नई दिल्ली | नोट बंदी के बाद हर जगह एक ही बात की चर्चा है की आम आदमी के एक एक रूपए का हिसाब मांगने वाली सरकार क्या कालेधन के असली श्रोत , राजनितिक पार्टियों के चंदे का भी हिसाब देगी. हिसाब देना तो दूर की बात है पार्टिया अपने आप को आरटीआई के दायरे में लाने के लिए तैयार नही है. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी आजकल हर रैली और बैठक में कह रहे है की सभी पार्टियों के चंदे में पारदर्शिता होनी चाहिए.

प्रधानमंत्री मोदी ने यह ब्यान बीजेपी की राष्ट्रिय कार्यकारिणी की बैठक में भी दिया. लेकिन लगता है मोदी जी यह बयान वास्तिवकता से परे और मजबूरी में कहा गया ज्यादा लगता है. वो इसलिए क्योकि अगर बीजेपी एक आरटीआई का जवाब दो महीने गुजर जाने के बाद भी नही दे रही है तो समझा जा सकता है की मोदी जी केवल जनभावनाओ के दबाव की वजह से ऐसे ब्यान देने के लिए मजबूर है.

एक आरटीआई एक्टिविस्ट वेंकटेश नायक ने बीजेपी कार्यालय में आरटीआई लगाकर पुछा था की पिछले एक साल में बीजेपी को कितना चंदा मिला और नोट बंदी के दौरान उन्होंने सरकार को क्या क्या सुझाव दिए. वेंकटेश ने यह आरटीआई 11 नवम्बर 2016 को लगाईं थी. स्पीड पोस्ट ट्रेकिंग सिस्टम के अनुसार 16 नवम्बर को यह आरटीआई बीजेपी कार्यालय ने रिसीव कर ली थी. नियम के अनुसार आरटीआई के 30 दिनों के अन्दर जवाब देना अनिवार्य होता है.

लेकिन दो महीने बीत जाने की बाद भी बीजेपी सुचना अधिकारी ने इस आरटीआई का जवाब नही दिया. हालांकि संसय यह है की अगर बीजेपी और अन्य पार्टिया आरटीआई के दायरे में आती ही नही तो इन पार्टियों से आरटीआई के दायरे में कोई सवाल कैसे किया जा सकता है. दरअसल 03 जून 2013 को केन्द्रीय सूचना आयोग ने आदेश दिया था की छह राष्ट्रिय पार्टिया आरटीआई के दायरे में आती है.

उस समय सूचना आयोग के आदेश के खिलाफ कांग्रेस की युपीए सरकार ने एक अध्यादेश लाने का फैसला किया था लेकिन किन्ही कारणों से यह अध्यादेश नही आ सका. फिहाल पार्टियों को आरटीई के दायरे में लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली हुई है. इस याचिका के वकील प्रशांत भूषण के अनुसार अभी तक सूचना आयोग के आदेश के खिलाफ कोई स्टे नही लिया गया है इसलिए अभी तक सभी राष्ट्रिय पार्टिया आरटीआई के दायरे में आती है.


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