उम्मुल मोमेनीन हज़रत बीबी खदीजा रदियल्लाहू अन्हा की आखिरी निशानी हज़रात खातुने जन्नत बीबी फातिमा हैं आप 20 जमादिस्सानी को ऐलाने नुबुवत से 5 साल पहले मक्का में पैदा हुई आप तमाम जन्नत की औरतो की सरदार हैं.

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अल्लाह के रसूल जब हिजरत फरमा कर मदीना तशरीफ़ लाये, उस वक्त आप कुवारी थी. मुहर्रम 2 हिजरी में अल्लाह के रसूल ने अपनी चहेती बेटी की शादी हजरत अली शेरे खुदा के साथ कर दी. दोनों को अपने घर से विदा करने के बाद आप ने फ़रमाया- घर पहुँच कर तुम दोनों मेरा इंतिजार करना.

थोड़ी देर के बाद आप बेटी के घर पहुंचे , वुजू के लिए पानी तलब फ़रमाया. वुजू फरमा लेने के बाद बचा पानी आपने बेटी व दामाद पर छिड़क कर यूँ दुआ फरमाई –

अल्लाहुमा बारिक फिहिमा, व बारिक अलैहिमा व बारिक लहुमा फी नस्लेहिमा (ऐ अल्लाह ! इन दोनों में बरकत फरमा, इन पर अपनी बरकतें नाजिल फरमा और इनकी नस्ल में बरकत दे).

रुख़सती के वक्त अल्लाह के रसूल ने अपनी बेटी को तोहफे के तोर पर एक तख़्त, एक तकिया, जिसके अन्दर खजूर की छाल भरी हुई थी, एक प्याला, एक मशक, दो चक्किया, दो घड़े दिए थे. अल्लाह के रसूल ने अपनी बेटी से बड़ी मुहब्बत की. आप फ़रमाया करते – फातिमा मेरे बदन का एक टुकड़ा हैं, जिसने उसे तकली़फ़़ पहुंचाई, उसने मुझे तकलीफ़ पहुंचाई, जिसने उसे नारा़ज किया उसने मुझे नारा़ज किया.

हज़रत जमीअ बिन ओमेर फरमाते हैं : मैं अपनी फूफी के साथ एक बार हज़रत बीबी आइशा की खिदमत में गया. मेने उम्मुल मोमेनीन से पूछा- अल्लाह के रसूल सबसे ज्यादा मुहब्बत किससे फ़रमाते थे ? उन्होंने जवाब दिया हजरत बीबी फा़तिमा से.

मुहब्बत का तकाजा ही था कि आप जब भी बाहर से तशरीफ़ लाते तो सबसे पहले मस्जिदे नबवी में दो रकत नमाज अदा फरमाते, फिर हजरत बीबी फातिमा के घर तशरीफ़ ले जाते, उसके बाद उम्माह्तुल मोमेनिनी से मुलाकात के लिए जाते. यही वजह हैं कि तोर-तरीके चाल ढाल में वही हजरत रसूले अकरम जैसी थी. हजरत बीबी फातिमा जब भी आपके पास आती तो मुहब्बत के मारे आप खड़े हो जाते और उन्हें अपने पास बिठा लेते.

आपकी घरेलु जिंदगी बड़ी तंगी से गुजरती थी. आप घर के सारे काम-काज खुद किया करती, बच्चो की परवरिश, शोहर की खिदमत और अल्लाह की इबादत आप के रोजाना के मामुल थे, रात को घर के सारे काम काज से फारिग होकर जब आप इबादत के लिये खड़ी होती तो कभी-कभी ऐसा होता कि एक ही सजदे में फजर की अज़ान का वक्त हो जाया करता.

आपकी मेहनत व तकलीफ को देखकर एक दिन हज़रत अली शेरे खुदा ने आप से फ़रमाया- इन दिनों दरबारे रसूल में माले ग़नीमत के साथ बहुत से कैदी भी आये हैं. तुम सरकार के पास जाओ और एक खादिम अपने लिए भी मांग लाओ ताकि मेहनत- मशक्कत कम हो जाए. आप शोहर का हुक्म टाल ना सकी, चली तो गयी लेकिन शर्म के मारे कुछ कह न सकी. सलाम करके वापस चली आई.

फिर दोनों दरबारे रसूल में हाजिर हुवे ओर अपनी अपनी तकलीफ बयांन की. आपने उन दोनों के हालत सुनकर फ़रमाया – बेटी ! अभी मैं तुम्हे कोई खादिम नहीं दे सकता, अभी मुझे सुफ्फा वालो के खाने पीने का इन्तिजाम करना हैं, वह सभी भूखे हैं. मियां-बीवी दोनों वापस अपने घर चले गए और कुछ देर के बाद अल्लाह के रसूल खुद उनके पास तशरीफ़ ले गये और फ़रमाया- तुम दोनों मुझसे जो चीज मांगने आये थे, मैं उससे भी अच्छी चीज तुम्हे देने आया हूँ ! सुनो हर नमाज के बाद 10-10 बार सुब्हानअल्लाह, अल्हम्दुलिलाह, और अल्लाहु अकबर पड़ा करो. और सोते वक्त 33 बार सुब्हानअल्लाह, 33 बार अल्हम्दुलिलाह, और 34 बार अल्लाहु अकबर पड़ कर अपने उपर दम कर लिया करो.

हजरत रसूले खुदा के पर्दा फरमाने के बाद आप जुदाई का ग़म बर्दाश्त ना कर सकी और 6 महीने बाद ही 29 साल की उम्र में 3 रमजान 11 हिजरी को मदीना शरीफ में इन्तिकाल फरमा गई. आपकी वसीयत के मुताबिक आपको रात में जन्नतुल ब़की में दफ्न कर दिया गया.

  • शाहिद जमाल

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