कोहराम न्यूज़ के लिए विष्णु प्रभाकर उपाध्याय का लेख

यूँ तो बनारस कई वजहों से मशहूर है। बनारस साड़ियों के लिए भी मशहूर है। बनारसी साड़ियों की हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि हिन्दुस्तान से बाहर के देशों में भी एक अलग पहचान है। टेक्सटाइल हिन्दुस्तान में कृषि के बाद दूसरा ऐसा रोजगार जिसमें ज्यादा लोग काम करते हैं यानि कृषि के बाद ज्यादा लोग इस व्यवसाय पर निर्भर हैं।

कृषि के हालात हिन्दुस्तान में किसी से छिपी बात नहीं है, प्रतिदिन किसानों के आत्महत्या की खबरें आ रही हैं और हमारे सम्मानित नेता किसानों की आत्महत्या के बुजदिली बताने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं।

झूठे वादों पर कब तक भरोसा ?

चुनाव के समय बड़े बड़े वादे तो किये जाते हैं पर चुनाव के बाद ये वादे चुनावी जुमले भर साबित होते हैं। सत्ता में बने रहने के लिए या सत्ता में आने के लिए तमाम वादे राजनीतिक पार्टियां करती हैं लेकिन सत्ता में बाद इस दिशा में कुछ नहीं करती हैं मानो उन्हें जनता से किये गये वादे याद ही न हो।

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ऐसी ही कुछ दास्ताँ है बनारस के बुनकरो की जिनसे वादे तो किये गये लेकिन वो वादा अब लगभग दो साल बाद भी वादा ही है। उन वादों पर कब अमल किया जायेगा अब तक बनारस के बुनकरों का इसका इंतजार है। बनारस प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है।  सनद रहे कि चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो बनारस में बनारसी साड़ियों का बाजार बनायेंगे, बनारस को सूरत की शक्ल देंगे और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बनारस की साड़ियों को पहचान दिलायेंगे। बनारस के बुनकरों ने भाजपा को आशा के साथ वोट दिया। वर्तमान सरकार को सत्ता में आये दो साल होने वाले हैं लेकिन अब तक बनारस के बुनकरों के लिए कुछ किया नहीं गया।

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दलाल तय करते है कीमतें

बनारस में चार लाख से ज्यादा लोग इस व्यवसाय में लगे हुए हैं जिनमें ऐसे बहुत बुनकर हैं जिनका खूद का लूम नहीं है। बिचौलियों के लूम की सहायता से अगर साड़ियाँ तैयार हो जाती हैं तो बिचौलिये तैयार माल को ले जाते हैं। और जिन बुनकरों के पास खूद का लूम है भी तो कोई बाजार नहीं जहाँ बुनकर तैयार माल को सीधे बाजार में बेंच सकें। बाज़ार के ना होने से बिचौलिये जो तैयार माल को ले जाते हैं उसमें बुनकरों के लगे श्रम का ज्यादा हिस्सा उनकी जेब में चला जाता है। पावरलूम से एक साड़ी को तैयार होने में तीन घण्टे लगते हैं।तैयार साड़ी की किमत जो बिचौलियों द्वारा ही तय होती बाजार में उसकी किमत दोगुने से भी ज्यादा रखकर बेची जाती है।

20150719INDIANWEAVERS-slide-FBAY-jumboबनारस के मदनपुरा, रेवड़ी का तालाब, लोहता, बजरडीहा, पीलीकोठी सहित तमाम ऐसे इलाके हैं जहाँ ज्यादातर लोग बुनकरी के व्यवसाय में लगे हैं। इन इलाकों की स्थिति बहुत ही खराब है सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति ठीक नहीं है ताकि बुनकरों का सस्ते में सही इलाज हो सके और उनके बच्चे सस्ती और अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकें। ऐसा देखने में आया है कि दिनभर काम करने से बुनकरों को सांस की दिक्कतें हैं और टीबी होने की भी संभावनाएं हैं क्योंकि धागे के धूल सांस लेने से उनके शरीर के अन्दर चले जाते हैं। सरकार चाहे केन्द्र की रही हो या प्रदेश की बुनकरों के प्रति उनका रवैया एक सा है। इन बुनकरों की याद तब आती है जब पार्टियों को इनका वोट चाहिए होता है।

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महिलाएं, बच्चो सहित पूरा करता है मेहनत

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बनारस के जो पारंपरिक बुनकर हैं जो हैण्डलूम से साड़ियां बुनते हैं उन्हे एक साड़ी बनाने में लगभग दस दिन से पन्द्रह दिन तक का समय लग जाता है वहीं पावरलूम से ये साड़ी कुछ घंटों में ही तैयार की जा सकती है। बता दें कि जो किमत बुनकरों को दी जाती है उसमें उनके श्रम की किमत भी शामिल होती है। इसके अलावा बुनकरों के घरों की औरतें जिनका मुख्य काम धागा बनाना, धागे को रंगना, धागे को अंटों में भरना, कढ़ाई और डिज़ाइनिंग होता है इनके श्रम की कोई वैल्यू नहीं होती। जबकि घरेलू कामकाज के बाद महिलाएं इस काम में सुबह से शाम व्यस्त होती हैं। यहाँ तक कि घर के छोटे- छोटे बच्चे तक इस व्यवसाय में लगे हैं ताकि साड़ियों को जल्दी से जल्दी तैयार किया जा सके। एक तरफ तो वो बुनकर हैं जो हैण्डलूम से साड़ी तैयार करते हैं दूसरी तरफ वो तमाम बड़ी बड़ी पावरलूम की फैक्टरियाँ हैं जहाँ दिनभर में हजारों मीटर कपड़ों की बुनाई होती है ऐसे में इन पारंपरिक हैण्डलूम वाले बुनकर टिक नहीं पा रहे और अपने कामों को छोड़कर वो सूरत को जाने लगे हैं।

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दरअसल जो साड़ियाँ हैण्डलूम से बनती हैं उसके धागे और रेशम अच्छी किस्म और महंगे होते हैं वहीं सूरत में बनी साड़ियाँ जिनका बाजार पर एकाधिकार होता जा रहा है चाइना से आयात किये गये धागे से तैयार होती इसलिए बनारसी साड़ियों की अपेक्षा ज्यादा सस्ती होती हैं। ऐसे में बुनकरों का संकट ये है कि वो करें क्या? सरकार ना तो सस्ते दाम पर इन्हें धागे और रेशम उपलब्ध कराती है और न ही कोई बाजार है जहां वो अपने तैयार माल को बेच सकें। अगर वो पावरलूम भी लगाना चाहें तो काफी महंगा होगा साथ ही साथ बिजली की भी दिक्कत क्योंकि बहुत से बनारस के इलाके ऐसे हैं जहाँ दस घंटे से भी कम बिजली रहती है।

इधर कुछ सालों से बुनकरों के आत्महत्या की भी खबरें आयी हैं अब देखना ये है कि क्या सरकारें इनके लिए कुछ करती हैं या किसानों की तरह छोड़ देती हैं।


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