महाराष्ट्र में एक विधायक को इसलिए निलंबित कर दिया गया क्योंकि उनका कहना था कि वह ‘भारत माता की जय’ के बजाय ‘जय हिंद’ कहना पसंद करेंगे. दोनों में क्या फ़र्क़ है, मुझे वास्तव में नहीं पता, पर उन्हें दी गई सज़ा पर सवाल उठते हैं.

19 मार्च को एक ख़बर आई कि उर्दू लेखकों को इसकी गारंटी देने को कहा गया कि वे भारत विरोधी सामग्री नहीं लिख रहे हैं. स्मृति ईरानी के विभाग वाली राष्ट्रीय उर्दू भाषा प्रोत्साहन परिषद उर्दू लेखकों से कह रही है कि वे हलफ़नामा दें, जिसका मज़मून कुछ इस तरह है.

“मैं_ पुत्र/पुत्री_ पुष्टि करता/करती हूँ कि मेरी किताब/पत्रिका शीर्षक_ जिसे राष्ट्रीय उर्दू भाषा प्रोत्साहन परिषद की वित्तीय सहायता योजना के तहत बड़ी ख़रीद की मंज़ूरी मिली है, में भारत सरकार की नीतियों या राष्ट्रहित के विरुद्ध कुछ नहीं छपा है, देश की विभिन्न समुदायों के बीच असंगति की वजह बनने की सामग्री नहीं है और किसी सरकार या ग़ैरसरकारी संस्था से वित्तीय सहायता प्राप्त नहीं है.”

यह ख़बर अंग्रेज़ी समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस में छपी. हममें से जो ये उम्मीद कर रहे थे कि राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रविरोध की जो फ़र्ज़ी और गढ़ी गई बहस जल्द ख़त्म हो जाएगी, उन्हें निराशा होगी.

लगता है कि यह सरकार मेक इन इंडिया के नाम पर जो करना चाहती है, वो है असंगति और चिंता. मैं अन्य चीज़ों के बारे में लिखना चाहता हूँ- अभी विश्व कप क्रिकेट चल रहा है- लेकिन हमें रोज़ मध्यकाल की इस लड़ाई में खींच लिया जाता है.

हमारे हिंदुत्व राष्ट्रवादी जिस राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित कर रहे हैं, वह अलग क़िस्म का है. यह यूरोप वाला राष्ट्रवाद नहीं है, जिसे एक देश की दूसरे देश के प्रति भावना के रूप में परिभाषित किया जाता है.

पहला विश्वयुद्ध इसलिए हुआ था क्योंकि सर्बिया के लोगों से ऑस्ट्रियाई मूल के हंगरीवासी नफ़रत करते थे. हंगरीवासियों से रूसी, रूसियों से जर्मन और जर्मनों से फ्रांसीसी नफ़रत करते थे. मुझे अभी याद नहीं आ रहा कि इटली इस जंग में क्यों कूदा, पर यह सच है कि अंग्रेज़ हर किसी से नफ़रत करते थे.

जब चिंगारी उठी, तो हर कोई एक दूसरे पर टूट पड़ा. इसमें और देश भी कूद पड़े, जैसे तुर्क, अरब, भारत और अमरीका भी.

उनके देशों ने ख़ुद को इस तरह नुक़सान पहुँचाया क्योंकि उनकी दो जंगों ने यूरोप की प्रांतीयता ख़त्म कर दी. बाद में उनके जोश ने इसे यूरोपीय यूनियन में बदला. यह यूनियन दरअसल उन लोगों का समूह है जो अराष्ट्रीयकरण और अपनी सीमाएं और बाज़ार एक-दूसरे के लिए खोलना चाहते थे.

दूसरी तरफ़, आज के भारत में, हमारा राष्ट्रवाद दूसरे देश के ख़िलाफ़ नहीं है. ये दूसरे भारतीयों के ख़िलाफ़ है, इसीलिए यह अलग है. हमारे महान राष्ट्रभक्त अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ उन्माद दिखा रहे हैं, किसी दूसरे देश के ख़िलाफ़ नहीं.

हमारे फ़र्ज़ी राष्ट्रवादी उनके मज़हब या उनके विचारों के कारण अपने ही नागरिकों के पीछे पड़े हैं. उनकी चिंता और उनका उन्माद ही उनका असली दुश्मन है. ये देश के लिए प्यार नहीं या किसी और चीज़ के लिए प्यार नहीं है. यह नफ़रत और कड़वाहट है.

भारतीय मुसलमानों और दलितों का उत्पीड़न राष्ट्रवाद नहीं है. आरोप लगाते हुए हम राष्ट्रविरोधी शब्द का इस्तेमाल कर लेते हैं, जिस शब्द को अब यूरोपीय भाषाओं में इस्तेमाल नहीं किया जाता है. केवल भारतीय जैसे आदिम लोग ही इसका इस्तेमाल करते हैं.

इसका मतलब हुआ कि उस चीज़ का विरोध जिसके लिए पूरा देश खड़ा हुआ हो. लेकिन कौन तय करेगा कि सकारात्मक राष्ट्रवाद क्या है? ‘भारत माता की जय’ के अलावा मैं नहीं जानता कि भारतीय राष्ट्रवाद क्या है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने राष्ट्रवाद पर ओपन लेक्चर्स की एक सिरीज़ की है. यह एक वीडियो के सेट में उपलब्ध है. यह अच्छा प्रयास है, पर मुझे डर है कि इसका ख़ास लाभ नहीं होगा. इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप कितना ख़राब व्यवहार करते हैं.

आप जब तक ज़ोर से भारत माता की जय बोलते रहेंगे, भारत में राष्ट्रवादी बने रहेंगे.

अख़बारों में एक और ख़बर दो मुसलमानों को लेकर है, इनमें से एक 15 साल का लड़का है, जिसे मारकर पेड़ से लटका दिया गया. वे भैसों को ले जा रहे थे, इसलिए यह साफ़ नहीं कि उनका क़सूर क्या था. लेकिन इतना तय है कि नफ़रत कहां है. क्या इससे सरकार को कोई फ़र्क़ पड़ने वाला है? बिलकुल नहीं.

भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो रही है और इसमें एक बार फिर राष्ट्रवाद की बात हो रही है. क्या इस पर पहले ही बहुत कुछ नहीं हो गया है? क्या भाजपा के लोग जानते-बूझते ये फ़ैसला कर रहे हैं कि इसका सभ्य समाज में भारत की छवि पर क्या असर पड़ रहा है?

कोई भी विदेशी अख़बार या पत्रिका उठा लीजिए, भारत के बारे में ज़्यादातर ख़बरें नकारात्मक होती हैं. क्यों? क्योंकि अब इस तरह की घटनाएं नियमित तौर पर हो रही हैं और इस संदेह से बचकर भागना मुश्किल है कि ये चीज़ें जानबूझकर की जी रही हैं. अच्छे दिन आ गए हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)


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