अफ़रोज़ आलम साहिल, TwoCircles.net

पटना:महागठबंधन की जीत में अल्पसंख्यकों का एक रोल रहा है. नतीजों के बाद इस बात की पूरी उम्मीद थी कि मुसलमानों को उनके योगदान के अनुपात में हिस्सेदारी ज़रूर मिलेगी. मगर 28 मंत्रियों के मंत्रिमंडल में सिर्फ़ 4 मुसलमानों को ही हिस्सेदार बनाया गया. इससे एक बार फिर से क़ौम की बेहतरी की उम्मीद कर रहे लोगों में भारी निराशा हुई है.

यह निराशा मुस्लिम नौजवानों में खासतौर पर देखने को मिल रही है. मुसलमानों के साथ होने वाली इस नाइंसाफ़ी पर अब खुलकर सोशल मीडिया पर भी मुस्लिम नौजवान लिख रहे हैं.

मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईसेंस में पढ़ने वाले पूर्वी चम्पारण के तारिक़ अनवर चम्पारणी सोशल मीडिया पर लिखते हैं ‘मुसलमानों ने महागठबंधन को वोट भाजपा को हराने और खेत में गन्ना रोपने या काटने के लिये दिया था, सत्ता मे भागीदारी के लिए नहीं. बिहार का दुर्भाग्य अनपढ़ नहीं बल्कि जाहिल उप-मुख्यमंत्री.’

वहीं बसीरत मीडिया ग्रुप के फीचर एडीटर मो. शारिब ज़ेया रहमानी एक लंबे लेख में लिखते हैं ‘…इस पर कोई ऐतराज नहीं कि पूरे कैबिनेट में 7 के बजाए 20 यादव को मंत्री बना दिया जाए. ऐतराज बस इस पर है कि जिस तरह टिकट के तक़्सीम में नाइंसाफ़ी की गई, यहां भी डंडी मार दी गई. नीतिश कैबिनेट में यादव सात और मुसलमान चार, ये क्या तनासब है. जबकि मुसलमानों ने सबसे ज़्यादा तक़रीबन 90 फ़ीसद वोट महागठबंधन को दिया है.’

आगे उन्होंने यह भी लिखा है कि ‘मुसलमानों में ये अहलियत कहां कि वो डिप्टी सीएम बनाए जाएं. ये सारी सलाहियतें तो बिहार व यूपी में सिर्फ़ यादवों के अंदर हैं और क़ौमी सतह पर ब्राहमणों में. मुसलमानों का काम तो सिर्फ़ वोट देना है. सत्ता चलाना इनके बस का रोग नहीं. एम.वाई समीकरण का मतलब ये हरगिज़ न समझा जाए कि सत्ता में भी हिस्सेदारी मिलेगी.’

हालांकि वे आगे ये भी लिखते हैं कि ‘महागठबंधन को यह मालूम है कि मुसलमानों उन्हें डरकर वोट दिया है. मुसलमानों ने महागठबंधन को वोट देकर कोई अहसान नहीं किया है, बल्कि उनकी ये मजबूरी थी. ऐसे में अगर एक मंत्रालय भी उन्हें नहीं मिलता तो भी मुसलमानों को कोई शिकायत का हक़ नहीं था.’

मुस्लिम तरक़्क़ी मंच के सफ़दर अली का भी कहना है, ‘मुसलमानों ने इस बार महागठबंधन को वोट दिया है. लेकिन सच तो यह है कि इन्हीं सेकूलर जमाअतों ने मुसलमानों को सत्ता में हिस्सेदारी देने में हमेशा नाइंसाफ़ी किया है. पहले तो टिकट देने में कंजूसी गई और अब मंत्रिमंडल की लिस्ट देखकर भी मुसलमान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है.’


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इधर ओवैसी की पार्टी ‘ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन’ से जुड़े कार्यकर्ता भी सोशल मीडिया पर चुटकी लेते नज़र आ रहे हैं. कई तरह के पोस्टरों के ज़रिए मुसलमानों की हिस्सेदारी को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.

