देश में पिछले दिनों असहिष्णुता के मसले पर छिड़ी बहस के बीच उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने रविवार को कहा है कि समाज में सवाल उठाना तथा आलोचना करना भी एक तरह की असहिष्णुता मान ली गई है।

आलोचना करना भी असहिष्णुता की श्रेणी मेंस्थिति यह है कि अलग राय रखने वाले लोगों को या तो बहिष्कृत कर दिया जाता है या फिर उनकी हत्या हो जाती है। साथ ही उन्होंने अतार्किक आस्था तथा विश्वास पर भी चोट की।

एक कार्यक्रम के दौरान अंसारी ने कहा कि अवैज्ञानिक पूर्व धारणाओं पर आधारित तर्कहीन आस्था तथा विश्वास और संदिग्ध संस्थाएं अब भी कायम हैं।

उप राष्ट्रपति के अनुसार कहानियों को तथ्य, इतिहास को पौराणिक कथाओं तथा आस्था को वैज्ञानिक रूप से सत्यापित तथ्यों से अलग करने का प्रयास अमूमन असहमति के रूप में देखा जाता है।

इसके अनुसार तंत्र मंत्र को वैज्ञानिकता और अंध विश्वास को संस्कृति की उपाधि दी जाती है। इस तरह के रवैये ने कई बार अप्रिय और हिंसक मोड़ ले लिया है।

किताबें प्रतिबंधित की गई हैं या उन्हें बाजार से हटा लिया गया है, पुस्तकालय जलाए गए हैं, विपरीत मत वालों को बहिष्कृत किया गया या मारा गया, सामाजिक शांति में खलल पहुंची और लोगों पर हिंसा थोपी गई। इन सभी मामलों में काम करने वाली पूर्व धारणा यही है कि सवाल करने से भावनाएं आहत होंगी, वर्तमान ढांचा ध्वस्त हो जाएगा, आस्था कमजोर होगी और सामाजिक व्यवस्था भंग हो जाएगी।

अंसारी ने दैनिक जीवन में वैज्ञानिक मानसिकता के अभाव की बात की। उन्होंने कहा कि परिवार में भी सवाल पूछने को मंजूरी नहीं दी जाती। अधिकतर माता-पिता को अपने बच्चों का सवाल पूछना अच्छा नहीं लगता। स्कूलों में शिक्षक सवाल उठाने वाले बच्चों पर गुस्सा होते हैं।

कॉलेज और विश्वविद्यालयों में इसे गुस्ताखी माना जाता है। समझा जाता है कि विद्यार्थी का प्रश्न पूछना शिक्षक के ज्ञान पर संदेह करने का एक प्रयास है। साभार: अमर उजाला


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