मार्क जुकरबर्ग जी,
चेयरमैन तथा सीईओ, फेसबुक।

विषय- फेसबुक इंडिया के एक पक्षीय रवैये के सन्दर्भ में।

आदरणीय सर,

भारत के प्रसिद्ध शायर अकबर इलाहाबादी कहते हैं-

“खींचो न कमानों को न तलवार निकालो,
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो !”

सर, दरअसल अकबर इलाहाबादी का इशारा बेबाक़ आवाज को बुलंद करने की तरफ है। एक तरफ हुकूमत अगर बंदूक लेकर खड़ी हो, तोप लेकर खड़ी हो तो हमें तीर तलवार न उठाकर बल्कि अखबार निकालने पर जोर देना चाहिए। अखबार यानि की पत्रकारिता। समय बदलने के साथ साथ  पत्रकारिता की प्रकृति भी बदल गई है। आज की पत्रकारिता सत्ता पक्ष या विपक्ष की पत्रकारिता बनकर रह गई है। कितने अफसोस की बात है कि आज पत्रकारिता में भी पक्ष या विपक्ष देखने को मिल रहा है जबकि पत्रकारिता का मतलब निष्पक्षता होता है। पक्ष की पत्रकारिता मजबूत होती है क्योंकि उसे सत्ता का समर्थन मिला होता है। इसलिए वह विपक्ष की पत्रकारिता पर या विपक्ष की आवाज पर हावी होने की जुर्रत करती रहती है। मगर विपक्ष की पत्रकारिता में निष्पक्षता का अंश दिखाई देता है क्योंकि वह पूजीपतियों और हुक्मरानों के हाथों बिकती नहीं है। यही वजह है कि उसे सरकारी पाबंदियों का दंश चलना पड़ता है।

आज कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। भारत की बहुसंख्य आबादी जो कि मज़दूर, उपेक्षित, वंचित, पिछड़ा तथा अल्पसंख्यक समुदाय से मिलकर बनती है। इस बहुजन आबादी ने मुख्यधारा कि मीडिया द्वारा अपनी उपेक्षा किया जाता देख खुद पत्रकारिता में प्रवेश लेना उचित समझा क्योंकि मुख्यधारा के मीडिया में बहुजनों का प्रवेश अघोषित वंचित है। बहुजनों का पत्रकारिता में इंट्री करना  जायज भी है क्योंकि मेरा मानना है कि जिस समाज की अपनी मीडिया नहीं होती है वह समाज बेजुबान हो जाता है। वैचारिक मतभेद होना जायज है लेकिन यह तभी संभव है जब आप अपना मत रखेंगे। जब मुख्यधारा की मीडिया आपको अपना मत रखने का अवसर ही नहीं देगी तो फिर हमें अपना मंच बनाने में संकोच नहीं करना चाहिए।

आदरणीय सर, आज वेब पत्रकारिता को आम अवाम एक मजबूत हथियार की तरह देखता है क्योंकि एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया की शुरुआत करने के लिए लाखों-करोड़ों रुपए संपत्ति की जरूरत होती है। आम अवाम तो यह सोच भी नहीं सकता है। लिहाज़ा उसके पास वेब पत्रकारिता यानि कि डिजिटल पत्रकारिता में एक उम्मीद दिखाई देती है।  लेकिन कब तक? क्या यहां उम्मीद टूटने का खतरा नहीं है? बिल्कुल है क्योंकि वेब पत्रकारिता के लोकप्रियता की भविष्य सोशल मीडिया पर टिकी हुई है। सोशल मीडिया की लिस्ट में Facebook की पहुंच शीर्ष पर है।  इसीलिए जातिवादी मानसिकता से भरे हुए Facebook India के अधिकारियों ने निष्पक्ष पत्रकारिता की आवाज को दबाने की अपनी नाकाम कोशिश करना शुरू कर दिए हैं। पहले नेशनल जनमत, फिर नेशनल दस्तक, कोहराम न्यूज़, वरिष्ठ पत्रकार दिलीप सी मंडल, फिर मैं सूरज कुमार बौद्ध और अब The Resistance News…….. श्रृंखला जारी है।

सर, स्वतंत्र पत्रकारिता पर पाबन्दी क्यों? सहमति-असहमति होना हमारे जिंदा होने का प्रमाण है। सहमति-असहमति के इस जीवंत जरूरत को जिंदा रखने के उद्देश्य को लेकर कोहराम न्यूज़ जैसे चैनलों की स्थापना होती है लेकिन हुकूमत को निष्पक्षता पसंद कहां। कोहराम न्यूज़ को भी फेसबुक के पाबन्दी का सामना करना पड़ा है। कोहराम न्यूज़ का कहना है कि “06 जुलाई से लगभग 15 दिन के लिए कोहराम न्यूज़ को बिना किसी पूर्व चेतावनी तथा बिना कोई कारण बताए पेज लिंक शेयरिंग से प्रतिबंधित कर दिया गया था।” The Resistance News अभी भी प्रतिबन्ध झेल रहा है।

सर, आखिर Facebook India इस तरह की निरंकुशता भरी कदम क्यों उठा रहा है। फेसबुक इंडिया को यह बात समझनी चाहिए कि हमसे ही है रोशन जहां तुम्हारा। जिस दिन हम बहुजनों तथा प्रगतशील सोच वालों ने Facebook चलाना छोड़ दिया उस दिन Facebook टीम इंडिया छोड़ने पर मजबूर हो जाएगा। इसलिए फेसबुक को यह लुकाछिपी का खेल खेलना बंद करके फेसबुक पर बंदिश लगाने की वजह बतानी चाहिए। अन्यथा फेसबुक को किसी की आवाज़ रोकने का कोई हक नहीं है।
सधन्यवाद!

आपका सुभचिंतक
सूरज कुमार बौद्ध


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