14 जनवरी 1761 का दिन। पानीपत की तीसरी जंग मराठों और अहमद शाह अब्दाली के बीच चल रही थी। मराठे सरदार एक एक कर भाग रहे थे, मगर उनकी तोपखाना ब्रिगेड का जनरल इब्राहीम गार्दी डटा हुआ था। आखिर सूरज ढलने से पहले वह घायल हुआ। फिर खून और खाक़ में डूबा गार्दी अफगान बादशाह अब्दाली के सामने पेश हुआ।
अहमदशाह ने भेड़िए जैसे खूँखार अन्दाज में सवाल किया ‘तुम मराठों के दस हजार सिपाहियों के सलार थे।’ उसने उत्तर दिया ‘जरूर था।’

‘पहले तुम फ्राँसीसियों के यहाँ नौकर थे?’

‘ठीक सुना है।’

‘फिर निजाम हैदराबाद के यहाँ नौकरी की?’

‘सही है।’

‘उसे नौकरी को छोड़ा किसलिए?’

‘क्योंकि निजाम के रवैये मेरे उसूल के खिलाफ थे।’ तुम्हारे उसूल, अहमदशाह गुर्राया और फिर तीखी नजरों से गार्दी की ओर देखता हुआ बोला मुसलमान होकर फिरंगी जुबान पढ़ी, फिर मराठों की नौकरी की। खैर, अब तक तुमने जो कुछ भी किया, उस पर तुमको तोबा करनी चाहिए। हम तुम्हारी खताओं को माफ कर सकते हैं।

घाव की परवाह न करते हुए इब्राहीम बोला, तोबा, किसके लिए अफगान शाह। आपके देश में अपने मुल्क से मुहब्बत करने के लिए, और उस पर जान कुरबान करने के लिए क्या तोबा करनी पड़ती है?

किससे बातें कर रहे हो, इसका कुछ अन्दाज है? अहमदशाह फिर गरजा।

जानता हूँ और यकीन से जानता हूँ, आप यकीनन खुदा के फरिश्ते नहीं हैं।

मैं इतनी बड़ी फतह हासिल करके गुस्सा नहीं करना चाहता। तुम पर ताज्जुब होता कि मुसलमान होकर तुमने जिन्दगी को इस तरह बरबाद किया।

तब शायद आपको मालूम नहीं कि मुसलमान किसको कहते हैं। जो अपने मुल्क के साथ घात करे, बेगुनाहों का खून बहाने वालों का साथ दे, वह मुसलमान नहीं।

मुझको मालुम है कि तुम फिरंगियों के शागिर्द हो। उन्हीं से तुमने यह सब सीखा है। क्यों, कभी तुम नमाज पढ़ते हो?

क्यों नहीं, पाँचों वक्त।

अब्दाली के चेहरे पर व्यंग भरी मुस्कान आयी और आँखों में वही शैतानी क्रूरता। बाबेला, फिरंगी या हिन्दुस्तानी जुबान में पढ़ते हो, खुदा को भगवान् कहते होंगे।

अपने घावों की असहनीय पीड़ा को दबाते हुए गार्दी बोला, खुदा उर्दू फारसी, अरबी जुबान ही समझता है? उसे अंग्रेजी, फ्राँसीसी या मराठी नहीं आती? क्या खुदा और भगवान् में ज़ुबान (भाषा) के अलावा और क्या फर्क है?

घायल इब्राहिम के ठण्डे स्वर से एक क्षण के लिए अहमदशाह कुछ नरम पड़ा और कहने लगा, ‘अच्छा हम तुमको तोबा करने के लिए वक्त देते हैं। तुम तोबा कर लो हम तुमको छोड़ देंगे। अपनी फौज में तुम्हें अच्छा ओहदा भी देंगे।

उसने कहा, ‘अगर छूट जाऊँ तो फिर से पलटनें तैयार करूं। और तुम जैसे हैवानों को अपने मुल्क से खदेड़ कर बाहर कर दूँ।’

बद जुबान! अब्दाली से रहा नहीं गया। उसने गुस्से भरी तड़प के साथ इब्राहिम के टुकड़े-टुकड़े करके वध करने की आज्ञा दी।

दोनों हाथ काटे जाने पर ‘इब्राहीमगार्दी की चीख में से निकला, इनसानियत के लिए मेरी पहली नियाज।’
दोनों पैर काटे जाने पर वह् कमज़ोर आवाज़ में बोला, ए खुदा, हिन्दुस्तान की मिट्टी में ऐसे शूरमा पैदा करना, जो हैवानों व जालिमों को मिटा देने के लिए अपने को कुर्बान कर दें।
फिर आखिर में गला काटे जाने से पहले मराठों के ब्रिगेडियर जनरल इब्राहीम गार्दी के मुख से एक लफ्ज़ निकला ‘अल्लाह’ जिसको सुनकर आसमानी फरिश्तों और धरती के इतिहासकारों ने एक साथ कहा, ‘ऐसा होता है सच्चा मुसलमान।’

यह लेख वरिष्ठ पत्रकार नजीर मलिक की फेसबुक वाल से लिया गया है 


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