इरफान इंजीनियर   

सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा देश के उन इलाकों में भी फैल गई, जहां उसका कोई इतिहास नहीं था. हापुड़ और लोमी (उत्तरप्रदेश) जैसे छोटे शहरों व हरियाणा के गुड़गांव को सांप्रदायिक हिंसा ने अपनी चपेट में ले लिया. सहारानपुर और हैदराबाद में मुसलमानों और सिक्खों के बीच सांप्रदायिक झड़पें हुईं.
सन् 2014 की लक्षित हिंसा की सबसे भयावह घटना 23 दिसंबर को हुई जब असम के कोकराझार और सोनीपुर जिलों में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैण्ड (एनडीएफबी) के सोंगबिजित धड़े के उग्रवादियों ने महिलाओं और बच्चों सहित, 76 आदिवासियों की जान ले ली. लगभग 7,000 ग्रामीणों को अपने घरबार छोड़कर भागना पड़ा. आदिवासियों द्वारा की गई बदले की कार्यवाही में तीन बोडो मारे गये.

सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की 561 घटनाएं हुईं, जबकि सन् 2013 में ऐसी घटनाओं की संख्या 823 थी. सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा में 90 लोग मारे गये और 1,688 घायल हुए. सन् 2013 में ये आंकड़े क्रमश: 133 व 2,269 थे. केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने ‘‘धार्मिक कारकों, लैंगिक विवादों, मोबाइल एप्स अथवा सोशल मीडिया में धर्म या धार्मिक प्रतीकों के कथित अपमान, धार्मिक स्थलों की जमीन को लेकर विवाद और अन्य मुद्दों’’ को सांप्रदायिक हिंसा भड़कने का कारण बताया.

सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा में (असम की नस्लीय हिंसा को शामिल करके) 201 व उसे छोड़कर 90 लोग मारे गये. इसकी तुलना में, आतंकी हमलों में 18 लोगों की मृत्यु हुई और 19 घायल हुए. मारे जाने वालों में 3 पुलिसकर्मी और 4 अतिवादी थे. जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमलों में 27 लोग मारे गये. इनमें शामिल थे 15 सुरक्षाकर्मी, 4 नागरिक और 8 अतिवादी. इन हमलो में 5 लोग घायल हुए, जिनमें से एक सरपंच और चार सीमा सुरक्षा बल कर्मी थे.

इसके बावजूद, गुवाहाटी में 29 नवंबर 2014 को राज्यों के पुलिस महानिरीक्षकों और महानिदेशकों की 49वीं वार्षिक बैठक को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आतंकवाद, देश की सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती है और सरकार यह सुनिश्चित करने के प्रति प्रतिबद्ध है कि दुनिया के किसी भी आतंकी संगठन को भारत में अपने पैर जमाने की इजाजत न दी जाए. उन्होंने यह संदेह व्यक्त किया कि देश के कुछ पथभ्रष्ट युवा आईसिस जैसे आतंकी संगठनों की ओर आकर्षित हो सकते हैं परंतु सरकार उन्हें रोकने का हर संभव प्रयास करेगी. सांप्रदायिक हिंसा में मारे गये लोगों की संख्या, आतंकवादी हमलों की तुलना में 14 गुना थी. परंतु गृहमंत्री के उद्घाटन भाषण में सांप्रदायिक हिंसा का जिक्र तक नहीं था.

अगर हम असम को छोड़ दें, जहां एनडीएफबी के सोंगबिजित धड़े द्वारा मई में बंगाली मुसलमानों और दिसंबर में आदिवासियों पर किए गए हमलों में कुल 111 लोग मारे गये, तो 2014 में सभी राज्यों में उत्तरप्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा की सर्वाधिक घटनाएं हुईं. लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, सन् 2014 में उत्तरप्रदेश में हुईं 129 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में 25 लोग मारे गये और 364 घायल हुए. इस मामले में महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर रहा जहां 82 घटनाओं में 12 लोगों की जानें गईं और 165 घायल हुए.

