prophet muhammad madina

कोहराम न्यूज़ के लिए जुनैद टाक का लेख 

जब से ये दुनिया बनी हैं करोड़ों अरबों लोग आए और चले गए और जब तक ये दुनिया रहेगी तब तक करोड़ों अरबों लोग आते रहेंगे और जाते रहेंगे। इनमें से बहुत से लोगों ने दुनिया में अपनी रहमदिली (दयालुता) दिखाई और इन्सानियत (मानवता) की खिदमत (सेवा) करते रहें। मगर मेरा दावा हैं कि पेगम्बर हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) के जैसा रहमदिल (दयालु) इन्सान न आज तक इस दुनिया में हुआ हैं और नाहीं कभी होगा। मेरे इस दावे से कुछ लोग मुझ पर यह इल्जाम लगा सकते हैं कि मैं कट्टर मुसलमान हूँ इसीलिए पेगम्बर हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) को ही सबसे बुलन्द मर्तबा (सर्वोच्च स्तर) दे रहा हूँ। लेकिन इन्शा अल्लाह (ईश्वर ने चाहा तो) इस मजमुन (लेख) को पढ़ने के बाद सभी यही कहेंगे कि जो पेगम्बर हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) ने किया हैं कोई और वैसा करना तो दूर, करने की सोच भी नहीं सकता।

इस मजमुन (लेख) की शुरुआत पेगम्बर हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) के एक ऐसे हैरतअन्गेज कारनामे से करना चाहता हूँ जो किसी भी आम या खास इन्सान के लिए करना नागवार (असम्भव) हैं।

पेगम्बर हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) के इस जाहिरी (प्रत्यक्ष) दुनिया से जाने के बाद एक दिन उनके खलीफा (उत्तराधिकारी) हजरत अबु बकर (र.अ.) को मालूम हुआ कि आप पेगम्बर हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) जब दुनिया में मौजूद थे तो रोज पास ही एक पहाड़ी की गुफा में कुछ खाना लेकर जाते। इसलिए हजरत अबु बकर (र.अ.) भी एक दिन खाना लेकर उसी गुफा में पहुँच गए। वहाँ उन्होंने एक बहुत ही बुजुर्ग शख्स को देखा जो बिल्कुल अन्धा था और जिसका पूरा शरीर कोढ की बीमारी की वजह से सड़ चुका था। हजरत अबु बकर (र.अ.) ने उस शख्स से पेगम्बर हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वे रोज़ उसके लिए खाना लेकर आते। तो उन्होंने कहा कि मैं भी आपके लिए खाना लाया हूँ और फिर उसको खाना खिलाने के लिए जैसे ही एक रोटी का टुकड़ा उसके मुँह में रखा तो वह दर्द से कहार उठा और कहने लगा कि मैं इतना कमज़ोर हूँ कि खुद रोटी भी नहीं चबा सकता। इसलिए पिछले कितने ही सालों से पेगम्बर हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) मुझे खाना खिलाते तो वे पहले रोटी को खुद अपने मुँह में चबाते और फिर हाथ से नहीं बल्कि उनकी जुबान से वो चबाई हुई रोटी मेरे मुँह में रखते!

जी हाँ जिसका पूरा शरीर कोढ की बीमारी से सड़ चुका था उसको पेगम्बर हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) अपनी जुबान से खाना खिलाते। सिर्फ और सिर्फ इन्सानियत के नाते। वो शख्स न तो हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) का कोई रिश्तेदार था और ना हीं वो मुसलमान था।

अब आप ही फैसला कीजिए क्या इस दुनिया ने आज तक कोई ऐसा इन्सान देखा हैं जो इस हद तक जाकर किसी की खिदमत (सेवा) कर सकें??? तो जवाब यही  हैं कि हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) से ज्यादा रहमदिल (दयालु) इन्सान और कोई नहीं। आपकी रहमदिली (दयालुता) का तो ये आलम था कि आपने उनको भी माफ कर दिया था जो आपको जान से मारना चाहते थे।

एक बार एक यहूदी औरत जो हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) से बहुत नफरत करती थीं आपकी बारगाह (दरबार) में हाजिर हुई और कुछ मीठे चावल जिसमें जहर मिलाया हुआ था आपको पेश किये और वहाँ से जाने लगीं। जैसे ही आपने कुछ चावल खाए आपके होंठों पर और चेहरे पर जहर का असर होने लगा। आपके सहाबा (अनुयायी) समझ गये कि कुछ गड़बड़ हैं इसलिए फौरन उस औरत को पकड़कर आपके सामने पेश किया गया और उससे पूछा कि चावल में क्या मिलाया हैं? तो उसने जवाब दिया कि आपको जान से मारने के लिए मैनें इसमें जहर मिला दिया था। आपके सहाबा (अनुयायी) कहने लगे कि इस औरत को कत्ल किया जाए तो इस पर हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) ने कहा कि अगर मैं इसे मारने का हुक्म देता हूँ तो फिर इसमें और मुझमें क्या फर्क रह जाएगा इसलिए इसे जाने दो और उसे छोड़ दिया गया। हालांकि जहर का असर बढ़ता ही जा रहा था।

