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 मुफ़्ती मुहम्मद आरिफ रज़ा

कोहराम न्यूज़ :19 मार्च 2016

आल इंडिया उलेमा मशाइख बोर्ड के प्रेसिडेंट सय्यद मुहम्मद अशरफ किछोछ्वी ने सूफी कांफ्रेंस के बारे में मीडिया को बताया है कि बोर्ड ने इस कांफ्रेंस को इस्लाम के अमन मुहब्बत और भाईचारे पर आधारित विचारधारा सुफिस्म के पैगाम को आम करने के लिए आयोजित किया है जिसमे विदेशों से सुफिस्म के बड़े प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं! यहाँ बता दें कि आल इंडिया उलेमा मशाइख बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष सय्यद महमूद अशरफ किछोछ्वी जोकि सय्यद मुहम्मद अशरफ के बड़े भाई हैं एक साल से बोर्ड से अलग हो गए हैं ! इससे पूर्व उनकी कयादत में मुरादाबाद, भागलपुर और राजस्थान के बीकानेर में बोर्ड ने बड़ी कांफ्रेंस सुन्नी कांफ्रेंस के नाम से आयोजित की हैं! जिनमे नारा दिया गया था वहाबियों की न इमामत कुबूल है न कयादत ! इस नारे को देख कर पढ़कर, देवबंदी समुदाय से अलग जितना भी सुन्नी समुदाय था वोह एक जुट होकर बोर्ड के साथ हो लिया था और लाखों की तादाद में कांफ्रेंस में शिरकत करके इस आन्दोलन को मजबूती दी थी !

नाराज़गी से पहले स्थिति ?

मुरादाबाद की पहली सुन्नी कांफ्रेंस में खुद दरगाह आला हज़रत से तौकीर रज़ा खान ने शिरकत की थी और सुफिस्म के सभी सिलसिलो यानी सुफिस्म के तरीकों (जैसे कादरी, बरकाती, रजवी, चिश्ती, नक्शबंदी, अशरफी, वारसी, सक्लैनी) से समर्थन हुआ था !

मगर अब सुन्नी कांफ्रेंस बंद करके बोर्ड ने इसको सूफी कांफ्रेंस नाम दिया है और अपनी बात को आतंकवाद और हिंसा के खिलाफ बड़े स्तर पर ले जाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और और डॉ. ताहिर उल कादरी का साथ लिया है जिससे समुदाय नाराज़ है !

इससे पहले भी बोर्ड ने कांग्रेस, समाजवादी सरकार और बसपा से बातचीत कि और उनके समर्थन में चुनाव मैदान में प्रचार किया! लेकिन शायद बात बन नहीं पायी और उनका साथ बोर्ड को छोड़ना पड़ा!

इसी बीच भाजपा की केंद्र में सरकार आई और बोर्ड को उसमे उम्मीद की किरण नज़र आई बातचीत हुई और बोर्ड के बारे में सरकार को बताया गया और बोर्ड के एक पूर्व अहम् सदस्य सय्यद बाबर अशरफ किछोछ्वी को भारत सरकार के तहत मौलाना आज़ाद फाउंडेशन में सदस्य के तौर पर मौका मिला!

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कोशिशे आगे बढ़ी बोर्ड ने बड़े सूफी उलेमा की उपस्थिति में प्रधानमंत्री कार्यालय में नरेंद्र मोदी के साथ अपने एजेंडा पर बातचीत ! इस मीटिंग से भारत के मुस्लिम समुदाय में हलचल सी मची और कुछ ने इसे सही तो कुछ ने गलत ठहराया! यह मीटिंग ही आगे चलकर बोर्ड के सरकार से बेहतर ताल्लुकात का आधार बनी और सरकार के सहयोग से वर्ल्ड सूफी कांफ्रेंस की शुरुआत अमल में आई!

मोदी से इन मुलाकातों में कहीं भी सुन्नी बरेलवी वर्ग के प्रमुख केंद्र के साथ कोई सहयोग ना दिखा, न देश की बड़ी दरगाह मरेहरा शरीफ के ज़िम्मेदार प्रोफेसर सय्यद अमीन मियां कादरी या खुद बोर्ड के अध्यक्ष अशरफ साहब के अपने बड़े भाई और एक साल पहले तक अध्यक्ष रहे सय्यद महमूद अशरफ या उनकी खुद की किछोछा दरगाह से ही विश्व स्तरीय आलिम सय्यद मदनी मियां, हाशमी मियां या जीलानी मियां दिखाई दिए !