महाराष्ट्र में ही, 2013 में 88 सांप्रदायिक दंगों में 12 लोग मारे गये थे और 352 घायल हुए थे. तीसरे नंबर पर रहा कर्नाटक जहां 68 घटनाओं में 6 लोगों की मृत्यु हुई और 151 घायल हुए. सन् 2013 में कर्नाटक में 73 घटनाओं में 11 लोग मारे गये थे और 235 घायल हुए थे. गुजरे साल में राजस्थान में सांप्रदायिक हिंसा की 61 घटनाएं हुईं, जिनमें 13 लोगों ने अपनी जानें गंवाईं और 116 घायल हुए. गुजरात में 59 घटनाओं में 8 लोगों की जानें गईं और 172 घायल हुए.

सन् 2013 में गुजरात में 68 हिंसक सांप्रदायिक झड़पों में 10 लोगों की मृत्यु हुई थी और 184 घायल हुए थे. सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के लिहाज से बिहार पांचवे स्थान पर रहा, जहां 51 घटनाओं में 4 लोग मारे गये और 267 घायल हुए. सन् 2013 में बिहार में हुई 63 घटनाओं में 7 लोग मारे गये थे और 283 घायल हुए थे.

हमारे देश में एक सांगठनिक ‘दंगा निर्माण प्रणाली’ विकसित हो गई है जो राजनैतिक परिस्थितियों के अनुकूल होने पर, जब चाहे, जहां चाहे दंगें भड़काने में सक्षम है. यह सांगठनिक ढांचा दिन-प्रतिदिन मजबूत होता जा रहा है और भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से इसके हौसले और बुलंद हुए हैं. यदि सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं और उनमें मारे जाने वाले लोगों की संख्या, सन् 2013 की तुलना में कम रही तो इसका कारण यह था कि इस वर्ष दंगों या लक्षित हिंसा से कोई विशेष राजनैतिक लाभ मिलने की उम्मीद नहीं थी.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में ईसाईयों का सामाजिक बहिष्कार हो रहा है और उनके संगठनों को आरएसएस के निर्देशों के अनुरूप काम करना पड़ रहा है. बस्तर के ईसाई इतने आतंकित हैं कि उनके संगठनों ने एक तथ्यान्वेषण दल (जिसका गठन धार्मिक स्वातन्त्र्य के संवैधानिक अधिकार के उल्लंघन के मामलों का अध्ययन करने के लिए किया गया था) से उसकी बस्तर यात्रा रद्द करने को कहा क्योंकि उन्हें डर था इससे उनके खिलाफ हिंसा में और तेजी आयेगी. ऐसा लगता है कि सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में कमी और अल्पसंख्यकों को आतंक के साए में रहने के लिए मजबूर किया जाना-ये दोनों ही हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों की सोची-समझी रणनीति का अंग है.

अल्पसंख्यकों को आतंकित करने की इस कोशिश की प्रतिक्रिया में एमआईएम के तेवर और अधिक आक्रामक होते जा रहे हैं और उसके नेता जहर उगल रहे हैं. इससे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को दो तरह से लाभ हो रहा है. एक तो जनता और मीडिया का ध्यान उनकी हरकतों से हट रहा है और दूसरे, उन्हें अपनी कार्यवाहियों और कथनों को उचित ठहराने का मौका मिल रहा है. ‘आप’ के नेताओं ने तो भाजपा पर यह आरोप तक लगाया है कि उसने ही दिल्ली के चुनाव में एमआईएम के उम्मीदवारों को प्रायोजित किया है क्योंकि चुनाव मैदान में एमआईएम की मौजूदगी के कारण धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ेगा और अंततः इससे भाजपा लाभान्वित होगी.

सन् 2014 में सबसे ज्यादा सांप्रदायिक घटनाएं उत्तरी और पष्चिमी भारत में हुईं, यद्यपि घटनाओं और मरने व घायल होने वालों की संख्या में सन् 2013 की तुलना में कमी आई. ऐसा प्रतीत होता है कि सांप्रदायिकता भड़काकर दंगे करवाने का मुख्य लक्ष्य चुनाव में लाभ पाना होता है. दक्षिण भारत में केवल कर्नाटक में सांप्रदायिक हिंसा हुई. मध्यप्रदेश में सन् 2013 में हुई सांप्रदायिक हिंसा की 84 घटनाओं की तुलना में सन् 2014 में केवल 42 घटनायें हुईं व इस कारण यह राज्य सांप्रदायिक हिंसा से सबसे अधिक प्रभावित पांच राज्यों की सूची से हट गया.

