UP Police Destroyed Hashimpura Riot Files

परवेज इकबाल सिद्दीकी, लखनऊ – साल 1987 में हुए हाशिमपुरा दंगों के संबंध में उत्तर प्रदेश पुलिस ने पहली बार माना है कि उसने दंगों से संबंधित को दस्तावेजों को मिटा दिया था। सीबीसीआईडी को लिखे एक पत्र में मेरठ पुलिस के वरिष्ठ अधीक्षक ने दस्तावेजों को मिटाए जाने की बात कही है। पत्र में लिखा है कि 2006 में अप्रैल के महीने में दस्तावेजों को मिटा दिया गया था। मेरठ पुलिस ने इस पत्र को सीबीसीआईडी को भेज दिया है।

ये दस्तावेज दंगों के दौरान पीएसी जवानों की तैनाती से संबंधित थे और उनकी भूमिका को साबित करने में मददगार हो सकते थे। इस मामले में पिछले साल दिल्ली की एक अदालत ने 19 में 16 आरोपी जवानों को बरी कर दिया था।

इन जवानों पर आरोप था कि दंगों के दौरान उन्होंने हाशिमपुरा के 42 मुसलमानों को किडनैप किया और बाद में उनकी हत्या कर दी। सुनवाई के दौरान 19 आरोपियों में से तीन की मृत्यु हो गई थी। यह मामला दिल्ली की अदालत में विचाराधीन है। उत्तर प्रदेश सरकार और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने बरी करने के फैसले के खिलाफ अपील की थी।

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मानवाधिकार आयोग की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने यूपी सरकार को दंगों के समय ड्यूटी पर लगे पीएसी जवानों की सूची की प्रामाणिक प्रतियां देने का निर्देश दिया था। दिल्ली हाई कोर्ट ने 17 जनवरी, 2016 को यह केस लिया था। दस्तावेजों को खत्म किए जाने की बात पर आयोग की तरफ से वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा, ‘यह सिर्फ हमारे आरोपों की पुष्टि करता है कि यूपी की अलग-अलग सरकारों ने पीएसी अधिकारियों से साठ-गांठ कर दस्तावेजों को खत्म किया।’ उन्होंने कहा, ‘पुलिस कैसे 2006 में दस्तावेजों को खत्म कर सकती है जबकि मामला उस समय भी विचाराधीन था। इसके लिए किसी को तो जिम्मेदार ठहराकर सजा देनी होगी।’

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गौरतलब है कि मेरठ के हाशिमपुरा इलाके में हो रहे दंगों के दौरान 22 मई 1987 को पीएसी के 19 जवानों ने पहले तो कथित रूप से 42 स्थानीय मुसलमानों को पकड़ा और बाद में ट्रक में भर कर गाजियाबाद के मुरादनगर ले जाकर गोली मार दी। 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने इस केस को गाजियाबाद से दिल्ली के तीस हजारी सेशन कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया था। मार्च 2015 में 16 आरोपी पुलिसवालों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था।

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