इतना ही नहीं बल्कि जब मक्का शहर पर मुसलमानों को जीत हासिल हुई तो हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) ने अपने सभी दुश्मनों को माफ कर दिया। ये वही लोग थे जो  15 सालों तक आप पर जुल्म करते रहें, आपको गालियाँ दी, आपको पत्थरों से मार-मारकर लहू लुहान कर दिया, आपको जान से मारने की कोशिश की, जिनकी वजह से आपको मक्का शहर छोड़कर जाना पड़ा और जिन्होंने आपके साथियों का कत्ल किया था। इसलिए जब वे जन्ग हार गए तो खौफ की वजह से उनकी आँखें बड़ी हो गई थीं उनके दिल कांप रहे थे क्योंकि उन्हें मालूम था कि जन्ग में हारने वालों को बुरी तरीके से मार दिया जाता था क्योंकि यही उनका तरीका था। लेकिन हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) इतने रहमदिल (दयालु) थे कि आपने बिना किसी शर्त के अपने दुश्मनों के सभी गुनाहों को माफ कर दिया। कितना बड़ा दिल हैं आपका।

जब हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) ने इस्लाम को पूरे अरब में फैला दिया तो अब सामने से तो कोई आपका दुश्मन न था मगर कुछ लोग दिल ही दिल में आपसे बगावत (ईर्ष्या) रखते थे। ऐसा ही शख्स था जो एक बार मुसाफिर बनकर आपके शहर में पहुँच गया। हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) के शहर में जब भी कोई मुसाफिर आता तो आप खुद उसे अपने घर ले जाते और उसकी खिदमत (सेवा) करते और अगर देर रात हो जाती तो अपने घर में ही ठहराते। उस शख्स को भी आप घर ले गए और उसको खाना खिलाया और फिर रात होने पर उसके लिए बिस्तर का इन्तेजाम किया। वह उनको जान से मारने के इरादे से आया था मगर आपके घर पर आपके कुछ सहाबा (अनुयायी) भी थे इसलिए उसकी हिम्मत न हुई आप पर हमला करने की। मगर वह उनको तकलीफ देना चाहता था इसलिए उसने एक बहुत घिनौनी हरकत की। जब आधी रात हुई तो जिस बिस्तर पर वो आराम कर रहा था उसी पर उसने गंदगी कर दी और चुपचाप वहाँ से चला गया। कुछ देर बाद जब बदबू आने लगी तो हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) और उनके सहाबा (अनुयायी) कमरे गए और देखा कि वो शख्स गायब हैं और बिस्तर पर गंदगी पड़ी हैं। आपके सहाबा (अनुयायी) कहने लगे हम ये गंदगी साफ़ कर देते हैं तो आपने कहा कि वो मेरा मेहमान था इसलिए सफाई भी मैं ही करूँगा और आप गंदगी साफ़ करने में जुट गए।

वह शख्स कुछ ही दूर गया था कि उसको याद आया कि वो अपनी तलवार वही भूल आया हैं। उस जमाने में अगर कोई आदमी अपनी तलवार कहीं भूल जायें और वापस उसे लेकर न आये तो उसे बुजदिल माना जाता था। पर उसके मन में ड़र था कि अगर वो तलवार लेने वापस जायेगा तो हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) और उनके सहाबा (अनुयायी) उसे कैद कर लेगे पर अगर वो तलवार लेकर न आया तो लोग उसे बुजदिल कहेंगे। आखिरकार उसने हिम्मत की और तलवार लेने के लिए वापस लौटा। जैसे ही वो घर में दाखिल हुआ तो उसने देखा कि हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) अपने हाथों से उसकी गंदगी को साफ़ कर रहे थे। वो सोच रहा था कि वे लोग उसे देखकर बहुत गुस्सा होगे और उसे पिटेंगे पर वो ये सुनकर बहुत ही हैरान (आश्चर्यचकित) रह गया जब हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) ने उससे ये कहा कि आप फिक्र न करें मैं आपके लिए दुसरा बिस्तर लगा देता हूँ आप उस पर सो जाइए। यह सुनकर उस शख्स के आखो में आसु आने लगे और वो हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) के कदमों में गिर गया और माफी मांगने लगा और कहा कि मुझे भी कलमा पढ़वा कर इस्लाम में दाखिल कर दीजिये।

इस तरह के हजारों वाकियात (घटनाएं) हैं जिनको जानने के लिए हम कुरान शरीफ़ और सीरत ए रसूल (हजरत मुहम्मद स.अ.व. की जीवनी) पढ़ सकते हैं जिनसे हमें पता चलता हैं कि पेगम्बर हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) के जितना रहमदिल (दयालु) इन्सान दुनिया में और कोई हुआ ही नहीं।

मोहम्मद जुनेद टाक (बाली) राजस्थान

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