बचपन से ही मेरी ख्वाहिश थी कि मैं एक ग्लोब खरीदूं लेकिन कभी खरीद नहीं पाया। इसकी वजह है मेरे गांव और उसके नजदीकी कस्बे की दुकानों में मुझे कहीं ग्लोब नहीं मिला। इसलिए मैंने दुनिया का नक्शा खरीद लिया और जब भी वक्त मिलता है इसे गौर से देखता हूं।

अगर बात नक्शे की करूं तो मैं पूरी दुनिया घूम चुका हूं लेकिन असल दुनिया में कभी दिल्ली जाने का भी मौका नहीं मिला। जब मैं नक्शे में किसी देश को देखता हूं तो उसका इतिहास और वहां की मुख्य भाषा का नाम मेरे दिलो-दिमाग पर छा जाता है।

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जब मैं चीन को देखता हूं तो वहां की विशाल दीवार, ध्यान लगाते भिक्षु और तरक्की की बुलंदियां छूता एक प्राचीन देश पाता हूं। यहां की भाषा चीनी लोगों के स्वाभिमान को अभिव्यक्त करती है। दुनिया चाहे इसे कठिन मानती रहे लेकिन चीन इसी भाषा के दम पर लगातार आगे बढ़ रहा है।

भारत में संस्कृत ऐसी भाषा है जिसे मैं बहुत वैज्ञानिक तरीके से बनी हुई मानता हूं। हर अक्षर बहुत तार्किक और वैज्ञानिक ढंग से बना है। इसके लिए हमें प्राचीन त्रषियों का आभारी होना चाहिए। हिंदी को मैं खुले दिल की भाषा मानता हूं जिसने हर भाषा और संस्कृति का स्वागत किया है। इसका किसी से विरोध नहीं है।

अंग्रेजी को आज भी शासक वर्ग की भाषा कहा जाता है मगर मेरी राय इससे अलग है। मैं इसे बहुत खूबसूरत भाषा मानता हूं। इसके अक्षरों की बनावट और लिखने के तरीके इसकी सुंदरता को और निखारते हैं। मैं इस भाषा की दिल से तारीफ करता हूं।

तारीफ तो मैं उर्दू की भी करता हूं। खासतौर से इसकी सुंदरता की। सुंदरता के मुकाबले उर्दू किसी से कम नहीं है, बस आज यह अपने ही घर में पराई हो गई है। इसे लेकर भारत में बहुत भ्रम फैले हुए हैं। उर्दू को बदनाम करने में भारत-पाक विभाजन का बहुत बड़ा हाथ है और बाकी कसर आतंकवाद ने पूरी कर दी।

उर्दू को लेकर यहां बहुत गलतफहमियां हैं, जैसे- यह हिंदुओं की भाषा नहीं है, सिर्फ मुसलमानों को ही इसका उपयोग करना चाहिए क्योंकि यह उन्हीं के लिए बनी है, अगर कोई गैर-मुस्लिम इसका उपयोग करेगा तो वह अपवित्र हो जाएगा, अगर आप उर्दू नहीं पढ़ सकते तो इस भाषा में लिखा कोई पन्ना आपको अल-कायदा की धमकी जैसा लगता है। ऐसी ही अनेक बातें हैं जो उर्दू के बारे में कही और सुनी जाती हैं।

मुझे याद है, जब मैं फरीदाबाद की एक स्कूल का छात्र था तब मैंने उर्दू के कुछ अक्षर सीखे थे। मैं इन्हें एक साथ नहीं सीख पाया और मेरी उर्दू बहुत अच्छी भी नहीं है। मेरे एक दोस्त को उर्दू आती थी और वह मुझे इसके बारे में बताया करता था। उसके बाद मैं राजस्थान आ गया और सीखने का यह सिलसिला कई वर्षों तक बंद रहा।

जब मैंने लाइब्रेरी शुरू की तो कभी-कभी उर्दू की कुछ किताबें आ जाती थीं। मैं उन्हें शौक से पढ़ता था। कुल मिलाकर उर्दू में मेरी प्रगति सिर्फ इतनी हुई कि मैं इसे धीरे-धीरे पढ़ लेता हूं, काफी बातें समझ सकता हूं और कुछ लिख भी सकता हूं। इससे ज्यादा मैं नहीं जानता। अगर आपने स्कूल में उर्दू की पढ़ाई की है तो यकीनन आप मुझसे बेहतर जानते होंगे लेकिन उर्दू को लेकर जो सच्चाई और भ्रम की स्थिति है, उसके बारे में मैं भी कुछ बातें जानता हूं। यकीन कीजिए, उर्दू का किसी भी मजहब से कोई रिश्ता नहीं है। यह भारत की भाषा है। इसे सीखने-पढऩे मात्र से कोई आतंकवादी नहीं बन जाता।

