं होने दी. आगे भी इसकी संभावना कम ही है.

कांग्रेस यह कह सकती है कि उसने दंगों के लिए न केवल माफी मांगी बल्कि एक सिक्ख को प्रधानमंत्री भी बनाया. तो क्या बीजेपी किसी मुस्लिम को प्रधानमंत्री बनाएगी?

मनमोहन सिंह को कांग्रेस ने इसलिए प्रधानमंत्री नहीं बनाया क्योंकि वह सिक्ख थे. बल्कि वह एक ऐसे व्यक्ति थे जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा शून्य थी और सोनिया गांधी को उस वक्त ऐसे ही व्यक्ति की जरूरत थी. उनका सिक्ख होना कांग्रेस के लिए बिन मांगे वरदान की तरह था जिसके लिए पार्टी को मशक्कत नहीं करनी पड़ी.

वैसे भी जब दिल्ली में सिक्खों को मारा जा रहा था तब देश का राष्ट्रपति एक सिक्ख ही था और वह कांग्रेस की मदद से ही राष्ट्रपति भवन पहुंचे थे. तो मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाना प्रतीकात्मक राजनीति के लिहाज से सही नहीं है. इसी आधार पर बीजेपी भी एपीजे कलाम को राष्ट्रपति बनाए जाने के फैसले की ढाल लेकर अलगाव की राजनीति का बचाव करती रही है.

राजनीति में प्रतीकों की अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन न्याय के बिना इसका कोई मतलब नहीं. सिंह की माफी इसी वजह से सिक्खों के किसी काम की नहीं.

सिक्खों को लगता है कि उनकी न्याय की लड़ाई में कोई उनके साथ नहीं आया. 2009 में अपनी किताब के विमोचन के मौके पर जरनैल सिंह ने पूछा था, ”आखिर 1984 के दंगों के खिलाफ गवाह के तौर पर कोई गैर सिख आगे क्यों नहीं आया? दंगों के 25 सालों बाद भी आखिर सिख समुदाय ही न्याय की लड़ाई क्यों लड़ रहे हैं.”

तब से लेकर अभी तक कुछ नहीं बदला. 25 साल का इंतजार अब 33 सालों का हो चुका है. 1984 और 2002 यहां अलग हो जाते हैं.

1984 और 2002 में अगर फर्क है तो बस इतना कि संगठन के तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बीजेपी के पीछे खड़ी है लेकिन विचारधारा के तौर पर वह कांग्रेस में उतनी ही धंसी हुई है जितना कि बीजेपी में.

अभिषेक पराशर

अभिषेक पराशर@abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, क…


लाइक करें :-


Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें

कमेंट ज़रूर करें