मुंबई | मुस्लिम समुदाय की धार्मिक मान्यताओं में छोटे बच्चे, खासकर लडको के खतने की प्रथा है. लेकिन मुंबई के दाउदी बोहरा समुदाय में छोटी बच्चियों के खतने की भी प्रथा चली आई है. हालाँकि फ़िलहाल इस प्रथा के खिलाफ समुदाय में ही काफी लोग आवाज बुलंद कर रहे है. उनका मानना है की लडकियों का खतना करना धार्मिक आधार पर गलत है. लेकिन कुछ महिलाए अब इस प्रथा को बचाने के लिए आगे आ रही है.

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चौकाने वाली बात यह है की इन महिलाओं में दो डॉक्टर भी शामिल है. इन्होने खतने के प्रति लोगो को जागरूक करने के लिए और इस प्रथा को जारी रखने के लिए दाउदी बोहरा विमिन फॉर रिलिजस फ्रीडम (DBWRF) नामक ग्रुप भी बनाया है. यह छह महिलाओं का ग्रुप है जिसमे शिक्षक, शेफ और काउंसलर जैसी प्रोफेशनल शामिल है. लेकिन खतने को बढ़ावा देने के लिए दो डॉक्टर का आगे आना इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) को रास नही आया.

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IMA के राष्ट्रिय अध्यक्ष डॉ केके अग्रवाल ने इस बारे में चिंता जाहिर करते हुए कहा की मेडिकल प्रोफेशन में खतने को हमारे एथिक्स के खिलाफ माना जाता है. हम इसका विरोध करते है चाहे फिर इसका कोई भी लेवल क्यों न हो? IMA , वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन की नीतियों के प्रति जवाबदेही है. इसलिए खतने को बढ़ावा देने वाली दोनों महिला डॉक्टर्स के खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है.

DBWRF की दोनों संस्थापक सदस्य मुंबई के सैफी अस्पताल में प्रैक्टिस करती है. इनमे से एक डॉ फातिमा जेतपुरवाला ने अपनी मुहीम के बारे में कहा , ‘ ग्रुप का गठन मुख्यधारा की दाउदी बोहरा महिलाओं को आवाज देने के लिए किया गया है. हमें वो सब करने का अधिकार है जो संविधान के तहत हो और किसी का नुक्सान न करता हो. फातिमा होम्योपैथ स्पेशलिस्ट है जबकि ग्रुप की दूसरी मेम्बर डॉ. अलेफिया बापइ गायनकॉलजिस्ट और लैपरॉस्कपिक सर्जन हैं.

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