उत्तर प्रदेश की बंपर जीत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की साख पर मुहर लगाई है और साथ ही भारत में आर्थिक सुधार की दिशा में नोटबंदी समेत उठाए गए अतिरिक्त क़दमों की जनता ने तस्दीक़ कर दी है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान विपक्ष का नोटबंदी को लेकर विरोध का देश के सबसे बड़े राज्य ने जवाब दे दिया है। जीत से यह साबित कर दिया है कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सुधार को लेकर देश की जनता साथ है और जीएसटी समेत बाक़ी कड़े क़दमों के लिए देश तैयार है।

आशा की जानी चाहिए कि देश की विकास के लिए अवश्यंभावी जीएसटी तो लागू किया ही जाना चाहिए इसके अलावा सर्विस सेक्टर आधारित भारत की अर्थ व्यवस्था के लिए ज़रूरी आर्थिक सुधार भी किए जाने चाहिए। हालिया अप्रत्यक्ष कर में अभी माल के लेन देन, सेवा कर, वैट और उत्पाद शुल्क का पेचीदा स्वरूप है। विस्तृत और व्यापक होने के नाते, वर्तमान अप्रत्यक्ष कर कानूनों के तहत मूल्यांकन प्रावधान अक्सर अस्पष्टता से भरा होता है। राज्यों में वैट की अस्पष्टता और उत्पाद शुल्क के विभिन्न स्वरूपों के कारण माल और उत्पादन में इतनी पेचीदगियाँ हैं कि अफ़सरशाही का एक बड़ा वर्ग अदालतों में मुस्तगिस और अदालतों के नोटिसों के जवाब देने में ही व्यस्त है। जिस विभाग को स्पष्ट कर और राजस्व से सरकार की आर्थिक मदद करनी चाहिए वह ख़ुद मुक़दमों में लिपटा हुआ है। कर मूल्यांकन के इन सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय के नियमों ने व्याख्याओं के नए आयाम जोड़े हैं। फिएट मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने विनिर्माण लागत पर उत्पाद शुल्क और लेन-देन मूल्य की मांग की थी। अदालत ने खुद उत्पाद शुल्क की मात्रा को मापने के लिए मापदंड बदल दिया।

यह उदाहरण और उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जीत का यहाँ इसलिए ज़िक्र किया गया है क्योंकि क़ानूनों और विभिन्न राज्यों के विभिन्न कर प्रणाली और इससे उपजे मुक़दमों के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए उमड़े अपार जनसमर्थन ने यह जता दिया है कि करों और व्यापारिक लेन देन के पूरे सिस्टम में आधारभूत बदलाव के लिए आवश्यक जीएसटी के लिए पूरी पृष्ठभूमि तैयार है। अगर इसके बाद भी जीएसटी में देरी होती है तो निश्चित ही बिहार और दिल्ली चुनाव के बाद जिस तरह से नरेन्द्र मोदी की स्वीकार्यता को लेकर सवाल शुरू हो गए थे, वह वापस उठने शुरू हो सकते हैं। अभी दिल्ली इसलिए भी दूर है कि जीएसटी के मसौदे में कई सवालों को लेकर स्पष्टता का अभाव भी व्यापारियों और उत्पादकों के सवालों के निशाने पर है, हालांकि व्यापारी ख़ुद चाहते हैं कि करों के अस्पष्ट निर्धारण के कारण जो नुक़सान हो रहा है उससे बेहतर है कि ज़्यादा स्पष्टता के साथ जीएसटी लागू हो जाए।

बहुत सवाल हैं जीएसटी के बारे में फिर भी हम एक परिवर्तनकारी और गतिशील कर व्यवस्था के कार्यान्वयन की तरफ़ बढ़ रहे हैं यानी जीएसटी की तरफ़। ऐसा लगता है कि आदर्श जीएसटी कानून कम-से-कम एक कार्य-प्रगति दस्तावेज़ है, जिससे कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया गया। मॉडल जीएसटी कानून में कहा गया है कि सामानों और सेवाओं की आपूर्ति का मूल्य ‘लेनदेन मूल्य’ होगा जो वास्तव में भुगतान की गई कीमत या आपूर्ति के लिए देय है, जहां आपूर्तिकर्ता और प्राप्तकर्ता संबंधित नहीं हैं। इस प्रकार, लेनदेन मूल्य अवधारणा को अपनाने के साथ, मूल्यांकन के उद्देश्यों के लिए पैक और गैर-पैक किए गए सामानों के बीच अंतर को अप्रासंगिक बना दिया गया है और परिणामस्वरूप उत्पाद शुल्क की लेवी के आधार पर पुरानी खुदरा बिक्री मूल्य (आरएसपी) आधारित पद्धति को बेमानी मान लिया जाएगा। यह खुदरा, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, एफएमसीजी आदि जैसे उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण बदलाव होगा, जो उत्पाद शुल्क के भुगतान के लिए आरएसपी आधारित मूल्यांकन पद्धति का उपयोग कर रहे हैं। आरएसपी पद्धति में, सरकार को वैल्यूएशन पहलू पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत नहीं थी, ‘लेनदेन मूल्य’ पद्धति के तहत समान लाभ को और अधिक महत्व दिया जा रहा है।

