भारत वो देश है जो अपनी संस्कृति और यहाँ के लोगों के अच्छे आचरण और शिष्टाचार के लिये विश्व भर में प्रख्यात रहा है लेकिन विगत कई वर्षों से जिस प्रकार कॉरपरेट मीडिया के द्वारा एक ख़ास वर्ग मुसलमानों को लेकर प्रस्तुत किये जाने वाले समाचारों में जिस प्रकार की दोयम दर्जे और शिष्टाचार के नैतिक मूल्यों को रोंदने वाली भाषा का प्रयोग करने की प्रतिस्पर्धा में तेज़ी आयी है उसने देश की इस विशेष साख पर बट्टा लगा दिया है।

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सैयद अब्दुल करीम “दिव्यांग” जिनको दिल्ली पुलिस ने 16 अगस्त, 2013 को भारत-नेपाल बॉर्डर से गिरफ्तार किया था और चार मामलों में आरोपी बनाया था। शनिवार को कोर्ट ने उनको चौथे और आखिरी मामले में सभी आरोपों से बरी कर दिया है।

अब एक नज़र देश के चौथे स्तंम्भ मीडिया के द्वारा सैयद अब्दुल करीम को लेकर प्रस्तुत किये जाने वाले समाचार पर डालिये जिसमें उसके एक हाथ न होने पर उसको “टुंडा” कहकर देश भर की मीडिया द्वारा समंबोधित किया जाता रहा है ये किस शिष्टाचार की श्रेणी में आता है? दरअसल यह सब सिर्फ एक घृणित अतिनिंदनीय मानसिक सोच है।

विचार कीजिये यदि बाबा रामदेव को लेकर प्रस्तुत किये जाने वाले समाचारों में मीडिया उसको “बाबा रामदेव कांणा” कहकर संबोधित करने लगे तो ये देश इसको किस नज़र से देखेगा? क्या देश इसको बर्दाश्त करेगा कि किसी मनुष्य की ईश्वर के द्वारा दी गयी बनावट का मज़ाक उडाया जाये। दरअसल ये देश सिर्फ उस वक्त ये सब बर्दाश्त करता है जब इन सारी चीज़ों का समबंध मुसलमानों से होता है।

देश की शान वहाँ के लोगों की सभ्यता और ज़ुबान से जुडी होती है अपनी नैतिकता को बचा लीजिये। मीडिया के द्वारा दिव्यांगों को लेकर इस प्रकार के नीच खेल को समझिये अगर आपको दिव्यांगों से ज़रा भी हमदर्दी है तो अब्दुल करीम जेसे लोगों को “अब्दुल करीम टुंडा” नहीं “अब्दुल करीम दिव्यांग” कहकर संबोधित कीजिये , देश को शर्मिंदा होने से बचा लीजिये !

लेखकडा॰ उमर फारूक़ आफरीदी, मेडिकल ऑफीसर (डिपार्टमेंट ऑफ नैफ्रोलोजी) की पोस्ट पर पुष्पांजलि हॉस्पीटल एंड रिसर्च सेंटर आगरा में कार्यरत हैं।


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