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1958 में बेल्जियम में एक इन्सानी चिडिया घर था, जहाँ अपने से तहज़ीब याफ़ता किसी को न समझने वाले गोरे बेचारे स्याह फ़ाम बच्चों और बड़ों को इस तरह खाना देते थे जैसे जानवरों को दिया जाता है…।

अब आप एक बात बताएं… इस्लाम ने तो चौदह सौ चालीस साल पहले ही स्याह फ़ामों को गले से लगा लिया था लेकिन ऐसा क्या हुआ जो अपने आपको तहज़ीब याफ़ता मज़ाहब मानने वालों को इन्सान बनने में इतना वक़्त लग गया… कमाल हो गया ना..? अब हमें भी यकीन हो चला है कि बंदर से इन्सान बनने वाला फार्मूला कहाँ से और कैसे चलाया गया है…।

जिससे इस्लाम को कोई सरोकार ही नहीं है, इस्लाम का वो चेहरा दुनिया के सामने बनाने वालों! मैं दावे से कहता हूँ जिस दिन इस्लाम को समझ जाओगे उस दिन “ला ईलाहा इल्लल्लाह मुहम्मादुर्र रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वआलेही वसल्लम” का हक़ बयान करते हुए नज़र आओगे, इन्शाअल्लाह…।

चलो तुम्हें चौदह सौ चालीस साल पहले का एक वाक़िया बता देता हूँ, जिससे ये जानने में आसानी हो जाएगी कि इस्लाम का दर्स क्या है स्याह फ़ामों के लिए भी…।

ऐलान नबुव्वत (ज़ाहिरी तौर) के चंद रोज़ बाद आप हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम एक रात मक्का की एक गली से गुज़र रहे थे कि उन्हें एक घर में से किसी के रोने की आवाज़ आई…।

आवाज़ में इतना दर्द था कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम बेइख़्तयार उस घर में दाख़िल हो गए… देखा तो एक नौजवान जो कि बहोत स्याह और देखने में हब्शा का मालूम होता है, चक्की पीस रहा है और ज़ारो क़तार रो रहा है…। आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम ने उससे रोने की वजह पूछी तो उसने बताया कि मैं एक ग़ुलाम हूँ… सारा दिन अपने मालिक की बकरियाँ चराता हूँ, शाम को थक कर जब घर आता हूँ तो मेरा मालिक मुझे गंदुम (अनाज) की एक बोरी पीसने के लिए दे देता है जिसको पीसने में सारी रात लग जाती है…। मैं अपनी क़िस्मत पर रो रहा हूँ कि मेरी भी क्या क़िस्मत है मैं भी तो एक गोश्त पोस्त का इंसान हूँ…।

मेरा जिस्म भी आराम मांगता है… मुझे भी नींद सताती है लेकिन मेरे मालिक को मुझ पर ज़रा भी तरस नहीं आता…। क्या मेरे मुक़द्दर में सारी उम्र इसी तरह रो-रो के ज़िंदगी गुज़ारना लिखा है..? आप रहमत-ए-आलम नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम ने फ़रमाया कि मैं तुम्हारे मालिक से कह कर तुम्हारी मशक़्क़त तो कम नहीं करवा सकता क्योंकि वो मेरी बात नहीं मानेगा… हाँ मैं तुम्हारी थोड़ी मदद कर सकता हूँ कि तुम सो जाओ और मैं तुम्हारी जगह पर चक्की पीसता हूँ…। वो ग़ुलाम बहुत ख़ुश हुआ और शुक्रिया अदा करके सो गया… और आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम उसकी जगह चक्की पीसते रहे… जब गंदुम (अनाज) ख़त्म हो गई तो आप उसे जगाए बग़ैर वापस तशरीफ़ ले आए…।

दूसरे दिन फिर आप वहां तशरीफ़ ले गए और उस ग़ुलाम को सुला कर उसकी जगह चक्की पीसते रहे…। तीसरे दिन भी यही माजरा हुआ कि आप उस ग़ुलाम की जगह सारी रात चक्की पीसते और सुबह को ख़ामोशी से अपने घर तशरीफ़ ले आए…। चौथी रात जब आप वहाँ गए तो उस ग़ुलाम ने कहा…

ऐ अल्लाह के बंदे! आप कौन हो…? और मेरा इतना ख़्याल क्यों कर रहे हो…? हम गुलामों से न किसी को कोई डर होता है और न कोई फ़ायदा… तो फिर आप ये सब कुछ किस लिए कर रहे हो…? आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम ने फ़रमाया कि मैं ये सब इंसानी हमदर्दी के तहत कर रहा हूँ इस के इलावा मुझे तुम से कोई ग़रज़ नहीं…। उस ग़ुलाम ने कहा कि आप कौन हो…? आप नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम ने फ़रमाया… क्या तुम्हें इल्म है कि मक्का में एक शख़्स ने नुबुव्वत का दावा किया है..? उस ग़ुलाम ने कहा हाँ मैंने सुना है कि एक शख़्स जिस का नाम मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम) है अपने आप को अल्लाह का नबी कहता है…। आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम ने फ़रमाया कि…

मैं वही मुहम्मद हूँ…। ये सुन कर उस ग़ुलाम ने कहा कि अगर आप ही वो नबी हैं तो मुझे अपना कलिमा पढ़ाईए क्योंकि इतना शफ़ीक़ और मेहरबान कोई नबी ही हो सकता है, जो गुलामों का भी इस क़दर ख़्याल रखे…। आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम ने उन्हें कलिमा पढ़ा कर मुसलमान कर दिया…।

फिर सारी दुनिया ने देखा कि उस ग़ुलाम ने तकलीफ़ें और मशक़्क़तें बर्दाश्त की लेकिन दामन-ए-मुस्तफा न छोड़ा…। उन्हें जान देना तो गवारा था लेकिन इतने शफ़ीक़ और मेहरबान नबी का साथ छोड़ना गवारा न था…। आज सारी दुनिया उन्हें हज़रत बिलाल-ए-हब्शी रज़िअल्लाहु तआला अन्हु के नाम से जानती है…। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हमदर्दी और मुहब्बत ने उन्हें आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का बे लौस ग़ुलाम बना कर रहती दुनिया तक मिसाल बना दिया…।

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लेखक: तनवीर त्यागी

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