मध्यप्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में कमी का कारण यह था कि सन् 2013 में राज्य में विधानसभा चुनाव थे और इसलिए सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया. कई अध्ययनों से यह साफ हो गया है कि अन्य पार्टियों की तुलना में, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से सबसे अधिक लाभ भाजपा को मिलता है. यही कारण है कि चुनाव के कुछ महिने पहले से सांप्रदायिक हिंसा में वृद्धि होने लगती है. सन् 2013 में अकेले उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में सांप्रदायिक दंगों में 77 लोग मारे गये थे. भाजपा और उसके सहयोगियों ने 2014 की शुरूआत में हुए लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में 80 में से 74 लोकसभा सीटों पर विजय हासिल की और भाजपा ने मुजफ्फरनगर और मुरादाबाद में हुई सांप्रदायिक हिंसा के आरोपी अपने नेताओं का सार्वजनिक रूप से सम्मान किया.

यद्यपि सन् 2014 में पिछले वर्ष की तुलना में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं कम हुईं और इनमें मारे जाने और घायल होने वाले लोगों की संख्या में भी कमी आई परंतु समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने और सांप्रदायिक घृणा फैलाने के प्रयास अनवरत जारी रहे. भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ ने खुलेआम यह कहा कि वे ऐसे अंतर्राधार्मिक विवाह नहीं होने देंगे जिनमें लड़का मुसलमान और लड़की हिंदू हो. उन्होंने बिना किसी आधार के यह आरोप लगाया कि एक षड़यंत्र के तहत, हिंदू लड़कियों को प्रेमजाल में फंसाकर उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बनाया जा रहा है. इस षडंयत्र को उन्होंने लवजिहाद का नाम दिया.

हिंदू राष्ट्रवादियों ने देश के उत्तरी व पश्चिमी इलाकों में इस तरह के विवाहों के खिलाफ कटु अभियान चलाया और घर-घर इसका विरोध करते हुए पर्चे व पुस्तिकाएं बांटी. इसके बाद राजस्थान में चुनाव सभाओं को संबोधित करते हुए भाजपा सरकार में मंत्री मेनका गांधी ने बिना कोई प्रमाण प्रस्तुत किए यह आरोप लगाया कि गौवध से होने वाले मुनाफे का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों को प्रायोजित करने के लिए किया जा रहा है. अगर मेनका गांधी के पास इस आशय के कोई पुख्ता सुबूत हैं तो उन्हें ये सुबूत पुलिस को सौंपने चाहिये ताकि उनकी जांच की जा सके. परंतु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. एक अन्य मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने दिल्ली में एक घिनौने भाषण में कहा कि भारतीयों के दो वर्ग हैं-रामजादे और हरामजादे-अर्थात् सभी गैर-हिंदू अवैध संताने हैं.

विहिप ने आगरा में गरीब मुसलमानों, जो कि कचड़ा बीनकर अपना जीवनयापन करते हैं, को हिंदू बनाने का अभियान चलाया. इसके लिए धमकी और लोभ दोनों का इस्तेमाल किया गया. धमकी यह दी गई कि अगर वे हिंदू न बने तो उनकी झुग्गियों को उखाड़ फेंका जायेगा और लालच यह दिया गया कि अगर वे अपना धर्म बदलने को तैयार हो जायेंगे तो उन्हें राशन व बीपीएल कार्ड आदि उपलब्ध करवाये जायेंगे.

इसके बाद यह धमकी भी दी गई कि आगरा में क्रिसमस के आसपास बड़ी संख्या में अन्य धर्मों के लोगों को हिंदू बनाया जायेगा और प्रवीण तोगडि़या ने यह फरमाया कि भारत में हिंदुओं की आबादी का प्रतिशत 82 से बढ़ाकर 100 किया जायेगा. एक अन्य भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने यह आधारहीन और तथ्यों के विपरीत आरोप लगाया कि सभी मदरसे आतंकी प्रशिक्षण के अड्डे हैं. तथ्य यह है कि कई मदरसों में हिंदू बच्चे भी पढ़ते हैं. साक्षी महाराज ने ही गोडसे को देशभक्त बताया और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यह कहा कि वे चाहती हैं कि गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किया जाए.

