राजधानी दिल्ली में चल रहे विश्व सूफ़ी सम्मेलन पर विवाद गहराता जा रहा है। अब उत्तर प्रदेश के बरेलवी मौलाना तौक़ीर रज़ा ख़ान ने इसे सूफ़ीवाद की बजाय आरएसएसवाद करार दिया है। उन्होंने कहा कि हिंदू-मुस्लिम दंगे करवाने के बाद आरएसएस अब मुसलमानों के अलग-अलग पंथों को लड़वाने की कोशिश कर रहा है। 2007 में मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन के ख़िलाफ़ विवादित फतवा देने पर मौलाना तौक़ीर सुर्खियों में आ गए थे। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल ने भी इनसे मुलाक़ात कर लगभग आफ़त बुला ली थी। वर्ल्ड सूफी फोरम पर गहराते विवाद पर लाइव इंडिया ने उनसे विशेष बातचीत की है।

वर्ल्ड सूफ़ी फोरम से सूफ़ीवाद बदनाम हुआ. आपने इस प्रोग्राम का विरोध किया है?

ये प्रोग्राम आरएसएस के अजेंडा को आगे बढ़ाता है। इसका मकसद मुसलमानों के आपसी मतभेद को बढ़ावा देकर उन्हें सड़क पर लड़वाने की कोशिश करना है। इस अजेंडा के लिए आरएसएस ने सूफीवाद का सहारा लिया है लेकिन हकीकत में यह आरएसएसवाद है। हिंदू-मुसलमान का दंगा करवाने के बाद आरएसएस अब मुसलमानों को आपस में लड़वाना चाहता है।   लेकिन सूफ़ीवाद में हिंसा की कोई जगह नहीं है, ये सच है देखिए, बादशाहों ने सूफियों को किराए पर बुलाया है। सूफीवाद के नाम पर बादशाहों के दरबार में हाजिरी से सूफीवाद की बदनामी हुई है। सूफी असल बादशाह हैं, बाकी आते-जाते रहते हैं।

आतंकवाद सिर्फ मुसलमानों की समस्या नहीं है

मुसलमान आतंकवाद के ख़िलाफ़ एकजुट हों, इससे समाज में अच्छा संदेश जाएगा? दहशतगर्दी के खिलाफ मुसलमान समेत पूरी दुनिया हमेशा खड़ी रही है। इस प्रोग्राम में सिर्फ एक पंथ के मुसलमानों को बुलाने के पीछे क्या मंशा है। सही मायने में देश के सभी धार्मिक समूहों को आना चाहिए था लेकिन बुलाया सिर्फ बरेलवी मुसलमानों को। इसके दो नुकसान हैं। पहला, ये अवधारणा मज़बूत होगी कि आतंकवाद की जड़ में मुसलमान हैं और ख़ात्मा भी वही कर सकते हैं। दूसरा ये कि मुसलमानों में भी एक ख़ास किस्म के मुसलमान हैं, जो इससे निपट सकते हैं। इससे सीधे-सीधे मुसलमानों में मतभेद बढ़ेगा।

क्या आयोजकों को इसकी आशंका नहीं है? इस प्रोग्राम में पहले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शिरकत के बाद संदेह नहीं होना चाहिए कि विश्व सूफ़ी सम्मेलन के पीछे कौन है। असल हुक़ूमत आरएसएस की है। बस उसके आदेश का पालन हो रहा है। फंडिंग सरकार की है। उलेमाओं और सरकार के बीच बाकायदा डील हुई है।

नरेंद्र मोदी अभी भी गुनहगार,  क्या डील हुई है?

अब इससे पर्दा धीरे-धीरे उठेगा लेकिन देश के तमाम ज़िम्मेदार खानकाहों ने इस प्रोग्राम का बायकॉट किया है। दरगाह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर शरीफ़) के दीवान सैयद ज़ैनुल आबेदीन अली खान  इस प्रोग्राम में जाने से मना किया है। कछौछे शरीफ़ तक में हो रहा है। जिन लोगों को बुलाया गया था, उनमें से कई ने सरकार की बदनियती का पता चलने के बाद जाने से मना कर दिया है।

उसी मंच से प्रधानमंत्री अगर कुछ संदेश दे रहे हैं तो उन्हें नहीं सुनना चाहिए?

देखिए, बीजेपी मुसलमानों की दुश्मन है। उसपर कत्ल के इल्ज़ाम हैं। नरेंद्र मोदी ने आजतक माफी नहीं मागी है और ना अपनी गलती मानी है। ऐसे आदमी के दरबार में जाना और उनके लिए दुआ करना उन्हें क्लीनचिट देने जैसा है। उलेमाओं ने सुन्नियत को गिरवी रख दिया है। हिन्दुस्तान के मुसलमानों का बच्चा-बच्चा अभी भी नरेंद्र मोदी को गुनाहगार मानता है।

कब तक नाराज़ होकर बैठे रहेंगे?

हम किछौछे शरीफ़ का विरोध नहीं कर रहे। इससे पहले भी कभी नहीं किया बल्किन उनके प्रोग्राम में शरीक होते रहे हैं लेकिन ये मामला पेचीदा है। मुसलमानों का एक तबका (देवंबदी) शुरू से कांग्रेस के करीब रहा है। आम मुसलमानों में यह समझ बनाने की कोशिश हो रही है कि बरेलवी मुसलमान बीजेपी से जुड़ रहा है। आरएसएस यही चाहता है कि दोनों धड़ों में इस तरह की गलतफहमी को मज़बूत करके उन्हें सड़क पर पहुंचा दिया जाए। (liveindia)


लाइक करें :-


Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें

कमेंट ज़रूर करें