हाईकमान कल्चर अथवा व्यक्तिगत नेतृत्व पर आधारित राजनैतक दलों में प्राय: यह देखा गया है कि पार्टी प्रमुखों को शिक्षित, ज्ञानवान, विचारवान अथवा व्यापक जनाधार रखने वाले लोगों के बजाए अपने इर्द-गिर्द ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो भले ही उपरोक्त विशेषताएं रखते हों अथवा नहीं परंतु उनमें वफादारी के लक्षण अवश्य पाए जाने चाहिए। ऐसे ‘वफादार’ लोगों के सहारे भले ही कोई नेता विशेष अपनी नेतृत्व क्षमता के बल पर संगठन अथवा पार्टी की नैय्या कुछ समय तक जरूर खे लेता हो परंतु कालांतर में ऐसी राजनैतिक नावें डूबती हुई भी देखी गई हैं। इसका एकमात्र कारण यही रहा है कि पार्टी व्यक्ति आधारित संगठन बन गया और संकट के समय ‘हाईकमान’ की ‘वफादार’ सेना पार्टी को संकट से उबार नहीं सकी। दूसरी ओर ऐसे ही संकटकालीन समय में पार्टी ने शिक्षित,ज्ञानवान,विचारवान अथवा अपना व्यापक जनाधार रखने वाले नेताओं का अभाव महसूस किया। राष्ट्रीय स्तर पर संचालित होने वाली कांग्रेस पार्टी के अतिरिक्त विभिन्न राज्यों के कई क्षेत्रीय पार्टियों का लगभग ऐसा ही हाल हो चुका है और हो रहा है।
लगभग तीन वर्ष पूर्व भ्रष्टाचार व बदनाम राजनैतिक व्यवस्था से दु:खी देश की जनता ने आम आदमी पार्टी के उदय के बाद यह सोच कर कुछ राहत की सांस ली थी कि संभवत: देश को अब एक ऐसा राजनैतिक विकल्प मिल सकेगा जो न केवल भ्रष्टाचार से मुक्त राजनैतिक व्यवस्था से देश के लोगों को रूबरू कराएगा बल्कि यह एक ऐसा संगठन भी होगा जिसमें शिक्षित,ज्ञानवान तथा विचारवान व भ्रष्टाचार से नफरत करने वाले व व्यक्तिवादी राजनीति का समर्थन न करने वाले नेताओं की पार्टी होगी। परंतु लगता है कि जिस प्रकार रिकॉर्ड समय सीमा के भीतर आम आदमी पार्टी अपने गठन के कुछ ही महीनों के भीतर दिल्ली में पहली बार 2013 में सत्ता में आई उसी प्रकार यही पार्टी रिकॉर्ड समय सीमा के भीतर बड़े पैमाने पर विघटन अथवा विभाजन का सामना भी करने लगी है। इसी वर्ष फरवरी में दिल्ली की सत्ता पर ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाली ‘आप’ के नेता तथा पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल का एक तानाशाही चेहरा जनता देख रही है। कारण भले ही ‘अनुशासनात्मक’ बताए जा रहे हों परंतु इसके बावजूद पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं लोकप्रिय नेता योगेंद्र यादव,प्रशांत भूषण,प्रो. आनंद कुमार तथा अजीत झा आदि को पार्टी से निष्कासित किए जाने का घटनाक्रम आम आदमी पार्टी के समर्थकों के गले नहीं उतर पा रहा है। यदि अरविंद केजरीवाल इस गलतफही का शिकार हों कि वे अपनी तानाशाही या अपने अकेले नेतृत्व के दम पर अपने कुछ गिने-चुने ‘वफादार’ साथियों को साथ लेकर देश को भ्रष्टाचार मुक्त करा सकेंगे तो यह उनकी एक बड़ी भूल हो सकती है। उन्हें निश्चित रूप से योगेंद्र यादव व प्रशांत भूषण, प्रो. आनंद कुमार जैसे और भी देश के अनेक ऐसे समर्पित साथियों की जरूरत पड़ेगी जो उनके भ्रष्टाचार मुक्त भारत के सपने को साकार करने में कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ दे सकें? परंतु जिस अंदाज से पार्टी के स्तंभ समझे जाने वाले तथा पार्टी का गठन करने वाले उपरोक्त प्रमुख नेताओं को अरविंद केजरीवाल की ‘वफादार’ चौकड़ी ने अनुशासनात्मक कार्रवाई के नाम पर बाहर का रास्ता दिखाया है उसे किसी भी प्रकार से अरविंद केजरीवाल के राजनैतिक कौशल अथवा उनकी सफल व सकारात्मक राजनैतिक शैली के रूप में नहीं देखा जा सकता। बल्कि इसे केजरीवाल की इस तानाशाही शैली के विरुद्ध उनके शुभचिंतकों की कड़ी प्रतिक्रिया ही समझी जाएगी कि मेधा पाटकर जैसे कई मजबूत व प्रतिष्ठित लोग यो्रगेंद्र यादव व उनके तीन साथियों के विरुद्ध हुई ‘अनुशासनात्क’ कार्रवाई के विरुद्ध रोष स्वरूप पार्टी छोडकर चले गए।