मुझे एक और घटना याद आ रही है। 2013 में गर्मियों की बात है। मैं किसी काम से अजमेरी गेट (जयपुर) गया था। रविवार का दिन था और बसों में बहुत भीड़ नहीं थी। मैं बस के सबसे आखिरी कोने में सीट पर बैठ गया। तभी एक अखबार वाला आया। उसके पास हिंदी, अं्रगेजी के अलावा उर्दू के कुछ अखबार थे।

काफी दिनों बाद मैंने उर्दू का अखबार देखा तो उसकी एक कॉपी खरीद ली। मैं घर जाकर इसे इत्मिनान से पढऩा चाहता था। जब बस एसएमएस हॉस्पिटल पहुंची तो एक महिला जिसकी उम्र करीब 40 साल रही होगी, अपने बेटे के साथ बस में सवार हुईं। उसका बेटा बहुत नटखट था।

वह खिड़की के पास वाली सीट पर बैठने की जिद कर रहा था। वो बचपन ही क्या जिसमें शरारत न हो! मैंने उस बच्चे को बुलाया और उसे अपनी सीट दे दी। उसकी मां ने मुझे धन्यवाद कहा और वह बेटे को गोद में लेकर बैठ गई।

लड़का गोद में बैठने को तैयार नहीं था। यह उसे अपनी आजादी पर पहरा लग रहा था। वह खड़ा होने के लिए मचलने लगा और मेरी तरफ आना चाहता था। तभी उस महिला की नजर उर्दू अखबार पर पड़ी जो मेरे हाथ में था।

उसने सख्ती से अपने बेटे को डांटा और उसे गोद में लेकर बैठ गई। शायद उर्दू का अखबार देखकर मेरे संबंध में उसके विचार बदल गए। कुछ देर पहले तक मैं उसे कोई साधारण इन्सान लग रहा था लेकिन अब वह मुझे शक की निगाहों से देख रही थी।

तभी मेरे पास एक मित्र का फोन आया। उसने मुझे राम-राम कहा, जैसा कि आस्थावान हिंदू एक दूसरे का अभिवादन करने के लिए बोलते हैं। मैंने भी उसका जवाब राम-राम बोलकर दिया। फोन पर बात पूरी होने के बाद उस महिला ने मुझसे पूछा- भैया आप कहां जाएंगे?

मैंने कहा- एनआरआई सर्किल (जयपुर में एक जगह का नाम)।

फिर उसने बातें करते हुए मेरा नाम पूछा। मैंने मेरा नाम बताया- राजीव शर्मा।

उसे आश्चर्य हुआ कि एक हिंदू और वह भी ब्राह्मण उर्दू कैसे पढ़ सकता है! मैंने उसे बताया कि बचपन में थोड़ी-बहुत उर्दू सीखी थी इसलिए कभी-कभार शौकिया तौर पर पढ़ लेता हूं।

मेरा नाम सुनने के बाद उसके मन में छुपा खौफ जाता रहा। उसने अपने बेटे को थोड़ी आजादी दे दी। अब उसे मुझसे कोई खतरा नहीं था। थोड़ी देर बाद उसका स्टॉप आ गया और वह उतर गई। इस घटना को काफी दिन बीत चुके हैं लेकिन मैं इसे भूल नहीं पाया। यहां मेरा इरादा उस महिला को किसी भी तरह से दोषी ठहराने का नहीं है, क्योंकि आज उर्दू की छवि इतनी बिगाड़ दी है कि लोग भ्रम के शिकार हो जाते हैं। आज मैं इन्हीं बातों का जिक्र करूंगा और उम्मीद करूंगा कि जिन लोगों के मन में थोड़ी भी गलतफहमी है, वह दूर हो जाएगी।

– उर्दू मुसलमानों की भाषा नहीं है। दुनिया में ऐसे मुसलमानों की संख्या करोड़ों में है जो उर्दू नहीं जानते और न ही उनके पूर्वजों में किसी को उर्दू का ज्ञान था। वे उर्दू से ठीक उसी तरह अनजान हैं जैसे एस्किमो मानव रेगिस्तान की गर्मी से।