दरअसल, मुसलमानों की हमेशा से शिकायत रही है कि उन्हें सिर्फ़ एक वोटबैंक की तरह इस्तेमाल किया जाता है. चुनाव जीतने के बाद उनकी बुनियादी दिक़्क़तों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता. ऐसे में जब सत्ता के गलियारों में उनका ही न के बराबर होगा तो उनकी आवाज़ को सुने जाने की संभावना और भी कम होगी. बिहार के मुसलमानों की सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि उनके योगदान से चुने गए नेता उनकी तरक़्क़ी के बारे में कभी नहीं सोचते.

हालांकि एक तबक़ा ऐसा भी है कि जो पूरे मसले को हिन्दू-मुस्लिम से उपर उठकर एक अलग नज़रिए से देखता है. उसका सोचना है कि हिस्सेदारी मांगने के बजाए पहले सही नागरिक बनने के दिशा में मुसलमानों को सोचना चाहिए. अभी तो हालत ऐसी है कि मुसलमान इस अपने ही देश में नागरिक के बजाए दूसरे दर्जे के नागरिक ही ज़्यादा नज़र आते हैं.

राजनीतिक मामलों के जानकार अरशद अजमल का मानना है, ‘जिसकी जितनी आबादी है, उसे उतनी नुमाइंदगी मिलनी चाहिए. लेकिन मिलती नहीं है और शायद मुमकिन भी नहीं है. बिहार में मुस्लिम मत 17 फीसदी है. लेकिन महागठबंधन ने सिर्फ़ 14 फीसदी मुसलमानों को ही टिकट दिया और मंत्रिमंडल में भी लगभग 14 फीसदी को हिस्सेदारी मिली है. इसे बेहतर नहीं तो बुरा भी नहीं कहा जा सकता.’

वहीं बिहार के राजनीतिक मामलों के जानकार व अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मो. सज्जाद बताते हैं, ‘किसी भी लोकतंत्र के लिए यह बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि अल्पसंख्यकों का इतना बड़ा तबक़ा सिर्फ़ इस डर से वोट दे रहा है कि कहीं भाजपा जैसी पार्टी सत्ता में न आ जाए और उनकी परेशानी बढ़ जाए.’

मो. सज्जाद आगे बताते हैं, ‘जो सवाल अभी सत्ता में भागीदारी या हिस्सेदारी को लेकर उठ रहे हैं तो बिहार के मुस्लिम दानिश्वरों से मेरा सवाल है कि वे उस वक़्त कहां थे जब बिहार में भाजपा का कोई डर नहीं था. 1997 में जब लालू अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सीएम बना रहे थे तब क्यों किसी ने यह आवाज़ नहीं उठाई कि अब्दुल बारी सिद्दीक़ी को सीएम या डिप्टी सीएम बनाए.’

हालांकि मो. सज्जाद यह भी मानते हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि कल कुछ नहीं मांगा तो आज भी नहीं मांगे. सज्जाद आगे यह भी बताते हैं, ‘मुसलमानों को अब नागरिक बनाने का प्रयत्न होना चाहिए और वो प्रयत्न आन्दोलनों के ज़रिए मुमकिन है. आन्दोलन का मतलब यह नहीं कि हम हर दिन सड़क पर ही रहें, बल्कि आन्दोलन का मतलब अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य व रोज़गार के सवालों पर बोलना है. समाज के साथ होने वाले नाइंसाफ़ियों के ख़िलाफ़ बोलना होगा, चाहे वो नाइंसाफ़ी किसी के साथ भी हो रहा हो. वक़्फ़ सम्पत्तियों के सदुपयोग के लिए खुद अपने कम्यूनिटी के अंदर आन्दोलन चलाना होगा. कम्यूनिटी के अंदर जब आन्दोलन चलेगा तब ही शासन व प्रशासन मुसलमानों के प्रति संवेदनशील होंगे.’

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