मुम्बई से प्रभावशाली रज़ा अकादमी हो या प्रमुख उलेमा मोईन मियां अशरफी हों , उत्तर भारत में सुन्नी सूफी समाज के बड़े मदरसों जैसे जामिया अशरफिया मुबारकपुर आजमगढ़ या जमितुर्र्ज़ा बरेली या मंज़रे इस्लाम जैसे एतिहासिक संस्थान या बड़े विद्वानों को साथ नहीं लिया गया!

करोड़ों की आबादी से जुड़े आला हज़रत की दरगाह और उलेमा विद्वानों ,मुरीदों, और समर्थको में यह पैगाम देने की कोशिश की गयी की उलेमा अलग हैं और सूफी अलग! इसकी नीव भी बोर्ड ने सूफी सक़लैन मियां की एक कांफ्रेंस में शिरकत करके ज़ाहिर कर दी थी जिसमे सूफी और उलेमा को अलग करके बताया गया था! बोर्ड ने शिरकत तब की थी जब उस कांफ्रेंस का शहर में ही विरोध था !

कुल मिलकर बोर्ड के तीन प्रमुख चेहरों, सय्यद महमूद अशरफ, सय्यद बाबर अशरफ और सय्यद मुहम्मद अशरफ में से सिर्फ सय्यद मुहम्मद अशरफ ही पुराना चेहरा रह गए हैं जो इस वक़्त बोर्ड के अध्यक्ष हैं!

हालाँकि सरपरस्तों में दरगाह आला हज़रत के प्रमुख सुबहानी मियां और विश्व के प्रभावशाली व्यक्तियों में शुमार और मारेहरा शरीफ के सय्यद मुहम्मद अमीन मियां के नाम वेबसाइट पर शामिल हैं मगर ऐसा लगता है वह सिर्फ खानापूर्ति के लिए हैं वरना नरेंद्र मोदी और तहिरुल कादरी के साथ मिलकर प्रोग्राम कराने जैसे बड़े फैसलों में इनकी क्या मर्ज़ी है यह बात सामने ज़रूर आती? यह दोनों ही प्रभावशाली विद्वान इस कांफ्रेंस का हिस्सा नहीं हैं !

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बोर्ड की वेबसाइट में प्रमुखता से सय्यद आमीन बरकाती और बरेली आला हज़रत दरगाह के सज्जादा सुबहानी मियां के नाम सरपरस्तों में शामिल हैं !

डॉक्टर ताहिर उल कादरी का विरोध :-

सुन्नी सूफी समुदाय का एक बड़ा तबका ताहिर उल कादरी को गुमराह मानता है और उनका खुला विरोधी है! इस सम्बन्ध में भारत पाकिस्तान के अनेक उलेमाओ ने ताहिर उल कादरी पर धर्म की राजनीती करने पर फतवे लगाये हैं! इसमें ताहिर कादरी की तंजीम मिन्हाजुल कुरान द्वारा अपनी मस्जिदों को यहूदी ईसाई समुदाय के लिए उनकी इबादत के अनुसार खोलने का मुद्दा भी विवाद का एक केंद्र है ! इसके साथ ही उनसे जुड़े हजारों ऐसे मामले हैं जिनमे अल्लाह और उसके रसूल की झूठी कसमे खाना और झूठे ख्वाब ब्यान करके लोगों को बरगलाना आदि भी हैं !

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टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के प्रभावशाली मुस्लिम व्यक्तियों में शुमार मुफ़्ती अख्तर रज़ा खान कादरी ने इस कांफ्रेंस के बारे में डॉ. ताहिर उल क़ादरी की शिरकत की वजह से पहले ही उसकी बायकाट का ऐलान कर रखा है !

यहाँ जानना ज़रूरी है कि ताहिर कादरी के पिछले भारत दौरे से, उलेमा मशाईख बोर्ड इन विद्वानों की नाराज़गी और उन पर लगे फतवे से आगाह है और अब इन स्थितियों ताहिर कादरी को बुलाना शायद खुद ही बात को साफ़ कर देता है ! कि बोर्ड को किसी की परवाह नहीं है!

कुछ लोगों का मानना है कि बोर्ड कम से कम ताहिर उल कादरी को शामिल न करके इत्तेहाद का मुजाहिरा कर सकता था मगर लगातार विरोध के बावजूद बुलाना बोर्ड की एकला चलो की पालिसी को दिखता है! और बोर्ड सुन्नियों में उन लोगों को प्रमुखता दे रहा है जो आला हज़रत अहमद रज़ा खान क़ादरी से अपने को अलग करके चलते हैं या उनके धुर विरोधी रहे हैं!

