वसीम अख्तर बरकाती 
अभिव्यक्ति की आज़ादी ,अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ,हमला, यह कुछ वाक्य हैं, जो जो फ्रांस की मेगज़ीन शार्ली एब्दो पर हमले के बाद सुनने को मिले है! लेकिन इससे सवाल यह उठता है, कि क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी इतना आज़ाद कर देती है
कि एक मेगज़ीन जब चाहे, जैसे चाहे, जिसका चाहे मज़ाक उड़ाए! वो अरबो मुसलमानो को जजवातो को रोंदते हुए उनके पैगंबर का कार्टून बनाकर मज़ाक उड़ाए! आज़ादी के नाम पर वो अमन से खिलवाड़ करे!

अगर यही अभिव्यक्ति की आज़ादी है, तो इस आज़ादी पर रोक लगाए जाने की सख़्त ज़रूरत है! हमेश की तरह इस बार भी हमले के चंद वक़्त बाद मीडीया के शुरू हुए ट्रायल से पता लगा कि, हमले की पीछे की वजह मोहम्मद साहब का वो कार्टून था, जो शार्ली एब्दो ने छापा था! इसी के ज़रिए मीडिया में छुपे अराजक तत्वों को मोक़ा मिल गया, इस्लाम को और मुसलमान को बदनाम करने का! इस्लाम को फिर दहशतगर्दी, से जोड़ा जाना लगा! इन दुश्मन ए ईस्लाम को इस्लाम की तालिमो को पढना  चाहिए! इस्लाम तो ज़ुल्म के जवाब मैं भी ज़ुल्म करने की इज़ाज़त नही देता!

जो नबी सभी के लिए रहमत बना कर भेजा गया हो, जिस नबी ने खून तो क्या फ़िज़ूल पानी बहाने से माना फरमाया हो, जिसने इंसान तो क्या जनवरो तक के हुक़ूक़ तय कर दिए हो, जिसने गुलामो को भी वही दर्ज़ा दिया जो मालिको का है, जिसने
दुश्मनो को भी गले से लगाया हो, वो क्या दहशतगर्दी और खून ख़राबे की इज़ाज़त दे सकता है, हरगिज़ नही!

“जब प्यारे आका ने मक़्क़ा फ़तेह किया और मक़्क़ा शहर को कूच किया, तो काफिरो को लगा कि मोहम्मद हमे नही छोड़ेगे,
और अपने और अपने साथियो पर हुए हर ज़ुल्म का बदला हम से लेंगे, मगर प्यारे आका ने ऐलान कर दिया कि हम यहा किसी से बदला लेने, किसी को मारने नही आए हैं, जो जहाँ है महफूज़ है”! सोचने का मुक़ाम है, इससे बढ़कर क़ुर्बानी क्या हो सकती है कि आप ने उन लोगो को भी माफ़ कर दिए जिन्होने आप और आप के साथियो पर जुल्मो की इंतेहा कर दी! यह है इस्लाम और
इस्लाम की तालिमे! और इस हमले के ज़रिए मुसलमानो को निशाने बनाने वालो को समझना चाहिए कि जितनी आलोचना इस हमले की होनी चाहिए, उससे कही गुनाह आलोचना मेगज़ीन शार्ली एब्दो के काम की भी होनी चाहिए! आज़ादी की बात करने वाले फ्रांस मैं बुर्क़े पर पाबंदी को क्यू भूल जाते हैं, जब खुद फ्रांस की मुस्लिम औरतें खुद बुर्क़ा पहनना और परदा करना चाहती हैं, तो फिर क्यू उन पर पाबंदी लगाई गयी! क्या यह पाबंदी उनके हक़ का गला घोटना नही?


कहा चले जाते हैं ऐसे वक़्त मैं आज़ादी की बात करने वाले? और हमले के विरोध मैं फ्रांस की दो मस्जिद पर हमले हुआ, क्यू इन हमलो को दहशदगार्दी मान कर इन की आलोचना की जाती! सोचने वाली बात है, एक मुसलमान का ग़लत काम पूरी मुस्लिम क़ौम को दहशतगर्द बना देता है, और इस्लाम को दहशतगर्दो का मज़हब कहा जाता है, मगर जब उनसे हज़ारो गुनाह बड़े ज़ुल्म दूसरे मज़हबो के मानने वाले लोग करते हैं, तो सभी बुद्धिजिवीयो की ज़ुबाने खामोश हो जाती हैं! जब मुसलामनो पर अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, फ़िलिस्तीन, बर्मा, असम, गुजरात और कश्मीर वगेरह मैं बेपनाह ज़ुल्म होते हैं तो, इसे कोई दहसतगर्दी नही कहता, और नही जालिमो के मज़हब पर कोई आँच आती है! पुरानी बात ना करके अगर फिलहाल ही असम मैं 72 मासूमो के क़त्ले आम की ही बात करे तो किसी ने क़ातिल माओवादियो को मज़हब और क़ौम पर उंगली नही उठाई! अगर दुनिया को आतंकवाद से लड़ना है, तो यह दोगलापन छोड़कर मज़बूती के साथ आतंकवाद के खिलाफ खड़ा होना होगा! अगर आतंकवाद
की बात हो तो हर वो काम आतंकवाद कहा जाना चाहिए जिससे अमन और चेन ख़ात्मा होता हो!

दहशतगर्दी को किसी के मज़हब से जोड़कर नही देखा जाना चाहिए! अगर शार्ली एब्दो पर हमला आतंकवाद था तो मानना पड़ेगा पेगम्बर ए इस्लाम का मज़ाक उससे कही बड़ा गुनाह था, और आतंकवाद था!
लेखक उत्तर प्रदेश संभल से मुस्लिम स्टूडेंट आर्गनाइज़ेशन के जिला अध्यक्ष हैं! 

और पढ़े -   पुण्य प्रसून बाजपेयी: बच्चों के रहने लायक भी नहीं छोड़ी दुनिया

Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें



Facebook Comment
loading...
कोहराम न्यूज़ की एंड्राइड ऐप इनस्टॉल करें

SHARE