भाजपा नेताओं व हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा घृणा फैलाने के प्रयासों के ये चंद उदाहरण भर हैं. भाजपा नेताओं ने यह बयान भी दिया कि वे हर मस्जिद से लाउडस्पीकर उतार लेंगे. इस तरह के भड़काऊ और आधारहीन वक्तव्यों में से केवल कुछ ही राष्ट्रीय मीडिया में स्थान पाते हैं और उनसे कुछ ज्यादा को क्षेत्रीय भाषाओं के मीडिया में जगह मिलती है. परंतु ऐसे अनेक वक्तव्य और भाषण न तो राष्ट्रीय और ना ही क्षेत्रीय मीडिया में प्रकाशित होते हैं.

आम चुनाव में भाजपा की जीत के बाद, अलग-अलग बैनरों के तहत काम कर रहे हिंदू राष्ट्रवादियों की हिम्मत बहुत बढ़ गई है. वे यह मानने लगे हैं कि उनकी हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा, देश के कानून से ऊपर है और वे जो चाहे कर सकते हैं. वे खुलकर विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच घृणा और शत्रुता को बढ़ावा दे रहे हैं और उनके मुख्य निशाने पर हैं अल्पसंख्यक समुदाय. कई मामलों में इस तरह के अभियानों से धन भी कमाया जा रहा है. ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब मवेशियों को ले जा रहे ऐसे ट्रकों, जिनका या तो ड्रायवर अथवा मालिक मुसलमान था, को रोक लिया गया और मवेशियों को हिंदुत्व कार्यकर्ता इस बहाने अपने घर ले गए कि इन ट्रकों में गायों को काटने के लिए ले जाया जा रहा था. ऐसे ट्रकों को तभी आगे जाने दिया जाता है जब या तो ड्रायवर अथवा मालिक बड़ी रकम चुकाने को तैयार हो.

इसी तरह, बांग्लादेशी मुस्लिम प्रवासियों को घुसपैठिया बताया जा रहा है और ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों में क्रिसमस व नये साल पर होने वाले कार्यक्रमों में हुडदंग मचाने की घटनाएं हो रही हैं. यह आरोप लगाया जाता है कि ईसाई स्कूल, हिंदू विद्यार्थियों का धर्मपरिवर्तन करवा रहे हैं. इस तरह के आधारहीन आरोपों को क्षेत्रीय भाषाओं के मीडिया में भारी प्रचार मिलता है और इससे हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, अल्पसंख्यकों की छवि ऐसे एकसार समुदायों के रूप में प्रस्तुत करने में सफल होते हैं जो राष्ट्र-विरोधी और हिंदू-विरोधी हैं. वे सोशल मीडिया के जरिए अल्पसंख्यकों के पवित्र और धार्मिक प्रतीकों का अपमान कर अल्पसंख्यकों को भड़काने की कोशिश भी करते रहते हैं.

सच तो यह है कि देश में धार्मिक ध्रुवीकरण इस हद तक बढ़ गया है कि अलग-अलग समुदायों के दो व्यक्तियों के बीच कोई छोटा-सा विवाद भी सांप्रदायिक रंग अख्तियार कर लेता है. सोमनाथ में ऑटोरिक्षा चालक को दस रूपए कम देने के विवाद से भड़की सांप्रदायिक हिंसा में 25 लोग घायल हो गए. हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सांप्रदायिक हिंसा पर दस साल के लिए रोक लगाने की बात कही है. परंतु या तो उनकी पार्टी के सदस्य अपने नेता की बात नहीं मान रहे हैं और या फिर भाजपा में कार्यों का स्पष्ट विभाजन है-प्रधानमंत्री विकास की बात करते हैं और अन्य नेता अपना काम करते हैं.

लगातार दुष्प्रचार के जरिये समाज का ध्रुवीकरण तो हुआ ही है आम लोगों के दिमागों में जहर भर गया है और अल्पसंख्यक अपने आप को गंभीर खतरे में महसूस करने लगे हैं. यह इससे भी स्पष्ट है कि सभी जातियों के लोगों ने अपने अल्पसंख्यक-विरोधी रूख के चलते, लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया. हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, एक रणनीति के तहत बहुत अधिक हिंसा नहीं कर रहे हैं. वे हिंसा की बजाए लोगों के दिमागों का सांप्रदायिकीकरण करने में जुटे हैं ताकि देश में 1992-93 व 2002 से भी बड़े दंगे करवाये जा सकें. परंतु यह तभी करवाया जायेगा जब सरकार अलोकप्रिय हो जायेगी.

सौजन्य – रविवार में छपी इरफ़ान इंजिनियर की रिपोर्ट


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