भाजपा का साथ :- भाजपा सरकार की शुरुआत से ही आम मुसलमान तबका एक बेचैनी महसूस करता आया है! कोई दिन ऐसा नहीं जाता जिस दिन भेदभाव और हिंसा की खबरे सामने ना आरही हों ! हर महीने के लिए एक नया मुद्दा है अल्पसंख्यक बेचैन हैं तो कही ज़ुल्म से परेशान हैं ! कहीं दलित पीड़ित है कहीं किसान फाँसी लगा रहा है कहीं छात्र संघर्ष कर रहे हैं और लेखक अवार्ड वापसी कर रहे हैं तो कहीं घर वापसी के आयोजन किये जा रहे हैं ! मंत्री से लेकर छुट भैय्ये लोग आग उगल रहे हैं ! अलीगढ से लेकर जामिया मिल्लिया में बेचैनी है !

पढ़िए: सूफी कांफ्रेंस में आरएसएस का हाथ , मुसलमानों को बाँटने की साजिश ? 

आतंकवाद मुस्लिम समुदाय के लिए मुद्दा है और निर्दोष नौजवानों की रिहाई भी मुद्दा है मगर एक पर बोलना दुसरे पर चुप रहना आम लोगों के समझ नहीं आरहा है और इन हालातों में देश के अस्सी फीसद मुस्लिम समुदाय यानि सुन्नी सूफी समाज की नुमाईंदगी का दावा करने वाला बोर्ड खामोश है और अब भी उसके एजेंडा में मुस्लिम ज़ख्मो पर मरहम लगाने जैसी कोई बात सामने आती नहीं दिख रही है !

अहले सुन्नत या सुन्नी बरेलवी कौन हैं ?

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तस्वीर- हैदराबाद में पैगम्बरे इस्लाम के जन्म दिन पर जुलूसे मिलादुन्नबी ! पूरी दुनिया के साथ भारत के लगभग सभी शहरों में यह मंज़र आम है ! 

उदारवादी मुस्लिम सुन्नी, सुफिस्म को मानता है और इस्लाम के पैगम्बर हजरत मुहम्मद उनके खानदान और उनके साथियों यानी सहाबा और औलिया यानि सूफी संतों के माध्यम से वसीला बनाकर अल्लाह से दुआ मांगता है! जो पैगम्बरे इस्लाम के यौमें विलादत यानि आपके जन्म दिन की खुशियाँ मानाने को बिलकुल जायज़ करार देता है और देश भर में मनाता है और कुल मिलकर देश की आबादी का बहुसंख्यक है !

साउथ एशिया खासतौर पर हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश ,श्रीलंका में वहाबी- देवबंदी आन्दोलन के सामने एक गैर वहाबी सुन्नी आन्दोलन है जिसको अहले सुन्नत आन्दोलन भी कहा जाता है! इसमें बरेली से आला हजरत इमाम अहमद रज़ा खान कादरी (1856-1921) और उनके शिष्यों जिसमे सय्यद ज़फरुद्दीन, मौलाना नंईमुद्दीन मुरादाबादी, अब्दुल अलीम सिद्दीकी मेरठी, मुस्तफा रज़ा खान कादरी, मौलाना हस्नैन रज़ा खान साहब और अन्य प्रमुख विद्वानों  ने मुख्य रूप बढाया है!

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तस्वीर: अजमेर शरीफ में स्थित विश्व प्रसिद्ध सूफी संत हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर लाखों लोग हर महीने जियारत करने जाते हैं!

ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक भारत की आज़ादी से पहले और उसके समय देश का सबसे तालीम याफ्ता और राजनितिक रूप से अग्रसर तबका यही सुन्नी सूफी (सुन्नी बरेलवी) तबका था और इस तबके के शिक्षित वर्ग के पाकिस्तान जाने की वजह से सुन्नी आन्दोलन कमज़ोर हुआ!

सौ साल से ज्यादा के इस इतिहास में दुनिभर में विभिन्न संगठन और मस्जिदे, मदरसे स्थापित किये गए! मक्का में वर्ल्ड इस्लामिक मिशन की बुनियाद डाली गयी और विश्व में वहाबी आन्दोलन के खिलाफ एक प्लेटफार्म बनाया गया!