– उर्दू भारत की भाषा है। यहीं यह पैदा हुई और पली-बढ़ी। अंग्रेजों ने यहां आकर अंग्रेजी चलाई और धीरे-धीरे अंग्रेजी मुख्य भाषा बनी। इससे पहले उर्दू आम बोलचाल, व्यापार-कारोबार की भाषा थी। पहले हिंदू और सिक्ख भी उर्दू का उतना ही इस्तेमाल करते थे जितना कि और लोग।

– गुरु नानक देवजी ने जब विद्या अध्ययन शुरू किया तो उन्हें उर्दू के अलिफ (जो आकार में 1 जैसा होता है) अक्षर से दिव्य अनुभूति हुई। अलिफ देखकर नानक देवजी ने कहा था कि ईश्वर एक है।

– आज का पाकिस्तान कभी भारत कहलाता था। वहां हिंदुओं के प्राचीन मंदिर और सिक्खों के गुरुद्वारे हैं। उनमें कई स्थानों पर मंत्र, पवित्र वचन आदि उर्दू में लिखे हुए हैं।

– उर्दू ही वह भाषा है जिसने अंग्रेजों को बुलंद आवाज में ललकारा और इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया। भगत सिंह और अनेक बलिदानी इंकलाब जिंदाबाद कहते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए। अगर उर्दू अपवित्र और बदमाशों की भाषा होती तो वे लोग कम से कम अपनी जिंदगी के आखिरी क्षणों में तो इसका उपयोग नहीं करते। इससे साबित होता है कि उस समय उर्दू का भारतीय जनमानस पर जबर्दस्त प्रभाव था।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस उर्दू के अच्छे जानकार थे। बांग्ला उनकी मातृभाषा थी। वहीं, वे हिंदी, अंग्रेजी के अलावा उर्दू भी बोलते थे। आजाद हिंद फौज का नाम उर्दू से प्रभावित है। उसके नारों और ओजस्वी गीतों में उर्दू के अनेक शब्दों का उपयोग किया गया है। आजादी के आंदोलन में उर्दू का महान योगदान है।

– कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद उर्दू में भी लिखते थे। उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआत उर्दू से हुई। उनके अलावा ऐसे अनेक हिंदू लेखक-शायर हैं जो उर्दू में लिखते हैं।

– कुछ दिनों पहले समाचार पत्रों में एक ऐसी रामायण की चर्चा थी जो उर्दू भाषा में लिखी हुई थी। इसके रचनाकार एक पंडितजी हैं। इससे जाहिर होता है कि उर्दू का हिंदू धर्म से कभी विरोध नहीं रहा। श्रीराम की स्तुति सिर्फ अवधी, हिंदी और संस्कृत में ही नहीं उर्दू में भी हो चुकी है।

– मैं अंग्रेजी का अखबार पढ़ता हूं लेकिन अंग्रेजी ने मुझे आज तक ईसाई नहीं बनाया। दुनिया में करोड़ों लोग हैं जो अंग्रेजी पढ़ते हैं मगर वे ईसाई नहीं हैं। फिर उर्दू किसी को मुसलमान कैसे बना सकती है?

– उर्दू को आतंकवाद से इसलिए जोड़ा जाता है क्योंकि भारत में जिस प्रकार आतंकवाद फैला है, उसका कहीं न कहीं रिश्ता पाकिस्तान से मिल जाता है जहां उर्दू बोली जाती है। मगर यह भी मत भूलिए, कोई व्यक्ति इसलिए आतंकवादी नहीं बनता क्योंकि उसे उर्दू आती है, बल्कि वह इसलिए आतंकवादी बनता है क्योंकि उसकी सोच खराब है।

– भाषा एक जरिया है। यह आप पर निर्भर करता है कि उसका कैसे इस्तेमाल करते हैं। ठीक उसी तरह से, जैसे माचिस एक जरिया है। यह किसी व्यक्ति पर निर्भर करता है कि उसका रसोई में सही इस्तेमाल करे या फिर किसी का घर जलाए। इससे माचिस गुनहगार नहीं हो जाती। आतंकवाद के लिए ऐसे लोग जिम्मेदार हैं जो बुरे इरादे रखते हैं। उन्हें इसकी प्रेरणा उर्दू से नहीं मिलती।

