मैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक यानी आरएसएस हूं. मेरी नजरों में तिरंगा के तीन रंग अशुभ हैं मैं अपने मुख्यालय में कभी तिरंगा नहीं फहराता  और मैं भारतीय संविधान को नहीं, बल्कि मनुस्मृति को मानता हूं और मैं देशभक्त हूं. (भारती कुमारी)

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आज 26 जनवरी यानि गणतंत्र दिवस है . सारे देश में आज यह दिवस पुरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है . मैं भी मना रही हूँ . आज हमारे गणतांत्रिक संविधान का दिन है . आज का दिन स्वतंत्रता , समानता और बंधुत्व के उदात आदर्शों को याद करने का दिन है . पर एक बात है जो मेरे दिल को कचोटती है . क्या भारतीय जनता पार्टी को भी यह पर्व मनाना चाहिए ?

आजादी की लड़ाई से अलग आरएसएस

मैंने भी भारतीय इतिहास और संविधान का गंभीरता से अध्ययन किया है . आरएसएस से लेकर जनसंघ और बीजेपी तक सबको , सबकी विचारधाराओं को पढ़ा है , मथा है , समझा है और इसी तुच्छ समझदारी के चलते ऐसा लगता है कि कम से कम बीजेपी को यह पर्व या तो नहीं मनाना चाहिए या अगर मनाये भी तो इस संकल्प के साथ की अतीत में हमने भारत राष्ट्र और भारतीय गणतंत्र के साथ जो ज्यादतियाँ की हैं उनके प्रति हम क्षमाप्रार्थी हैं . क्यूंकि यह हम ही हैं जिसने कभी भी भारत की आज़ादी के संग्राम में भाग नहीं लिया .

आरएसएस –जनसंघ –बीजेपी यानी हमारे जीवित दादा आरएसएस की स्थापना अंग्रेजों के शह पर आज़ादी के संग्राम को कमजोर करने के लिए हुई थी . जब देश का बच्चा बच्चा आज़ादी की जंग में अपने प्राणों की आहुति दे रहा था , हम सभी अंग्रेजों की मुखबिरी में लगे थे . चूँकि आरएसएस पर जमींदारों और अभिजात्य वर्ग के लोगों का प्रभाव था जिनका आर्थिक हित अंग्रेजों से नाभिनालबद्ध था , इसलिए हम सभी ने अपने आका अंग्रेजों का पूरा साथ दिया .

आरएसएस की नजर में तिरंगा का तीन रंग अशुभ

भगत सिंह तो बेवकूफ था क्यूंकि हमारे आदर्श गोलवलकर का ऐसा ही मानना था . भगत सिंह और सुखदेव जैसे लोग हमारे पितृपुरुष गोलवलकर की नज़रों में छिछोरे देशभक्त थे . हमारा लक्ष्य –अंग्रेजों भारत छोड़ो नहीं बल्कि अंग्रेजों रहो —लूटो और हमें भी लुटने दो, था . और मुस्लिम लीग तो हमारी बहन जैसी थी. जिन्ना और गोलवलकर दोनों तो एक ही थे .दोनों ही चाहते थे की द्विराष्ट्र सिद्धांत के आधार पर भारत का विभाजन हो जाए . और ये तिरंगा जिसे आज हम सभी फहरा रहे , उसके प्रति तो हमारी आस्था , मत पूछो . ये तिरंगे का तीन रंग भारत के लिए अशुभ है , ऐसा गोलवलकर जी ने आज़ादी की पूर्वसंध्या पर ही कह दिया था .

आरएसएस मुख्यालय पर कभी तिरंगा नहीं फहराया

इसीलिए हमारे आरएसएस मुख्यालय पर आजतक कभी तिरंगा नहीं फहराया गया , और ऊपर से ये भारत का संविधान . काहे का संविधान और काहे का गणतंत्र . कितना बेहतर होता जब इस संविधान की जगह मनुस्मृति के हिसाब से देश चलता, समाज चलता . शुद्र पैर दबाते , वैश्य पैसा कमाकर हमें देते और हम बैठकर राज करते . महिलाएं घूँघट में रहतीं और घर की चाहरदीवारी में हमारी सेवा करते रहतीं . तब न तो महिला आरक्षण का सरदर्द होता और न ही निर्भया का . नारी बस भोग्या होती और पितृसत्तात्मक व्यवस्था को गतिमान बनाये रखने में अपने आँचल को फड्वाते रहती . और आज भी . हमें क्या पड़ी है की सेकुलरिज्म और सोशलिज्म रहे या भांड में जाए .

हम चाहते हैं यह देश कट्टर हिंदूवादी देश बने . एक ऐसा देश जहाँ केवल हिन्दू हों और बाकी जो हों वो हमारे नौकर की तरह रहे . पर ये भी केवल हमारी महान राजनीति का एक छोटा सा हिस्सा है . पूरा मत समझिये . अगर हमारी राजनीति को सम्पूर्णता में समझनी है तो जरा प्रभु श्रीराम से भी पूछ लीजिये . अयोध्या की उन सुनी गलियों से भी पूछिए , भारत की उन महिलाओं से भी पूछिए जिन्होंने राममंदिर निर्माण के लिए अपने गले से मंगलसूत्र तक निकाल कर दान कर दिया था . हमें क्या . राम सृष्टिकर्ता और पालक हैं या नहीं , हम नहीं जानते , हम तो बस इतना जानते हैं , राम की कृपा जब तक रहेगी , हमारी राजनीति चलते रहेगी . तो क्या बीजेपी को गणतंत्र दिवस मनाना चाहिए?

लेखिका सामाजिक -राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. वह सम-सामियक विषयों पर लिखती हैं. उनसे bhartikumari [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है साभार: naukarshahi


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