इस सुन्नी आन्दोलन को देवबंदी व अहले हदीस समुदाय ने आम बरेलवी फिरका कह कर ख़ारिज करने की भरसक कोशिश की ! जिसमे देवबंदी, अहले हदीस और अन्य समुदाय यह भ्रम फ़ैलाने में कामयाब हुए कि अहमद रज़ा खान की शिक्षा कुछ नहीं बस एक नया फिरका हैं! जबकि साउथ एशिया पहले से ही सूफी संतो का देश रहा है और प्रमुख सूफी संत अजमेर के ग़रीब नवाज़ और हज़रत निजामुद्दीन औलिया की शिक्षा से आज भी करोडो लोग जुड़े हैं और हिन्दू मुस्लिम समाज को आपस में जोड़ने काम इसी उदारवादी आन्दोलन ने किया है!

इस आन्दोलन के कमज़ोर होने और दुसरे अन्य आन्दोलन के मज़बूत होने की वजह भी विभिन्न समुदायों में दूरी बढ़ना है !

कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी की विद्वान डॉक्टर उषा सान्याल के अनुसार अहमद रज़ा खान ने इसी सुफिस्म को अपने अहले सुन्नत आन्दोलन से मज़बूत किया और इसका विरोध करने वाले देवबंदी – अह्ले हदीस या वहाबी आन्दोलन का सामना सैकड़ों किताबे लिख कर किया! दुनिया भर में लाखों मस्जिदे और हजारों मदरसे इस आन्दोलन से जुड़े हैं ! ज़्यादातर सूफी दरगाहें और केंद्र शरीअत की व्याख्या के मामले में फतवों के मामले में इमाम अहमद रज़ा खान कादरी को ही अपना पेशवा मानती आई हैं!

सुन्नी बरेलवी समुदाय की क्या राय है ?

ऑल इंडिया सुन्नी जमीयत उलेमा और रज़ा एकेडमी समेत कई संगठनों की ओर से जारी बयान में कहा गया कि इस ‘सूफ़ी कॉन्फ्रेंस’ को उन कुछ ताक़तों का समर्थन हासिल है, जो भारतीय मुस्लिमों को ‘संप्रदाय’ और ‘विश्वास’ के आधार पर बांटना चाहते हैं !

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नयी दिल्ली के ओखला में दारुल कलम संस्थान के प्रमुख मौलाना यासीन अख्तर मिस्बाही के अनुसार यह भाजपा की राजनीती का एक हिस्सा है जिसमे वह ऐसे सूफी खरीदकर सुन्नी समाज को ही बाँटना चाहती है ! इसलिए आम मुसलमानों को इन कोशिशो से अलग होना ज़रूरी है !

आल इंडिया सुन्नी जमीअतुल उलेमा के अनुसार कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने से भारतीय मुस्लिमों को धार्मिक और राजनीतिक नुक़सान हो सकता है. इसी वजह से उलेमा वहां नहीं जा रहे हैं. मुस्लिमों के लिए छिपे ख़तरों से बचने के लिहाज़ से ये फैसला लिया गया!

इत्तेहादे मिल्लत के प्रमुख तौक़ीर रज़ा खान के मुताबिक यह कांफ्रेंस आरएसएस की मुसलमानों के खिलाफ साजिश का एक पार्ट है जिसको समझकर दूर रहने की ज़रूरत है! इसको सुब्र्हमानियन स्वामी के मुस्लिम समुदाय में आपसी मतभेद को हवा देने सम्बन्धी ब्यान की रौशनी में देखने की ज़रूरत है!

मौलाना तौक़ीर रज़ा ख़ान ने इसे सूफ़ीवाद की बजाय आरएसएसवाद करार दिया है। उन्होंने कहा कि हिंदू- मुस्लिम दंगे करवाने के बाद आरएसएस अब मुसलमानों के अलग-अलग पंथों को लड़वाने की कोशिश कर रहा है।

17 मार्च बरेली एडिशन के टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक दरगाह आला हज़रत से अब इस कांफ्रेंस का मुकम्मल बायकाट का ऐलान कर दिया गया है और इसकी वजह ताहिर उल कादरी और आरएसएस से जुडाव बताया गया है! अब देखना यह है कि इस कांफ्रेंस का मुस्लिम समुदाय पर कैसा असर पड़ता है ?

(यहाँ दिए गए विचार लेखक के अपने मूल विचार हैं ! Kohram न्यूज़ वेबसाइट का इन विचारो से सहमत होना आवश्यक नहीं है !)


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