– उर्दू मुख्य रूप से भारत की जबान है। भारत के अलावा यह पाकिस्तान में भी बोली जाती है क्योंकि आज का पाकिस्तान भी कभी भारत हुआ करता था। दूसरी ओर दुनिया में कई इस्लामिक देश हैं लेकिन उर्दू वहां की भाषा नहीं है। वहां उर्दू सिर्फ वे लोग बोलते हैं जो मुख्यत: भारत या पाकिस्तान से नौकरी-रोजगार के लिए जाते हैं। उन देशों के नागरिक न तो उर्दू बोलते हैं और न इसे सीखने में उनकी कोई दिलचस्पी है।

– मैं राजस्थान के हिंदू मारवाड़ी परिवार से हूं। मेरा गांव शेखावाटी में स्थित है। यहां के लोगों की आस्था प्रसिद्ध तीर्थ खाटू श्यामजी से जुड़ी है। मैं भी कई बार वहां गया हूं। मंदिर में लोग जिस किताब से पूजा करते हैं उसका नाम श्याम चालीसा है। यह किताब हिंदी भाषा में है। मैंने श्याम चालीसा का उर्दू में अनुवाद किया है और यह इस किताब का पूरे विश्व में पहला अनुवाद है। पिछली बार जब मेरे परिजन खाटू श्यामजी जा रहे थे तब मैंने इरादा किया कि किताब का उर्दू अनुवाद मंदिर को भेंट करूंगा। मैंने पूरी तैयारी कर ली लेकिन आखिर में इरादा बदल लिया।

कल्पना कीजिए, अगर मैं उर्दू में लिखी वह किताब लेकर मंदिर की लाइन में खड़ा होता और लोगों की नजर उस पर जाती तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होती? पहली ही नजर में वे मुझे कोई शरारती या आतंकवादी समझ लेते जो उर्दू में धमकी भरा पत्र मंदिर में डालने जा रहा है। इस गलतफहमी में पहले तो लोग जमकर ठुकाई करते और बाद में पुलिस के हवाले कर देते। जब तक हकीकत सामने आती, मुझे एक कठोर सबक मिल जाता। यह सोचकर ही मेरी रूह कांप गई इसलिए मैंने भगवान से माफी मांगी और ऐसा न करना ही बेहतर समझा। यह लोगों में उर्दू के प्रति फैली गलतफहमी है।

– 16 दिसंबर 1971 से पहले आज का बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान था। उसकी मुख्य भाषा बांग्ला थी। पाकिस्तानी शासकों ने वहां जबर्दस्ती उर्दू लागू की और उस फैसले का विरोध हुआ। दोनों इलाकों का धर्म एक था। ढाका का मुसलमान बांग्ला चाहता था और इस्लामाबाद में बैठे शासक इसके लिए तैयार नहीं थे। नतीजा यह हुआ कि पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष बढ़ा और जल्द ही वे अलग हो गए। अगर उर्दू मुसलमानों की ही भाषा होती तो पूर्वी पाकिस्तान में इसका विरोध नहीं होता।

– उर्दू का गुनाह सिर्फ इतना है कि 1947 में भारत का विभाजन हुआ और जो लोग यहां से पाकिस्तान गए उनमें से कई उर्दू जानते थे, उन्होंने उर्दू नहीं छोड़ी। इधर भारत की हिंदू बिरादरी में इसका संदेश उलटा गया। इसका खामियाजा उर्दू को भुगतना पड़ा और लोगों के मन में यह भ्रम मजबूती से जड़ जमाकर बैठ गया कि यह सिर्फ उन लोगों की भाषा है जिन्होंने देश के टुकड़े किए, इसलिए हमें उर्दू से दूर ही रहना चाहिए। यह गलतफहमी आज तक बरकरार है। जबकि हकीकत इससे अलग है।

– पाकिस्तान में सिर्फ उर्दू ही नहीं बोली जाती। वहां पंजाबी, सिंधी बोलने वाले भी काफी लोग हैं। उर्दू तो मुख्य रूप से हिंदुस्तान की भाषा है और हमें इस पर गर्व होना चाहिए। इसको लेकर फैले भ्रम और षड्यंत्र का पर्दाफाश होना चाहिए क्योंकि उर्दू का किसी भी धर्म और आतंकवाद से कोई रिश्ता नहीं है। बस, घर बंटने से यह अपने ही घर में अनजान बन गई … मुल्क बंटने से कुछ लोगों के लिए यह मुसलमान हो गई। चाहे आप उर्दू सीखें या न सीखें, पढ़ें या न पढ़ें, मगर कम से कम इसे किसी मजहब और दहशत की जबान न समझें। – राजीव शर्मा, कोलसिया –


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