लगता है केजरीवाल व उनकी ‘वफादार चौकड़ी’ का गुस्सा अभी थमा नहीं है। पिछले दिनों एक बार फिर पार्टी द्वारा संसदीय दल के नेता व पटियाला से लोकसभा सदस्य धर्मवीर गांधी को भी संसदीय दल के नेता के पद से अकारण ही हटा दिया गया। उनकी जगह पर पंजाब के ही संगरूर से सांसद एक अन्य पार्टी नेता भगवंत मान को उनके स्थान पर संसदीय दल का नेता नियुक्त कर दिया गया। इस परिवर्तन में भी जहां भगवंत मान अरविंद केजरीवाल के वफादार नेताओं में अपना स्थान बना चुके हैं तथा ‘आप’ से निष्कासित किए जाने वाले योगेंद्र यादव,प्रशांत भूषण,आनंद कुमार तथा अजीत झा के निष्कासन के प्रबल समर्थक रहे हैं वहीं संसदीय दल के नेता के पद से हटाए जाने वाले धर्मवीर गांधी का कुसूर भी केवल यही है कि उन्होंने उपरोक्त नेताओं के विरुद्ध होने वाली अनुशासनात्मक कार्रवाई के विरुद्ध अपना मत व्यक्त किया था। उन्होंने आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की 28 मार्च को हुई बैठक से भी बाहर जाने का निर्णय लिया था। उन्होंने उन चारों नेताओं द्वारा 14 अप्रैल को गुडगांव में बुलाए गए स्वराज संवाद में भी अपना शुभकामना संदेश प्रेषित किया था। गांधी को उनके इसी कुसृर की सजा देते हुए ‘हाईकमान’ ने उन्हें संसदीय दल के नेता जैसे प्रमुख पद से हटाते हुए भगवंत मान को उनके स्थान पर नया नेता बना दिया। क्योंकि बहरहाल ‘वफादारी’ का इनाम हमारे देश के आलाकमान कल्चर वाले नेतागण अपने वफादार साथियों को पहले भी देते आए हैं।
कहने को तो कुछ राजनैतिविशेषकों द्वारा अभी से यह कहा जाने लगा है कि पार्टी में चल रही इस प्रकार की उठापटक के पीछे एकमात्र कारण यही है कि अरविंद केजरीवाल योगेंद्र यादव से भविष्य में अपने लिए एक बड़ा खतरा महसूस कर रहे है। उन्हें इस बात का संदेह है कि यदि समय आने पर आम आदमी पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नेता के नाम को आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस होती है तो लोकप्रियता,योग्यता तथा वाकपटुता के क्षेत्र में योगेंद्र यादव उनसे बाजी मार सकते हैं। इसीलिए केजरीवाल की चौकड़ी द्वारा पार्टी में योगेंद्र यादव जैसे पौधे को सींचने के बजाए समय पूर्व ही उसे उखाड़ फेंकना मुनासिब समझा गया। यदि विशख्ेषकों की यह बात सही है तो यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि अरविंद केजरीवाल को आप समर्थकों ने तथा देश के करोड़ों भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति के चाहने वालों ने जैसा समर्पित, ईमानदार व किसी पद की लालसा न रखने वाला नेता समझा था, केजरीवाल संभवत: स्वयं को वैसा नेता साबित नहीं कर सके। हालांकि गत वर्ष फरवरी में अपनी 49 दिन की सरकार को त्याग कर उन्होंने देश के लोगों को यह संदेश देने का प्रयास किया था कि वे पद के लालची नहीं हैं। हालांकि उन दिनों भी केजरीवाल पर उनके विरोधी व आलोचक यह कहकर निशाना साध रहे थे कि केजरीवाल ने वाराणसी से नरेंद्र मोदी के विरुद्ध केवल इसीलिए ताल ठोकी कि वे देश के प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश करना चाह रहे हैं। परंतु इन दिनों जिस प्रकार से आम आदमी पार्टी अनुशासनात्मक कार्रवाई नामक झाड़ू से पार्टी के भीतर ही कथित सफाई अभियान छेड़ बैठी है उससे देश के लोगों में पार्टी के प्रति सकारात्मक संदेश बिल्कुल नहीं जा रहा है। बल्कि आप समर्थकों को मायूसी ही हाथ लग रही है। केजरीवाल को चाहिए कि वे पार्टी में अपनी हिटलर शाही वाली छवि बनाने से बाज आएं। तथा पार्टी में अपने आलोचकों को भी पूरा मान-सम्मान व स्थान दें। उनका बडकपन भी इसी में है कि वे अपने साथियों के साथ भरोसे का वातावरण विकसित करें तथा अपने सभी साथी नेताओं के दिलों में विश्वास पैदा करें। एक के बाद एक इसी प्रकार पार्टी के नेताओं द्वारा केजरीवाल से अपना मोहभंग करना अपने-आप में स्वयं इस बात का सुबूत है कि केजरीवाल भी आिखरकार उन्हीं पारंपरिक राजनैतिक दलों अथवा हाईकमान कल्चर को प्रोत्साहित करने वाले नेताओं की ही तरह ही प्रतीत हो रहे हैं। क्योंकि आप को भी समझदार नहीं बल्कि वफादार चाहिए।

निर्मल रानी


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