लेनदेन मूल्य को इसके दायरे के अन्य करों और लेवी, मुफ्त आपूर्ति, खर्च जैसे कि कमीशन / पैकिंग, ब्याज / शुल्क और सब्सिडी के साथ-साथ छूट भी शामिल करने के लिए जीएसटी में समझाया गया है। मॉडल जीएसटी कानून को अनिवार्य रूप से पोस्ट बिक्री छूट की आवश्यकता होती है जिसे विशेष रूप से इनवॉइस से जुड़ा होना चाहिए, जिसके तहत इस तरह की छूट प्रदान की जाती है और इसके लिए समझौते में ‘स्थापित’ होने की आवश्यकता है। यह उद्योग के लिए एक बड़ी चुनौती होगी क्योंकि वित्तीय वर्ष के आखिर में, केवल एक बार बिक्री लक्ष्य या मात्रा मिलने के बाद, उनके डिलीवर / वितरक को करदाताओं द्वारा छूट दी जाती है। इस प्रकार बिक्री चालान के साथ छूट को लिंक करना लगभग असंभव होगा। समझौते में शामिल किए जाने के संदर्भ में ‘स्थापित’ शब्द के उपयोग पर कोई स्पष्टता नहीं है। व्यवसायों को उन सभी प्रोत्साहन / डिस्काउंट स्कीमों का आकलन करने की आवश्यकता होगी जो मॉडल जीएसटी कानून के तहत प्रदान की गई बिक्री के छूट के मानदंडों को पूरा करते हैं।

मॉडल जीएसटी कानून एक ‘आपूर्ति’ पर आधारित क़ानून माना जाता है, ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित पार्टियों के लिए किए गए सभी सामानों और सेवाओं की आपूर्ति जीएसटी के दायरे में आ जाएगी हालांकि ऐसा होना नहीं चाहिए। औद्योगिक जगत की चिंता यह है कि संबंधित पार्टियों की आपूर्ति में भी जीएसटी का भुगतान किया जाएगा, यानी यह कि आज के लेन-देन मूल्य यानी लागत के साथ दस प्रतिशत है, उससे अधिक भुगतान करना होगा। विस्तृत मूल्यांकन नियमों की अनुपस्थिति के अभाव में जीएसटी में यह स्पष्टता नहीं है।

साथ ही शाखाओं या इकाइयों को माल की अंतरराज्यीय आवाजाही, अर्थात स्टॉक ट्रांसफर मौजूदा अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में किसी भी कर को आकर्षित नहीं करते हैं। यहां तक ​​कि स्वयं की इकाइयों के लिए सेवाओं की आपूर्ति भी कर सकते हैं। हालांकि, जीएसटी शासन के तहत, उपरोक्त आपूर्ति भी करों को आकर्षित करती है।

किसी भी कर व्यवस्था में यह आवश्यक है कि माल और सेवाओं के मूल्यांकन के संबंध में वैधानिक प्रावधान स्पष्ट होने चाहिए। अगर सरकार को ज़रूरी लगे तो अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचने के लिए और व्यापार के लिए पर्याप्त मार्गदर्शन और स्पष्टता प्रदान करें ताकि उन्हें सही ढंग से लागू करने में सक्षम बनाया जा सके।

*लेखक राकेश सिंह एसोचैम उत्तर प्रदेश के सहअध्यक्ष और इंस्टिच्यूट ऑफ़ कॉस्ट अकाउंटेंट संस्थान के पूर्व अध्यक्ष हैं।

 


Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें



Facebook Comment

Related Posts

loading...
कोहराम न्यूज़ की एंड्राइड ऐप इनस्टॉल करें
SHARE